देश की सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार 30 जनवरी को एक ऐसा फैसला सुनाया है जो लाखों स्कूली छात्राओं के जीवन में बदलाव लाने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया है कि वे सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों को नि:शुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएं। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा माना है।
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि मासिक धर्म से जुड़ा स्वास्थ्य केवल एक सामान्य मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हर लड़की की गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार सिर्फ जिंदा रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार भी शामिल है।
संवैधानिक अधिकार के रूप में मासिक धर्म स्वास्थ्य
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, उसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ है बिना किसी अपमान, भेदभाव और अनावश्यक कष्ट के जीवन जीना। स्कूलों में अगर लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान उचित सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो यह उनकी गरिमा का उल्लंघन है।
पीठ ने माना कि मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसके लिए किसी भी लड़की को शर्मिंदगी या असुविधा का सामना नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर स्कूलों में सैनिटरी पैड और साफ-सुथरे शौचालय नहीं हैं, तो लड़कियां स्कूल जाने से कतराती हैं या फिर मासिक धर्म के दिनों में अनुपस्थित रहती हैं, जो उनकी शिक्षा पर सीधा असर डालता है।
निजी स्कूलों की मान्यता रद्द होने का खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में निजी स्कूलों को भी सख्त चेतावनी दी है। अदालत ने कहा कि अगर कोई निजी स्कूल छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड और अलग शौचालय की सुविधा देने में विफल रहता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम केवल सरकारी स्कूलों के लिए नहीं, बल्कि सभी मान्यता प्राप्त स्कूलों के लिए अनिवार्य होगा।
इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकारों को भी आगाह किया है कि अगर वे इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने में असफल रहती हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि सरकारों का यह दायित्व है कि वे सुनिश्चित करें कि हर स्कूल में लड़कियों को जरूरी स्वच्छता सुविधाएं मिलें।
दिव्यांग छात्रों के लिए भी विशेष प्रावधान
अदालत ने अपने आदेश में दिव्यांग बच्चों की जरूरतों का भी ध्यान रखा है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी स्कूलों में दिव्यांग छात्र-छात्राओं के लिए अनुकूल शौचालय बनाए जाएं। यह फैसला समावेशी शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पीठ ने कहा कि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक है जब सभी बच्चों को समान अवसर और सुविधाएं मिलें। दिव्यांग बच्चों को भी स्कूल में सम्मान और सुविधा के साथ पढ़ने का पूरा अधिकार है।
शिक्षा और स्वास्थ्य का सीधा संबंध
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का अधिकार केवल कक्षा में बैठने तक सीमित नहीं है। अगर किसी लड़की को मासिक धर्म के दौरान उचित सुविधाएं नहीं मिलतीं और वह स्कूल नहीं आ पाती, तो यह उसके शिक्षा के अधिकार का सीधा हनन है।
कोर्ट ने कहा कि देश में अभी भी कई स्कूल ऐसे हैं जहां लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं और न ही सैनिटरी पैड की व्यवस्था है। इस कारण कई लड़कियां मासिक धर्म के दिनों में स्कूल नहीं जा पातीं और उनकी पढ़ाई में बाधा आती है। यह स्थिति समाज के लिए शर्मनाक है और इसे तुरंत बदलने की जरूरत है।
समानता और निजता का सवाल
अदालत ने निजता और समानता के सिद्धांतों को भी इस फैसले का आधार बनाया। कोर्ट ने कहा कि निजता गरिमा से जुड़ी है और राज्य का यह कर्तव्य है कि वह न केवल निजता की रक्षा करे, बल्कि उसे बढ़ावा देने के लिए भी कदम उठाए।
पीठ ने कहा कि समान अवसर तभी संभव हैं जब सभी को आवश्यक जानकारी और संसाधन मिलें। अगर किसी लड़की को मासिक धर्म के बारे में जानकारी नहीं है या उसके पास सैनिटरी पैड नहीं हैं, तो वह शिक्षा में पीछे रह जाएगी। यह असमानता को बढ़ावा देता है।
समाज के लिए संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में समाज को एक गहरा संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा, “यह फैसला उस बच्ची के लिए है जो झिझक के कारण मदद नहीं मांग पाती, उस शिक्षक के लिए है जो मदद करना चाहता है लेकिन संसाधनों की कमी से बंधा है, और उन माता-पिता के लिए है जो चुप्पी के असर को नहीं समझते।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म के कारण अगर कोई लड़की स्कूल नहीं जा पाती, तो इसमें गलती उसकी नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच की है। समाज को मासिक धर्म को एक सामान्य और प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना होगा और इसे शर्म का विषय बनाना बंद करना होगा।
जनहित याचिका की पृष्ठभूमि
यह फैसला जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर आया है, जिसमें केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं के लिए देशभर में लागू करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने 10 दिसंबर 2024 को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था और अब 30 जनवरी को अपना अंतिम आदेश सुनाया है।
यह फैसला भारत में लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे न केवल स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं में सुधार होगा, बल्कि समाज में मासिक धर्म को लेकर जागरूकता भी बढ़ेगी।