चुनाव आयोग की विशेष निगरानी
Mamata Banerjee vs EC: पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची में संशोधन को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच गंभीर टकराव शुरू हो गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में खुद उपस्थित होकर ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपना पक्ष रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बंगाल को निशाना बना रहा है और वहां की जनता के साथ अन्याय कर रहा है। यह विवाद मुख्य रूप से 8,100 माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति को लेकर है, जिन्हें चुनाव आयोग ने विशेष गहन संशोधन यानी SIR के लिए बंगाल में तैनात किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ने सवाल उठाया कि जब यह प्रक्रिया आठ अन्य राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में भी चल रही है, तो केवल बंगाल में ही माइक्रो ऑब्जर्वर क्यों तैनात किए गए हैं। यह मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी काफी संवेदनशील हो गया है।
ममता बनर्जी के आरोप और सवाल
सुप्रीम कोर्ट में खुद पेश होकर अपनी बात रखते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर बंगाल को निशाना बना रहा है। उन्होंने पूछा कि असम में, जहां मार्च-अप्रैल में चुनाव होने हैं, वहां SIR क्यों नहीं किया जा रहा है। मुख्यमंत्री का मुख्य सवाल यह था कि चुनाव आयोग ने बंगाल में करीब 8,100 माइक्रो ऑब्जर्वर क्यों तैनात किए हैं, जबकि मतदाता सूची में संशोधन का वैधानिक अधिकार चुनाव पंजीकरण अधिकारियों यानी EROs के पास है।
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि ये माइक्रो ऑब्जर्वर ज्यादातर बीजेपी शासित राज्यों के सरकारी अधिकारी हैं। पहले भी मुख्यमंत्री ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर SIR की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि ऑब्जर्वर और माइक्रो ऑब्जर्वर बंगाल में प्रक्रिया को बिगाड़ने के लिए छिपे इरादों से डेटा में हेरफेर कर रहे हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने यह भी कहा है कि इन माइक्रो ऑब्जर्वर ने ERO या सहायक ERO यानी AERO के लॉग-इन की जानकारी हासिल कर ली है। ये लोग अब चुनाव आयोग के केंद्रीय ERONET पोर्टल पर SIR के लिए नाम जोड़ने, हटाने और नोटिस भेजने का काम खुद कर रहे हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अनुसार, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का वैधानिक अधिकार केवल ERO या AERO के पास है।
माइक्रो ऑब्जर्वर की भूमिका क्या है
चुनाव आयोग ने अभी तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि बंगाल में तैनात 8,100 माइक्रो ऑब्जर्वर को SIR अभ्यास के संबंध में क्या काम सौंपा गया है। 12 दिसंबर 2025 को पश्चिम बंगाल सहित आठ SIR-बाध्य राज्यों के लिए विशेष रोल ऑब्जर्वर की नियुक्ति की घोषणा की गई थी, लेकिन बंगाल में माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति पर चुनाव आयोग ने कोई बयान नहीं दिया है।
19 दिसंबर 2025 को मुख्य चुनाव अधिकारी को लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने कहा था कि उसने संविधान के अनुच्छेद 324(6) और मतदाता सूची पर मैनुअल 2023 के पैरा 11.4.7 के अनुसार चुनावी रोल माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने के प्रस्ताव पर विचार किया है।
संविधान का अनुच्छेद 324(6) चुनाव आयोग को चुनाव और मतदाता सूची संशोधन के लिए अधिकारियों को नियुक्त करने की शक्ति देता है। मतदाता सूची पर मैनुअल 2023 का पैरा 11.4.7 जिला चुनाव अधिकारी, रोल ऑब्जर्वर और मुख्य चुनाव अधिकारी द्वारा मतदाता सूची की “सुपर-चेकिंग” से संबंधित है। रोल ऑब्जर्वर के लिए कहा गया है कि उन्हें निर्धारित जिलों में 250 फॉर्म का सत्यापन करना होता है।
चुनाव आयोग का पक्ष और तर्क
सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी के आरोप के जवाब में चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि उसे बंगाल में माइक्रो ऑब्जर्वर तैनात करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि राज्य सरकार ने विधानसभा क्षेत्रों के ERO के रूप में नियुक्त करने के लिए पर्याप्त संख्या में उपखंड मजिस्ट्रेट यानी SDM रैंक के अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए थे। चुनाव आयोग ने कहा कि राज्य सरकार ने इसके बजाय ERO की भूमिका के लिए जूनियर रैंक के अधिकारियों के नाम सुझाए थे।
चुनाव आयोग के मतदाता सूची पर मैनुअल 2023 के अनुसार, आम तौर पर ERO SDM या उपखंड अधिकारी यानी SDO रैंक के अधिकारी होते हैं। लेकिन अगर किसी राज्य में पर्याप्त संख्या में SDM या SDO रैंक के अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं, तो तहसीलदार या समकक्ष रैंक के अधिकारियों को ERO के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
चुनाव आयोग का कहना है कि उसे अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह निर्णय केवल बंगाल में मतदाता सूची की गुणवत्ता और सटीकता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है।
पहले के उदाहरण और नई व्यवस्था
हालांकि चुनाव आयोग ने पहले भी माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं, लेकिन वे केवल चुनाव के दिन मतदान के लिए थे, न कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया के लिए। चुनाव आयोग के पास चुनावी प्रक्रियाओं में शामिल विभिन्न अधिकारियों के लिए विस्तृत मैनुअल, दिशानिर्देश और हैंडबुक हैं। लेकिन चुनाव निकाय के किसी भी मौजूदा दस्तावेज में मतदाता सूची संशोधन के लिए माइक्रो ऑब्जर्वर का उल्लेख नहीं है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि “मतदाता सूची संशोधन के लिए पहले कभी माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त नहीं किए गए हैं।” चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध माइक्रो ऑब्जर्वर के लिए मॉडल चेक-लिस्ट 2009 का एक दस्तावेज है जो मतदान के दिन अधिकारियों को पूरे करने वाले कार्यों का विवरण देता है।
चुनाव आयोग का मतदाता सूची पर मैनुअल 2023 भी माइक्रो ऑब्जर्वर का उल्लेख नहीं करता है। हालांकि यह मतदाता सूची ऑब्जर्वर की भूमिका को विस्तार से समझाता है। मैनुअल के अनुसार, “चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची ऑब्जर्वर नियुक्त किए जाते हैं ताकि वे मतदाता सूची के वार्षिक संशोधन के दौरान DEO या ERO की मदद कर सकें, समय पर सुधारात्मक उपाय कर सकें और प्रगति की रिपोर्ट चुनाव आयोग को दे सकें।”
मैनुअल यह भी बताता है कि मंडलायुक्त रैंक के वरिष्ठ अधिकारियों को मतदाता सूची ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया जाना चाहिए।
बंगाल में राजनीतिक माहौल
पश्चिम बंगाल में इस समय राजनीतिक माहौल काफी गर्म है। विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। ऐसे में मतदाता सूची में किसी भी तरह का बदलाव या हेरफेर चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकता है। ममता बनर्जी का आरोप है कि यह पूरी कवायद उन्हें और उनकी पार्टी को कमजोर करने के लिए की जा रही है।
तृणमूल कांग्रेस ने यह भी कहा है कि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और बैंकों के कर्मचारियों को माइक्रो ऑब्जर्वर के रूप में नियुक्त किया गया है। पार्टी का कहना है कि ये लोग तटस्थ नहीं हैं और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए काम कर रहे हैं।
कानूनी और संवैधानिक पहलू
यह मामला अब कानूनी और संवैधानिक स्तर पर काफी महत्वपूर्ण हो गया है। सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि चुनाव आयोग की यह कार्रवाई संवैधानिक है या नहीं। क्या चुनाव आयोग के पास वैधानिक अधिकारी ERO को दरकिनार करके माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने का अधिकार है? क्या यह व्यवस्था पारदर्शी और निष्पक्ष है?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में साफ तौर पर कहा गया है कि मतदाता सूची में संशोधन का अधिकार ERO या AERO के पास है। अगर चुनाव आयोग ने इस अधिकार को किसी और को दे दिया है, तो यह कानून के खिलाफ हो सकता है।
राज्य और केंद्र के बीच संघर्ष
Mamata Banerjee vs EC: यह मामला केवल चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के बीच का नहीं है, बल्कि यह संघीय ढांचे और राज्य की स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है। ममता बनर्जी का आरोप है कि केंद्र सरकार राज्य के मामलों में दखल दे रही है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर रही है।
बंगाल सरकार का कहना है कि उसने पर्याप्त संख्या में अधिकारी उपलब्ध कराए थे और चुनाव आयोग का यह कहना गलत है कि राज्य सरकार ने सहयोग नहीं किया। राज्य सरकार ने कहा है कि माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति एक अनावश्यक और राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम है।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर सुनवाई करेगा और अपना फैसला देगा। यह फैसला न केवल पश्चिम बंगाल के लिए बल्कि पूरे देश में चुनावी प्रक्रियाओं के लिए एक मिसाल बन सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट ममता बनर्जी के पक्ष में फैसला देता है, तो चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करना होगा। वहीं अगर कोर्ट चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला देता है, तो यह व्यवस्था भविष्य में अन्य राज्यों में भी लागू हो सकती है।
यह विवाद भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका और राज्यों के अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल उठाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाता है और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाने के लिए क्या दिशानिर्देश देता है।