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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, कहा- “कब हमला कर दें, कोई नहीं जानता”

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, कहा-  “कब हमला कर दें, कोई नहीं जानता”
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों को लेकर चल रही सुनवाई ने मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन की जरूरत को रेखांकित किया है। कोर्ट ने रेबीज और सड़क दुर्घटनाओं के खतरे पर चिंता जताते हुए नियमों के सख्त पालन पर जोर दिया है।

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Dipali Kumari
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Supreme Court Stray Dogs: देशभर में आवारा कुत्तों का मुद्दा कोई नया नहीं है, लेकिन समय के साथ यह समस्या सिर्फ पशु कल्याण तक सीमित नहीं रह गई है। यह अब सीधे तौर पर आम आदमी की सुरक्षा, बच्चों की जिंदगी और सार्वजनिक स्थलों की व्यवस्था से जुड़ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में इस विषय पर चल रही सुनवाई ने एक बार फिर इस जटिल और संवेदनशील मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने जो टिप्पणियां कीं, वे सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी की तरह भी देखी जा रही हैं। पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि यह अंदाजा लगाना संभव नहीं है कि किसी आवारा कुत्ते के मन में क्या चल रहा है और वह कब किसी पर हमला कर दे। यह टिप्पणी उन परिवारों की चिंता को आवाज देती है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस डर के साथ जी रहे हैं।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ कर रही है, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल हैं। पीठ ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यह मामला सिर्फ भावनाओं से नहीं, बल्कि कानून, विज्ञान और सार्वजनिक सुरक्षा के आधार पर देखा जाएगा।

संस्थागत परिसरों को लेकर पहले ही दिए गए निर्देश

7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील और संस्थागत क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि कुत्तों की उचित नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें आश्रय स्थलों में स्थानांतरित किया जाए।

रेबीज से आगे की समस्या

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि आवारा कुत्तों से खतरा सिर्फ रेबीज जैसी बीमारियों तक सीमित नहीं है। सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम भी तेजी से बढ़ रहा है। अचानक सड़क पर आ जाने वाले कुत्तों के कारण दोपहिया और चारपहिया वाहन हादसों का शिकार हो रहे हैं, जिनमें कई बार जानलेवा परिणाम सामने आते हैं।

डॉग लवर्स का पक्ष

डॉग लवर्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि सभी कुत्तों को आश्रय स्थलों में रखना न तो शारीरिक रूप से संभव है और न ही आर्थिक रूप से। उन्होंने यह भी कहा कि बड़े पैमाने पर कुत्तों को पकड़ना समाधान नहीं है और इससे स्थिति और बिगड़ सकती है। सिब्बल ने जोर दिया कि समस्या का समाधान वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से ही संभव है।

राज्यों की जवाबदेही पर सवाल

पीठ ने यह भी कहा कि कई राज्यों ने अब तक कोर्ट के निर्देशों पर जवाब तक नहीं दिया है। न्यायालय ने चेतावनी दी कि जो राज्य लापरवाही बरत रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। यह टिप्पणी केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी तय करती है और यह संकेत देती है कि अब सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलेगा।

आम लोगों की चिंता और रोजमर्रा का डर

शहरों और कस्बों में सुबह स्कूल जाने वाले बच्चे, मॉर्निंग वॉक पर निकलने वाले बुजुर्ग और देर रात लौटने वाले कर्मचारी—सभी इस समस्या से प्रभावित हैं। कई जगहों पर लोग शिकायत करने के बाद भी समाधान न मिलने से हताश हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई उन आवाजों को मंच देती है, जो अब तक अनसुनी रह जाती थीं।

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Dipali Kumari

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