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और कितना गिरेगा बॉलीवुड? फिल्म प्रमोशन के लिए दिल्ली से गायब कर दिए 800 से अधिक बच्चे!

और कितना गिरेगा बॉलीवुड? फिल्म प्रमोशन के लिए दिल्ली से गायब कर दिए 800 से अधिक बच्चे!
और कितना गिरेगा बॉलीवुड? फिल्म प्रमोशन के लिए दिल्ली से गायब कर दिए 800 से अधिक बच्चे!

दिल्ली में गुमशुदगी को लेकर वायरल दावों ने डर फैलाया, लेकिन दिल्ली पुलिस के आंकड़े इसे खारिज करते हैं. जनवरी 2026 में मामलों में कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई. सवाल यह भी उठा कि क्या फिल्मों के प्रमोशन के लिए सोशल मीडिया पर डर का माहौल जानबूझकर बनाया गया.

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Delhi Missing People 2026: जनवरी 2026 के आखिर तक पहुंचते-पहुंचते सोशल मीडिया पर एक ऐसी कहानी तैरने लगी, जिसने राजधानी दिल्ली ही नहीं, बल्कि देशभर के माता-पिता को बेचैन कर दिया. व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक पोस्ट और एक्स पर दावे किए जाने लगे कि दिल्ली से सैकड़ों बच्चे, लड़के-लड़कियां और नौजवान अचानक गायब हो रहे हैं. कुछ पोस्ट्स में तो यह तक लिखा गया कि सिर्फ 27 दिनों में 807 लोग लापता हो चुके हैं, जिनमें 137 बच्चे शामिल हैं.

यह आंकड़े डराने वाले थे. जिन परिवारों के बच्चे दिल्ली में पढ़ाई या नौकरी कर रहे हैं, उनके फोन अचानक ज्यादा बजने लगे. हर कोई यही पूछ रहा था—सब ठीक तो है? लेकिन जब डर तेजी से फैलता है, तब सबसे जरूरी होता है ठहरकर सच को देखना. यही से इस कहानी की असली जांच शुरू होती है.

सोशल मीडिया पर कैसे बनी डर की लहर

इस पूरे माहौल की शुरुआत अचानक नहीं हुई. 10 जनवरी 2026 को रानी मुख़र्जी की ‘मर्दानी 3’ फिल्म का पोस्टर सामने आया, जिसमें “मिसिंग” शब्द बार-बार दिखाया गया. पोस्टर में बच्चों की तस्वीरें थीं और माहौल रहस्यमय था. इसके बाद फिल्म का ट्रेलर आया और फिर 30 जनवरी को फिल्म रिलीज हो गई.

दिलचस्प बात यह रही कि फिल्म रिलीज के ठीक अगले दिन से सोशल मीडिया पर दिल्ली के गुमशुदा बच्चों को लेकर पोस्ट्स की बाढ़ आ गई. पहले एक्स पर, फिर फेसबुक और व्हाट्सएप पर आंकड़े घूमने लगे. डर इतना बढ़ा कि न्यूज चैनलों और वेबसाइट्स ने भी इन दावों को जगह देनी शुरू कर दी.

राजनीतिक बयानबाजी ने आग में घी डालने का काम किया. कुछ नेताओं ने इसे कानून-व्यवस्था से जोड़ दिया, तो कुछ ने सरकार पर सवाल उठा दिए. धीरे-धीरे यह दिल्ली की सबसे डरावनी खबर बनती चली गई.

 चलाया गया पेड सोशल मीडिया कैंपेन!

जब कहानी को थोड़ा पीछे जाकर देखा गया, तो कई सवाल खड़े हुए. क्या यह सब महज संयोग था कि एक गुमशुदगी आधारित फिल्म की रिलीज के साथ ही ऐसे दावे वायरल होने लगे? या फिर इसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति थी?

कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा सामने आया कि यह डर एक पेड सोशल मीडिया कैंपेन का नतीजा हो सकता है. मकसद था चर्चा पैदा करना और लोगों के मन में फिल्म से जुड़ा भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाना. हालांकि बॉक्स ऑफिस के आंकड़े बताते हैं कि फिल्म को उम्मीद के मुताबिक फायदा नहीं हुआ, लेकिन सोशल मीडिया पर बना माहौल जरूर असरदार रहा.

दिल्ली पुलिस का आधिकारिक बयान

जब डर हद से ज्यादा बढ़ने लगा, तब दिल्ली पुलिस को सामने आना पड़ा. पुलिस ने साफ शब्दों में कहा कि गुमशुदा बच्चों और लोगों के मामलों में अचानक कोई उछाल नहीं आया है.

दिल्ली पुलिस ने ट्वीट कर नागरिकों से अपील की कि वे अफवाहों का शिकार न हों. साथ ही यह चेतावनी भी दी गई कि आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर डर फैलाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी. पुलिस ने यह भी कहा कि हर बच्चे की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है और लापता लोगों को तलाशने के लिए 24 घंटे काम किया जा रहा है.

असली आंकड़े क्या कहते हैं

अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर—सच में कितने लोग गायब हुए? दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 में 31 तारीख तक कुल 1,777 गुमशुदगी के केस दर्ज हुए. यह संख्या पिछले दो सालों के औसत से कम है.

साल 2025 में पूरे साल में 24,508 लोग गुमशुदा दर्ज किए गए थे और 2024 में यह आंकड़ा 24,893 था. यानी हर महीने औसतन 2,000 से ज्यादा मामले सामने आते रहे हैं. इस लिहाज से जनवरी 2026 कोई असामान्य महीना नहीं रहा.

हैरानी की बात यह है कि पिछले साल के मुकाबले गुमशुदगी के मामलों में करीब 2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. यानी सोशल मीडिया पर जो डर दिखाया गया, वह आंकड़ों से मेल ही नहीं खाता.

फिल्म के प्रमोशन का निचला स्तर

इसे अगर एक कदम आगे जाकर देखें, तो सवाल और भी तीखा हो जाता है. क्या किसी फिल्म के प्रमोशन के लिए समाज में डर, असुरक्षा और माता-पिता की बेचैनी को हथियार बनाया जा सकता है? अगर गुमशुदगी जैसे संवेदनशील मुद्दे को जानबूझकर या रणनीति के तहत हवा दी गई, तो यह सिर्फ मार्केटिंग नहीं बल्कि सामाजिक गैर-जिम्मेदारी है.

बॉलीवुड और फिल्मी सितारों की पहुंच करोड़ों लोगों तक है. ऐसे में उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी समझें. डर बेचकर टिकट बेचने की कोशिश न सिर्फ भरोसे को चोट पहुंचाती है, बल्कि उन परिवारों के जख्म भी कुरेदती है, जो सच में अपने अपनों को ढूंढ रहे हैं. और आखिर में एक बार फिर वही सवाल खड़े होते हैं कि क्या एक फिल्म के प्रमोशन के लिए बॉलीवुड इस तरह से  नीचले स्तर पर भी जा सकती है?

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Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।