बांग्लादेश चुनाव 2026 क्यों है इतना खास?
Bangladesh Parliamentary Election 2026 Explainer: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाला चुनाव देश के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है. इस बार का चुनाव इसलिए भी अलग है क्योंकि पहली बार देश की पुरानी राजनीतिक दिग्गज शख्सियतें चुनाव से बाहर हैं. करीब 20 साल तक सत्ता में रहीं शेख हसीना अब देश छोड़ चुकी हैं और उनकी पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने की इजाजत भी नहीं मिली है. दूसरी तरफ बांग्लादेश की दूसरी बड़ी नेता खालिदा जिया का हाल ही में निधन हो गया. ऐसे में ये चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है.
पूरे दक्षिण एशिया की निगाहें इस चुनाव पर टिकी हुई हैं. खासकर भारत के लिए भी ये चुनाव काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि बांग्लादेश हमारा पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रिश्ते काफी गहरे हैं. जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल देखी गई है, उसके बाद नई सरकार से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.
अगस्त 2024 के आंदोलन ने बदल दी राजनीति
अगस्त 2024 में बांग्लादेश में छात्रों के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन हुआ था. इस आंदोलन की वजह से शेख हसीना को अपना पद छोड़ना पड़ा और वे भारत चली गईं. उनके जाने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी. इस अंतरिम सरकार ने चुनावी सुधार करने और निष्पक्ष चुनाव कराने की तैयारियां शुरू कीं.
अंतरिम सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अवामी लीग का पंजीकरण निलंबित कर दिया. इस फैसले की वजह से अवामी लीग इस चुनाव में हिस्सा नहीं ले पा रही है. ये बांग्लादेश की राजनीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि अवामी लीग देश की सबसे पुरानी और प्रमुख पार्टियों में से एक रही है. इसकी गैरमौजूदगी ने चुनावी समीकरण को पूरी तरह से बदल दिया है.
अब कौन-कौन हैं मुख्य दावेदार?
अवामी लीग की गैरमौजूदगी के बाद अब मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच देखने को मिल रहा है. बीएनपी की कमान इस समय तारिक रहमान संभाल रहे हैं जो खालिदा जिया के बेटे हैं. तारिक रहमान अपनी पार्टी को एक राष्ट्रवादी और रूढ़िवादी विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं.
जमात-ए-इस्लामी पार्टी पर शेख हसीना के कार्यकाल में प्रतिबंध लगा हुआ था. लेकिन उनके जाने के बाद इस पर से प्रतिबंध हटा दिया गया और अब ये पार्टी फिर से सक्रिय हो गई है. जमात को एक कट्टरपंथी पार्टी के रूप में जाना जाता है. इस पार्टी ने 2024 के आंदोलन से निकले छात्र नेताओं की नेशनल सिटीजन पार्टी के साथ गठबंधन किया है.
नेशनल सिटीजन पार्टी खुद को सुधारवादी और नागरिक-आधारित राजनीति का प्रतिनिधि बता रही है. इसके अलावा जातीय पार्टी के दो गुट जेपी-कादर और जेपी-इरशाद भी चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. वामपंथी दलों का लेफ्ट डेमोक्रेटिक अलायंस और अमार बांग्लादेश पार्टी जैसी नई पार्टियां भी मैदान में उतरी हैं.
कितने दल और उम्मीदवार हैं चुनाव में?
बांग्लादेश के निर्वाचन आयोग के मुताबिक देश में कुल 59 पंजीकृत राजनीतिक दल हैं. इनमें से 51 दल इस बार चुनाव लड़ रहे हैं. कुल मिलाकर 2034 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे हैं जिनमें से 275 निर्दलीय हैं. सबसे ज्यादा 291 उम्मीदवार बीएनपी ने खड़े किए हैं.
जमात-ए-इस्लामी ने 229 उम्मीदवार उतारे हैं जबकि जातीय पार्टी ने 198 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. हालांकि अल्पसंख्यकों की भागीदारी को लेकर कुछ रिपोर्ट्स आई हैं जो बताती हैं कि उनकी भागीदारी सिर्फ दिखावे की है. अल्पसंख्यक समुदायों को लगता है कि उनकी आवाज को सही मायने में नहीं सुना जा रहा है.
बांग्लादेश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति
बांग्लादेश ने 1971 में आजादी पाने के बाद लोकतंत्र और सैन्य शासन दोनों का दौर देखा है. शेख हसीना और खालिदा जिया के शासनकाल में देश ने आर्थिक रूप से काफी प्रगति की और एक प्रमुख निर्यात केंद्र के रूप में उभरा. खासकर कपड़ा उद्योग में बांग्लादेश ने दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई.
हालांकि हाल के वर्षों में आर्थिक विकास दर में कुछ गिरावट देखी गई है. जून 2025 में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में विकास दर सिर्फ 3.97 प्रतिशत रही जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम थी. महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे आम लोगों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं.
युवा आबादी का बड़ा हिस्सा
बांग्लादेश की कुल आबादी लगभग 17.3 करोड़ है और ये दुनिया का आठवां सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है. यहां बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं. इस बार वोट डालने वालों की कुल संख्या 12 करोड़ है. बांग्लादेश की ज्यादातर आबादी 30 साल से कम उम्र की है.
जनसंख्या घनत्व भी बेहद अधिक है. यहां प्रति वर्ग किलोमीटर में 1366 लोग रहते हैं जो दुनिया में सबसे ज्यादा है. राजधानी ढाका की आबादी ही लगभग 3.7 करोड़ है. इतनी बड़ी और युवा आबादी के कारण ये चुनाव देश के भविष्य की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है. युवाओं को रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की उम्मीद है.
चुनावी व्यवस्था कैसे काम करती है?
बांग्लादेश एक संसदीय लोकतंत्र है जो काफी हद तक भारत की व्यवस्था जैसा है. यहां असली शक्तियां प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के पास होती हैं जबकि राष्ट्रपति सिर्फ औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष होते हैं. राष्ट्रपति का चुनाव संसद 5 साल के लिए करती है.
राष्ट्रीय संसद में कुल 350 सीटें होती हैं. इनमें से 300 सीटों पर सीधे चुनाव होते हैं और जनता अपने निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुनती है. बहुमत का आंकड़ा 151 सीटों का है. बाकी की 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं. इन सीटों को आम चुनाव के बाद दलों को मिली सीटों के अनुपात में बांटा जाता है.
भारत की ही तरह यहां भी सभी सांसदों का कार्यकाल 5 साल का होता है. जिस दल या गठबंधन को 300 में से कम से कम 151 सीटें मिल जाती हैं वही सरकार बनाने का दावा पेश करता है. आम तौर पर बहुमत प्राप्त दल का नेता प्रधानमंत्री बनता है और वह मंत्रिमंडल का गठन करता है. प्रधानमंत्री ही देश की नीतियां, प्रशासनिक फैसले और विदेश नीति तय करता है.
प्रशासनिक संरचना
बांग्लादेश प्रशासनिक रूप से आठ संभागों, 64 जिलों और 495 उपजिलाओं में बंटा हुआ है. हालांकि स्थानीय सरकारें मौजूद हैं लेकिन वित्त और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के लिए वे केंद्रीय सरकार पर ही निर्भर रहती हैं. ये व्यवस्था कई बार आलोचना का विषय भी बनती है क्योंकि स्थानीय सरकारों को ज्यादा अधिकार नहीं मिले होते.
भारत के लिए क्यों अहम है ये चुनाव?
बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच लंबी सीमा है. शेख हसीना के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश के रिश्ते काफी मजबूत थे. दोनों देशों के बीच व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सुरक्षा सहयोग में काफी बढ़ोतरी हुई थी.
लेकिन अगस्त 2024 के बाद जो राजनीतिक बदलाव हुए उसके बाद कुछ तनाव देखने को मिले. खासकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हुए हमलों की खबरें आईं थीं जिससे भारत में चिंता बढ़ी. इस चुनाव में जो भी सरकार बनेगी उसकी नीतियां भारत के लिए काफी अहम होंगी.
अगर बीएनपी या जमात समर्थित सरकार बनती है तो भारत-बांग्लादेश रिश्तों में कुछ बदलाव आ सकता है. दूसरी तरफ अगर कोई उदार और सुधारवादी सरकार बनती है तो द्विपक्षीय संबंध मजबूत बने रह सकते हैं. भारत के लिए बांग्लादेश में स्थिरता बेहद जरूरी है क्योंकि ये हमारी पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा से भी जुड़ा है.
चुनाव में मुख्य मुद्दे क्या हैं?
Bangladesh Parliamentary Election 2026 Explainer: इस चुनाव में कई मुद्दे प्रमुख हैं. सबसे पहला मुद्दा है आर्थिक विकास और रोजगार. युवा मतदाता बेहतर रोजगार के अवसर चाहते हैं. महंगाई भी एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि आम लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित हुई है.
दूसरा बड़ा मुद्दा है लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती. लोग चाहते हैं कि चुनाव निष्पक्ष हों और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो. भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना भी एक प्रमुख मांग है.
तीसरा मुद्दा है अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और धार्मिक सद्भाव. हाल में हुई हिंसा की घटनाओं ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है. चौथा मुद्दा है विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ संबंध, खासकर भारत के साथ.
बांग्लादेश में होने वाला ये चुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं बल्कि देश के भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है. पुरानी राजनीति से हटकर नए चेहरों और नए विचारों को मौका मिलेगा. युवा मतदाताओं की भागीदारी इस चुनाव को और खास बनाती है. आने वाले कुछ घंटों में जो नतीजे आएंगे वो न सिर्फ बांग्लादेश बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति पर असर डालेंगे.