Mamta Banerjee: देश की सर्वोच्च अदालत में आज एक असाधारण दृश्य देखने को मिला, जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में वकील बनकर पहुंचीं. यह पहली बार हो रहा है जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री शीर्ष अदालत में खुद कानूनी दलीलें देने आई हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में वकील की हैसियत से वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अपनी आपत्तियां रखने पहुंचीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट में इस समय पश्चिम बंगाल में चल रहे एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर सुनवाई चल रही है। ममता बनर्जी इस प्रक्रिया को असंवैधानिक और अपारदर्शी बताते हुए अदालत का ध्यान मताधिकार से जुड़े अधिकारों की ओर खींच रही हैं।
शीर्ष अदालत में जारी है संवैधानिक बहस
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। इस बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली भी शामिल हैं। अदालत में इस समय पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनी जा रही हैं।
ममता बनर्जी इस केस में केवल याचिकाकर्ता नहीं हैं, बल्कि उन्होंने इंटरलॉक्युटरी एप्लिकेशन दाखिल कर खुद पेश होने और व्यक्तिगत रूप से तर्क रखने की अनुमति मांगी है, जिस पर अदालत विचार कर रही है।
ममता बनर्जी का नाम मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट के गेट पास में दर्ज हो चुका था। आज वह पूरे कानूनी दस्तावेजों और तर्कों के साथ अदालत में उपस्थित हैं। उनकी मौजूदगी अदालत के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा का विषय बनी हुई है।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल
बंगाल सरकार की ओर से दाखिल याचिका में यह कहा जा रहा है कि एसआईआर की प्रक्रिया बिना पर्याप्त कारण और जल्दबाजी में चलाई जा रही है। दलील दी जा रही है कि नियमित वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पहले से मौजूद है, ऐसे में विशेष गहन पुनरीक्षण की जरूरत क्यों पड़ी, इस पर चुनाव आयोग अब तक संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है।
लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी पर पारदर्शिता की मांग
सुनवाई के दौरान विशेष तौर पर उस श्रेणी पर चर्चा हो रही है, जिसे चुनाव आयोग ने “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” कहा है। ममता बनर्जी और अन्य याचिकाकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि जिन मतदाताओं के नाम इस श्रेणी में डाले जा रहे हैं, उनकी सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है।
मतदाताओं को सुनवाई का अवसर देने की मांग
ममता बनर्जी अदालत में यह तर्क रख रही हैं कि यदि किसी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जा रहा है, तो उसे इसकी जानकारी देना और सुनवाई का मौका देना संवैधानिक अधिकार है। उनका कहना है कि बिना सूचना नाम हटाना लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।
विपक्ष शासित राज्यों तक सीमित प्रक्रिया?
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठ रहा है कि यह विशेष पुनरीक्षण केवल उन्हीं राज्यों में क्यों किया जा रहा है, जहां विपक्ष की सरकारें हैं। ममता बनर्जी उदाहरण देते हुए असम का जिक्र कर रही हैं, जहां भाजपा की सरकार है और वहां ऐसी कोई प्रक्रिया फिलहाल नहीं चल रही है।
चुनाव आयोग से पहले भी चल रही है तनातनी
यह मामला चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच पहले से चल रही तनातनी की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। हाल ही में हुई एक बैठक में ममता बनर्जी और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच तीखी बहस भी सामने आई थी। उस बैठक की चर्चा भी अप्रत्यक्ष रूप से इस सुनवाई में संदर्भ के रूप में उभर रही है।
ममता बनर्जी अदालत में यह स्पष्ट कर रही हैं कि यह मामला किसी पार्टी विशेष का नहीं है, बल्कि हर नागरिक के मताधिकार से जुड़ा है। वोटर लिस्ट की शुद्धता और पारदर्शिता पर अगर सवाल उठते हैं, तो चुनाव की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं और सुनवाई जारी है। अदालत के रुख और टिप्पणियों पर न सिर्फ पश्चिम बंगाल, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। यह मामला भविष्य में चुनावी प्रक्रियाओं के लिए दिशा तय करता नजर आ रहा है।