Ola Uber Strike: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को अक्सर भविष्य का इंजन कहा जाता है। मोबाइल ऐप, कैशलेस भुगतान और मिनटों में सेवा—यह सब देखने में जितना आकर्षक है, उसकी ज़मीनी हकीकत उतनी ही कठोर भी है। आज 7 फरवरी को ओला, उबर, रैपिडो और पोर्टर जैसे प्लेटफॉर्म्स से जुड़े लाखों ड्राइवरों की देशव्यापी हड़ताल ने इसी हकीकत को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है।
सुबह से ही दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में “नो कैब अवेलेबल” का संदेश आम हो गया। कहीं किराया सामान्य से तीन गुना दिखा तो कहीं यात्रियों को मजबूरन ऑटो, बस या निजी साधनों का सहारा लेना पड़ा। यह सिर्फ एक दिन की असुविधा नहीं थी, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ विरोध था, जिसे ड्राइवर लंबे समय से असमान और अन्यायपूर्ण बता रहे हैं।
गिग इकॉनमी की चकाचौंध के पीछे का संघर्ष
भारत में गिग इकॉनमी का विस्तार तेज़ी से हुआ है। लाखों युवाओं ने इसे रोज़गार का साधन बनाया, लेकिन समय के साथ यह साफ होने लगा कि सुविधा और स्वतंत्रता का यह मॉडल ड्राइवरों के लिए असुरक्षा का दूसरा नाम बनता जा रहा है। न स्थायी आय, न सामाजिक सुरक्षा और न ही किराए पर कोई नियंत्रण—ड्राइवरों का कहना है कि जोखिम उनका है और मुनाफा कंपनियों का।
तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-आधारित ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के नेतृत्व में हुई यह हड़ताल, पिछले साल डिलीवरी बॉयज के आंदोलन के बाद गिग वर्कर्स की दूसरी बड़ी आवाज़ बनकर उभरी है।
किराया तय कौन करता है, ड्राइवर या एल्गोरिदम
ड्राइवरों की नाराज़गी की जड़ में ‘मोटर वाहन एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025’ का अधूरा क्रियान्वयन है। कागज़ों में तो न्यूनतम किराया, काम के घंटे और सुरक्षा के नियम तय हैं, लेकिन ज़मीन पर हालात अलग हैं। ड्राइवरों का आरोप है कि कंपनियां एल्गोरिदम के ज़रिए मनमाना किराया तय करती हैं, जिसमें ड्राइवर की मेहनत और लागत का सही मूल्य नहीं मिलता।
यूनियनों ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को लिखे पत्र में साफ कहा है कि जब तक सरकार किराए का नियमन नहीं करेगी, तब तक ड्राइवरों की आय असुरक्षा खत्म नहीं होगी।
न्यूनतम किराया नहीं, तो सम्मानजनक रोज़गार भी नहीं
ड्राइवरों की सबसे बड़ी मांग न्यूनतम आधार किराया तय करने की है। उनका कहना है कि ईंधन की कीमत, वाहन की मेंटेनेंस और लंबी ड्यूटी के बावजूद कई बार रोज़ की कमाई लागत भी नहीं निकाल पाती। ऐसे में गिग वर्क को रोज़गार कहना सिर्फ शब्दों का खेल बन जाता है।
इसके साथ ही पारदर्शी निगरानी तंत्र और निजी वाहनों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक की मांग भी तेज़ है, क्योंकि इससे प्रोफेशनल ड्राइवरों की कमाई पर सीधा असर पड़ता है।
सुरक्षा के नाम पर अनिवार्य किए गए पैनिक बटन भी ड्राइवरों के लिए एक और आर्थिक बोझ बन गए हैं। महाराष्ट्र कामगार सभा के अनुसार, पुराने उपकरण हटाकर नए बटन लगाने में हज़ारों रुपये खर्च हो रहे हैं। सवाल यह है कि सुरक्षा का खर्च आखिर ड्राइवर ही क्यों उठाए?
भारत टैक्सी और बदलते विकल्प
दिलचस्प संयोग यह है कि यह हड़ताल दिल्ली में सरकार समर्थित ‘भारत टैक्सी’ की लॉन्चिंग के आसपास हुई। शून्य कमीशन और बिना सर्ज प्राइसिंग का दावा करने वाला यह ऐप ड्राइवरों के बीच उम्मीद की तरह देखा जा रहा है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि क्या यह मॉडल लंबी दौड़ में टिक पाएगा।
फिलहाल ओला, उबर और रैपिडो की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विपक्ष ने संसद में इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन ज़मीनी समाधान अब भी दूर दिखता है। यह हड़ताल सिर्फ ड्राइवरों की नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है जो सुविधा तो देता है, सुरक्षा नहीं।