कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने हाल ही में एक बड़ा बयान देकर अपनी ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को आईना दिखाया है। दुबई में अमृता न्यूज के एक कार्यक्रम में बोलते हुए थरूर ने साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ विचारधारा की शुद्धता से न तो देश चलता है और न ही राजनीति में सफलता मिलती है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों में केंद्र सरकार के साथ सहयोग को लेकर अक्सर बहस होती रहती है।
थरूर ने अपने संबोधन में कहा कि राजनीति में सफल होने के लिए कभी-कभी अलग-अलग सोच वाले लोगों के साथ भी काम करना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल की राजनीति में हर किसी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विचारधारा के मामले में पूरी तरह शुद्धतावादी हो, जिसकी वजह से हम विरोधी पक्ष की अच्छाइयां नहीं देख पाते हैं।
विचारधारा की शुद्धता पर सवाल
थरूर का मानना है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में लोग सिर्फ विचारधारा की शुद्धता में ही दिलचस्पी रखते हैं। लेकिन उन्होंने साफ किया कि इस तरीके से काम नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अगर किसी ने चुनाव जीता है और सरकार बनाई है, तो उसे स्वीकार करना होगा। उन्होंने राज्य सरकारों के उदाहरण देते हुए समझाया कि अगर राज्य सरकार केंद्र के साथ सहयोग नहीं करेगी, तो विकास कार्य कैसे होंगे।
कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि यह दृष्टिकोण सिर्फ केरल या किसी एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि सहयोग करना राज्य के हित में है, लोगों के हित में है और देश के नागरिकों के हित में है।
निष्पक्ष टिप्पणी पर भी विवाद
थरूर ने एक और मुद्दे पर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने बताया कि जब भी वे प्रधानमंत्री के किसी भाषण पर निष्पक्ष टिप्पणी करते हैं, तो उन्हें राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जाता है। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए एक वीडियो में उन्होंने कहा कि उनकी एक तटस्थ पोस्ट पर भी प्रधानमंत्री की तारीफ करने का आरोप लगा दिया गया, जबकि उन्होंने तारीफ का एक भी शब्द नहीं कहा था।
थरूर ने कहा कि उन्होंने बस प्रधानमंत्री के भाषण के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन आजकल का माहौल ऐसा है कि लोग हर चीज को राजनीतिक चश्मे से ही देखते हैं। उनका मानना है कि यह सोच देश के लिए सही नहीं है।
केंद्र के साथ सहयोग की जरूरत
थरूर ने केरल मूल के श्रोताओं के बीच बोलते हुए कहा कि केंद्र सरकार के साथ सहयोग करना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें सच्चाई से यह मानना होगा कि सहयोग हमारे हित में है। यह सिर्फ एक राज्य या एक समुदाय के हित में नहीं, बल्कि पूरे भारत और केरल दोनों के नागरिकों के हित में है।
उन्होंने अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा कि भले ही वे सत्ताधारी पार्टी से सहमत नहीं हैं, लेकिन यह सच है कि उन्हें देश में जनादेश मिला है। इसलिए उनके साथ काम करना जरूरी है। थरूर ने कहा कि अगर केंद्र सरकार कोई ऐसी योजना लेकर आती है जिससे राज्य को पैसा मिल सकता है, तो वे अपने विश्वास के दायरे में रहते हुए उस पर बात करेंगे ताकि अपने राज्य के लिए फंड ला सकें।
योजनाओं को खारिज करना पागलपन
थरूर ने एक घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि हाल ही में एक योजना को खारिज कर दिया गया और पैसा देने से मना कर दिया गया, जबकि केरल को उसकी सख्त जरूरत थी। उन्होंने कहा कि स्कूलों को उस पैसे की जरूरत थी, लेकिन विचारधारा की जिद में उसे ठुकरा दिया गया। थरूर ने इसे पागलपन करार देते हुए कहा कि यह टैक्सपेयर्स का पैसा है और केरल को मिलना चाहिए था।
उनका यह बयान राज्य सरकारों की उस सोच पर एक सीधा हमला माना जा रहा है जो विरोध की राजनीति में इतनी उलझ जाती हैं कि वे अपने राज्य के विकास से समझौता कर देती हैं।
राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत
थरूर के इस बयान से यह साफ होता है कि वे राजनीति में एक अलग तरह की परिपक्वता की वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि राजनीति सिर्फ विरोध करने का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता के हित में काम करने का माध्यम है। अगर विरोधी दल होने के बावजूद केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने से जनता को फायदा होता है, तो उसमें कोई बुराई नहीं है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आजकल की राजनीति में लोग इतने कट्टर हो गए हैं कि वे दूसरे पक्ष की किसी भी अच्छी बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते। यह रवैया न सिर्फ राजनीति के लिए खराब है, बल्कि देश के विकास में भी बाधा बनता है।
विपक्ष की भूमिका पर सवाल
थरूर का यह बयान विपक्षी राजनीति की भूमिका पर भी एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। क्या विपक्ष का काम सिर्फ विरोध करना है या उसे रचनात्मक सहयोग भी देना चाहिए? थरूर के मुताबिक, विपक्ष को अपनी विचारधारा के साथ खड़े रहते हुए भी जनता के हित में केंद्र सरकार के साथ काम करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम हर मुद्दे पर सिर्फ विरोध करते रहेंगे और सहयोग नहीं करेंगे, तो हम अपने ही राज्य और लोगों का नुकसान कर रहे होंगे। यह दृष्टिकोण खासतौर पर उन राज्यों के लिए जरूरी है जहां विपक्षी दलों की सरकार है।
कांग्रेस में बहस का मुद्दा
शशि थरूर का यह बयान कांग्रेस पार्टी के भीतर भी बहस का मुद्दा बन सकता है। पार्टी के कुछ नेता और कार्यकर्ता उनके इस नजरिए से सहमत हो सकते हैं, जबकि कुछ इसे पार्टी लाइन से अलग मान सकते हैं। लेकिन थरूर ने अपने विचार रखने में कभी संकोच नहीं किया है और वे अक्सर पार्टी की आधिकारिक स्थिति से अलग राय रखते हैं।
थरूर का यह बयान इस बात का भी संकेत है कि कांग्रेस के भीतर विभिन्न सोच वाले नेता हैं और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है। हालांकि, यह देखना होगा कि पार्टी का नेतृत्व उनके इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देता है।
थरूर के इस बयान ने भारतीय राजनीति में सहयोग और विरोध के बीच संतुलन की जरूरत को फिर से रेखांकित किया है। उनका मानना है कि राजनीति में विचारधारा महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता का हित सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर केंद्र सरकार के साथ सहयोग से जनता को फायदा होता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह दृष्टिकोण भारतीय राजनीति में एक नई बहस की शुरुआत कर सकता है।