दिल्ली में लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर अदालत की बड़ी टिप्पणी
Delhi High Court Seeks Response on 52,000 Missing Persons Case: देश की राजधानी दिल्ली में पिछले कुछ सालों में लोगों के गायब होने की घटनाओं में जिस तरह से तेजी आई है उसने न्याय व्यवस्था और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस स्थिति को बेहद गंभीर माना है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार दोनों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। यह मामला केवल कुछ लोगों के खो जाने का नहीं है बल्कि यह हजारों परिवारों के बिखरने और उनकी सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
अदालत में दाखिल की गई याचिका में बताया गया है कि साल 2016 से लेकर अब तक दिल्ली से हजारों लोग लापता हुए हैं जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की बेंच ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे प्राथमिकता पर रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में लोग कहां गायब हो रहे हैं और प्रशासन उन्हें खोजने के लिए क्या ठोस कदम उठा रहा है।
लापता लोगों के आंकड़ों ने सबको चौंकाया
इस पूरी कानूनी लड़ाई के पीछे जो आंकड़े पेश किए गए हैं वे किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी हैं। याचिका के अनुसार 2016 से लेकर जनवरी 2026 के बीच दिल्ली में कुल 2,32,737 लोग लापता घोषित किए गए थे। हालांकि पुलिस ने इनमें से बहुत से लोगों को ढूंढ निकाला है लेकिन फिर भी 52,326 लोग ऐसे हैं जिनका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इन लापता लोगों में 6,931 बच्चे शामिल हैं जिनकी उम्र 18 साल से कम है। छोटे बच्चों का इस तरह से गायब होना और सालों तक उनका पता न चलना पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं है बल्कि यह कानून व्यवस्था की पूरी तरह से विफलता को दर्शाता है। जब राजधानी में ही लोग सुरक्षित नहीं हैं तो देश के अन्य हिस्सों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वकीलों ने दलील दी कि दिल्ली पुलिस और सरकार अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को निभाने में नाकाम रही हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस गुमशुदगी के मामलों को उतनी गंभीरता से नहीं लेती जितनी जरूरत होती है। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति लापता होता है तो पुलिस एफआईआर दर्ज करने में काफी समय लगा देती है।
वकीलों का कहना है कि लापता होने के शुरुआती कुछ घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं जिन्हें गोल्डन आवर कहा जाता है। अगर पुलिस तुरंत कार्रवाई करे और प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू करे तो लापता व्यक्ति के मिलने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में देरी होने के कारण अपराधी लापता व्यक्ति को शहर या राज्य से बाहर ले जाने में सफल हो जाते हैं। यह मामला सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है जो हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने और सुरक्षा का अधिकार देता है।
मानव तस्करी और संगठित अपराध का खतरा
अदालत में यह भी मुद्दा उठाया गया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गायब होना किसी बड़े संगठित अपराध की ओर इशारा करता है। वकील अभिषेक तिवारी ने दलील दी कि 2026 के शुरुआती 15 दिनों में ही दिल्ली से 800 लोगों का लापता होना एक साधारण घटना नहीं हो सकती। यह मानव तस्करी यानी इंसानों की खरीद-फरोख्त करने वाले गिरोहों की सक्रियता को दर्शाता है।
यह अंदेशा जताया गया है कि लापता होने वाले बच्चों और वयस्कों को अवैध कामों बंधुआ मजदूरी या अन्य आपराधिक गतिविधियों में धकेला जा सकता है। एक ऐसा तंत्र फल-फूल रहा है जो कानून की नजरों से बचकर मासूम लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। याचिका में मांग की गई है कि इस पूरे मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए ताकि इस संगठित नेटवर्क को तोड़ा जा सके।
जीनेट पोर्टल और आधुनिक तकनीक की जरूरत
याचिकाकर्ता ने अदालत से एक और महत्वपूर्ण मांग की है जो पुलिस के डेटा मैनेजमेंट से जुड़ी हुई है। दिल्ली पुलिस लापता लोगों की जानकारी अपडेट करने के लिए जीनेट पोर्टल का इस्तेमाल करती है। याचिका में मांग की गई है कि इस पोर्टल का तकनीकी और डेटा ऑडिट होना चाहिए। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जो भी जानकारी वहां डाली जा रही है वह सटीक हो और उसका समय-समय पर मिलान किया जाए।
अक्सर डेटा में खामियों के कारण भी जांच सही दिशा में नहीं जा पाती है। अगर पोर्टल को और अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाया जाए तो लापता लोगों की पहचान करना और उन्हें उनके परिवार से मिलाना आसान हो सकता है। कोर्ट ने इन सभी तकनीकी पहलुओं पर भी विचार करने का संकेत दिया है।
अगली सुनवाई और भविष्य की उम्मीदें
Delhi High Court Seeks Response on 52,000 Missing Persons Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 फरवरी की तारीख तय की है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से तब तक अपना पक्ष रखने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने यह भी जानने की कोशिश की है कि क्या इसी तरह का कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है ताकि फैसलों में कोई टकराव न हो।
हजारों पीड़ित परिवारों की नजरें अब अदालत के अगले कदम पर टिकी हैं। लोगों को उम्मीद है कि हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली पुलिस अपनी कार्यशैली में सुधार करेगी और लापता लोगों की तलाश के लिए कोई विशेष अभियान चलाया जाएगा। लापता बच्चों के माता-पिता सालों से अपने कलेजे के टुकड़ों का इंतजार कर रहे हैं। अदालत का एक कड़ा आदेश प्रशासन को जगाने का काम कर सकता है ताकि भविष्य में किसी और का घर इस तरह न उजड़े।