वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब संसद में बजट 2026 पेश किया, तो पूरे देश की निगाहें एक बार फिर उन घोषणाओं पर टिक गईं जो आने वाले समय में भारत की आर्थिक दिशा तय करेंगी। यह केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की उम्मीदों का प्रतिबिंब है जो रोज सुबह उठकर अपने कारोबार, खेती और रोजगार की चिंता में जुटे रहते हैं। इस बार का बजट व्यापार, उद्योग और रोजगार के लिहाज से काफी महत्वाकांक्षी नजर आता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह धरातल पर उतरकर आम आदमी की जिंदगी में वाकई बदलाव ला पाएगा?
एमएसएमई को मिली राहत
देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए 10,000 करोड़ रुपये के विकास कोष की घोषणा निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम है। छोटे व्यापारी और उद्यमी जो पूंजी की कमी, ऊंची ब्याज दरों और बाजार में प्रतिस्पर्धा के कारण संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए यह राहत की खबर है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि पिछली योजनाओं में आवंटित राशि का कितना हिस्सा वास्तव में जमीनी स्तर पर छोटे कारोबारियों तक पहुंचा? क्या यह फंड सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित रहेगा या ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों के उद्यमियों को भी इसका लाभ मिल पाएगा? इन सवालों के जवाब तभी मिलेंगे जब इस योजना का क्रियान्वयन पारदर्शी और समावेशी तरीके से होगा।
मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की पहल
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को 40,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाना और सेमीकंडक्टर तथा इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण के लिए भी उतनी ही राशि का प्रावधान करना दूरदर्शी कदम माना जा सकता है। वैश्विक स्तर पर जब चीन पर निर्भरता कम करने की बात हो रही है, तब भारत के लिए मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का यह सुनहरा अवसर है।
हालांकि, यह भी सच है कि उत्पादन बढ़ाना तभी सार्थक होगा जब उसके साथ-साथ गुणवत्ता, तकनीक और कुशल मानव संसाधन का विकास भी हो। क्या हमारे पास पर्याप्त प्रशिक्षित तकनीशियन हैं? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कुशल युवा तैयार कर रही है? इन पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।
वस्त्र उद्योग में नई संभावनाएं
वस्त्र उद्योग भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े रोजगार देने वाले क्षेत्रों में से एक है। करोड़ों कारीगर, बुनकर और श्रमिक इस क्षेत्र से जुड़े हैं। इस उद्योग को मजबूती देने की घोषणा उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है जो पीढ़ियों से इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े हैं।
लेकिन यहां भी चुनौतियां कम नहीं हैं। हथकरघा और पावरलूम उद्योग में काम करने वाले छोटे कारीगरों को बाजार तक पहुंच, डिजाइन में आधुनिकता और वित्तीय सहायता की दिक्कतें आती हैं। क्या बजट में इन समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस रणनीति है? इसका जवाब क्रियान्वयन के दौरान ही मिलेगा।
रोजगार सृजन की असली तस्वीर
बजट में रोजगार सृजन पर जोर दिया गया है, जो निश्चित रूप से सकारात्मक पहलू है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में बेरोजगारी की समस्या केवल नौकरियों की संख्या से नहीं, बल्कि गुणवत्ता और स्थिरता से भी जुड़ी है। अस्थायी, ठेके पर और कम वेतन वाली नौकरियां युवाओं को दीर्घकालिक सुरक्षा नहीं दे सकतीं।
इंजीनियरिंग, चिकित्सा और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से निकलने वाले लाखों युवा आज भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। उनकी योग्यता और कौशल का उपयोग कैसे हो, यह एक बड़ी चुनौती है। स्किल डेवलपमेंट की बात तो होती है, लेकिन उसके बाद नौकरी की गारंटी कहां है?
निर्यात और आत्मनिर्भरता का संतुलन
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और निर्यात को प्रोत्साहित करना दोनों ही जरूरी हैं। बजट में इस दिशा में कदम उठाए गए हैं, जो सराहनीय है। लेकिन आत्मनिर्भर भारत का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि हम अंतरराष्ट्रीय बाजार से कट जाएं। हमें वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनते हुए भी अपनी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना होगा।
इसके लिए गुणवत्ता मानकों, तकनीकी नवाचार और प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण पर ध्यान देना होगा। क्या हमारे उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिक पाएंगे? क्या हम अपने पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक डिजाइन और गुणवत्ता के साथ पेश कर सकते हैं? यह सवाल अहम हैं।
किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चिंता
बजट में व्यापार और उद्योग पर तो काफी जोर दिया गया है, लेकिन किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कितनी राहत है, यह स्पष्ट नहीं दिखता। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार है और लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, कर्ज माफी, उर्वरक और बिजली की कीमतों में राहत जैसे मुद्दे किसानों के लिए प्राथमिकता हैं। लेकिन इस बार के बजट में इन पहलुओं पर कोई बड़ी घोषणा नहीं दिखी। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में बढ़ोतरी और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास पर भी ज्यादा जोर नहीं दिखा।
मध्यम वर्ग की उम्मीदें
मध्यम वर्ग, जो देश की अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है, हमेशा बजट से कुछ राहत की उम्मीद रखता है। आयकर में छूट, महंगाई भत्ता, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च में कमी—यह सब मध्यम वर्ग की प्राथमिकताएं हैं। लेकिन इस बार भी इन मुद्दों पर कोई बड़ी राहत नहीं मिली।
रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतें, बच्चों की शिक्षा का खर्च, स्वास्थ्य सेवाओं का महंगा होना—यह सब मध्यम वर्ग को आर्थिक दबाव में रखता है। क्या बजट में इन समस्याओं का समाधान है? इस पर सवाल उठते हैं।
आर्थिक विकास की गति और समावेशिता
बजट में यह दावा किया गया है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ 7 प्रतिशत से अधिक है और 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। यह निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। लेकिन सवाल यह भी है कि विकास का लाभ कितना समान रूप से वितरित हो रहा है।
आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। अमीर और गरीब के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास का अंतर साफ दिखता है। क्या विकास सिर्फ कुछ चुनिंदा शहरों और उद्योगों तक सीमित नहीं रह गया है?
जमीनी हकीकत से जुड़ाव जरूरी
किसी भी बजट की सफलता इस बात में है कि वह धरातल पर कितना उतरता है। घोषणाएं करना आसान है, लेकिन उन्हें लागू करना और उनका लाभ आम आदमी तक पहुंचाना असली चुनौती है। पिछले कई बजटों में बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणा हुई, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर रहा।
नौकरशाही की जटिलताएं, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी अक्सर योजनाओं की सफलता में बाधा बनती हैं। इस बार की घोषणाओं को सफल बनाने के लिए इन समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा।
बजट 2026 में व्यापार, उद्योग और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। एमएसएमई के लिए फंड, मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन और वस्त्र उद्योग को मजबूती देने की घोषणाएं उम्मीद जगाती हैं। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि किसान, मजदूर, मध्यम वर्ग और बेरोजगार युवाओं की समस्याओं पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए।
विकास तभी सार्थक है जब वह समावेशी हो। जब तक गांव, खेत, छोटे कारोबार और आम आदमी की जिंदगी में बदलाव नहीं आता, तब तक आंकड़ों की चमक धरातल पर फीकी ही रहेगी। उम्मीद है कि इस बजट की घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि वास्तव में देश की आर्थिक तस्वीर बदलने में सहायक होंगी।