Romeo-Juliet Clause: भारत में कानून का उद्देश्य अपराध रोकना और पीड़ित को न्याय दिलाना होता है, लेकिन जब वही कानून निर्दोषों के लिए सजा बन जाए, तब सवाल उठना लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले कानून पॉक्सो एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए एक बेहद संवेदनशील और व्यावहारिक सुझाव दिया है—‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ को कानून का हिस्सा बनाने का।
पॉक्सो एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पॉक्सो जैसे सख्त कानून का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है। कोर्ट ने माना कि कई मामलों में यह कानून वास्तविक अपराधों की बजाय आपसी सहमति से बने किशोर रिश्तों पर थोप दिया जाता है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपेक्षा की कि वह इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए ऐसे कानूनी सुधारों पर विचार करे, जिससे निर्दोष किशोरों को कठोर सजा से बचाया जा सके।
किस मामले से उठा यह मुद्दा
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश सरकार की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक आरोपी को दी गई जमानत को चुनौती दी गई थी। मामला एक नाबालिग लड़की से संबंधित था, जहां हाईकोर्ट ने तथ्यों को देखते हुए जमानत दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह तो माना कि हाईकोर्ट का तर्क पूरी तरह सही नहीं था, लेकिन साथ ही आरोपी को दी गई जमानत को बरकरार रखा। इसी दौरान कोर्ट ने पॉक्सो के दुरुपयोग पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
क्यों जरूरी है रोमियो-जूलियट क्लॉज
सुप्रीम कोर्ट ने जिस ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ की बात की है, उसका उद्देश्य बेहद स्पष्ट है—आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखना।
भारत में पॉक्सो एक्ट के तहत नाबालिग की सहमति को कोई महत्व नहीं दिया जाता। ऐसे में यदि 17 साल की लड़की और 18 साल से कम उम्र का लड़का आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, तो कानून की नजर में वह सीधा अपराध बन जाता है।
कई बार परिवार की नाराज़गी, सामाजिक दबाव या बदले की भावना के चलते लड़के के खिलाफ पॉक्सो का केस दर्ज करा दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि बिना किसी आपराधिक मंशा के एक किशोर को जेल, मुकदमे और सामाजिक बदनामी का सामना करना पड़ता है।
कानून और समाज के बीच संतुलन की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह पॉक्सो कानून को कमजोर नहीं करना चाहता। यह कानून आज भी बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर यौन अपराधों से सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन कोर्ट का मानना है कि कानून को इतना संवेदनशील होना चाहिए कि वह असली अपराध और नासमझी में बने रिश्ते के बीच फर्क कर सके।
दुरुपयोग पर लगाम लगाने की मांग
कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजने का आदेश दिया है, ताकि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। इसमें यह भी सुझाव दिया गया है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए, जो कानून का इस्तेमाल बदले या दबाव बनाने के लिए करते हैं।