BJP Congress Alliance: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां सवाल सिर्फ जीत-हार का नहीं, बल्कि राजनीतिक सिद्धांतों और गठबंधनों की विश्वसनीयता का भी उठने लगा है। जिस कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता है, वही दल अब एक ही मंच पर नजर आ रहे हैं। यह घटनाक्रम अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव से जुड़ा है, लेकिन इसके असर की गूंज राज्य और राष्ट्रीय राजनीति तक सुनाई देने लगी है।
यह गठबंधन इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि महाराष्ट्र में फिलहाल महायुति सरकार है, जिसमें भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शामिल हैं। ऐसे में भाजपा का अपने सहयोगी दल शिवसेना से दूरी बनाकर कांग्रेस के साथ हाथ मिलाना, कई सवालों को जन्म दे रहा है।
कहां और कैसे बना यह गठबंधन
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अंबरनाथ नगर परिषद में मेयर पद के चुनाव के लिए भाजपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। इस निर्णय के तहत भाजपा उम्मीदवार तेजश्री करनजुले को कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का समर्थन मिला। इस अप्रत्याशित तालमेल के चलते तेजश्री करनजुले ने मेयर पद पर जीत दर्ज की।
आंकड़ों की राजनीति और बहुमत का खेल
मेयर पद के चुनाव में कुल 32 पार्षदों का समर्थन भाजपा उम्मीदवार को मिला। इनमें भाजपा के 16 पार्षदों के अलावा कांग्रेस के 12 और एनसीपी के 4 पार्षद शामिल थे। यह स्पष्ट करता है कि यह गठबंधन सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि पूरी रणनीति के तहत बनाया गया था। नगर परिषद जैसे स्थानीय निकाय में सत्ता हासिल करना भले ही छोटा लक्ष्य लगे, लेकिन इससे मिलने वाला राजनीतिक संदेश बड़ा होता है।
शिवसेना की नाराजगी और तीखी प्रतिक्रिया
इस घटनाक्रम से शिवसेना खासा नाराज नजर आ रही है। शिंदे गुट के नेताओं ने इसे राजनीतिक विश्वासघात करार दिया है। शिवसेना विधायक बालाजी किनिकर ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि जो पार्टी वर्षों से “कांग्रेस मुक्त भारत” की बात करती रही, वह अब कांग्रेस के साथ सत्ता में क्यों बैठी है।
शिवसेना नेताओं का मानना है कि यह गठबंधन महायुति की आत्मा के खिलाफ है और इससे गठबंधन की विश्वसनीयता को ठेस पहुंची है। उनके अनुसार, यह कदम सहयोगी दल की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है।
भाजपा का पक्ष और उसका तर्क
भाजपा ने इस पूरे मामले में अपना बचाव करते हुए कहा है कि यह फैसला स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया। भाजपा नेताओं का कहना है कि अंबरनाथ में शिवसेना के साथ गठबंधन की कोशिशें की गई थीं, लेकिन सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद मजबूरी में अन्य दलों के साथ समझौता किया गया।
भाजपा नेताओं ने शिवसेना पर वर्षों से भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए और कहा कि ऐसे दल के साथ गठबंधन करना स्थानीय स्तर पर उचित नहीं था। उनके मुताबिक, नगर परिषद चुनाव में विचारधारा से ज्यादा प्रशासनिक स्थिरता और विकास को प्राथमिकता दी गई।
क्या महायुति में बढ़ेगी दरार
इस घटनाक्रम ने महायुति के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि यह गठबंधन नगर परिषद स्तर तक सीमित है, लेकिन राजनीति में संदेश और संकेत अक्सर ज्यादा मायने रखते हैं। शिवसेना की नाराजगी अगर यूं ही बनी रही, तो आने वाले समय में तालमेल में तनाव बढ़ सकता है।