जरूर पढ़ें

झारखंड में हाथी का आतंक: रातभर में उजड़ गया पूरा परिवार, मासूम बच्चे समेत 5 लोगों की मौत

झारखंड में हाथी का आतंक
झारखंड में हाथी का आतंक (File Photo)
पश्चिमी सिंहभूम में जंगली हाथी के लगातार हमलों ने गांवों में दहशत फैला दी है। जनवरी के पहले सप्ताह में कई परिवार उजड़ गए, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल हैं। मुआवजे से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की मांग तेज हो गई है।
Updated:

Elephant Attack Jharkhand: पश्चिमी सिंहभूम के जंगलों से सटे गांव इन दिनों सिर्फ अंधेरे से नहीं, बल्कि डर से भी घिरे हुए हैं। 6 जनवरी की रात नोवामुंडी प्रखंड के बाबरिया गांव में जो हुआ, वह किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे इलाके की त्रासदी बन चुका है। जंगली हाथी के हमले में एक ही परिवार के पांच सदस्यों की मौत से हर किसी की रूह कांप उठी.

रात करीब 10 बजे, जब गांव के लोग अपने घरों में सो रहे थे, तभी हाथी ने अचानक एक कच्चे घर पर हमला कर दिया। सोते हुए पति-पत्नी, उनके दो मासूम बच्चे और पास के ही दूसरे परिवार के एक सदस्य को संभलने तक का मौका नहीं मिला। एक बच्चा किसी तरह बच गया, लेकिन उसके सामने ही उसका पूरा संसार उजड़ गया। बाबरिया गांव में सनातन मेराल, उनकी पत्नी जोंकों कुई, उनके बच्चे और मोगदा लागुरी की मौत ने पूरे क्षेत्र को सन्नाटे में डाल दिया।

बाबरिया गांव से आगे भी मौत का सिलसिला

बाबरिया गांव तक हाथी का कहर सीमित नहीं रहा। बड़ा पासीया गांव में भी एक ग्रामीण की जान चली गई, वहीं लांपाईसाई गांव में एक और व्यक्ति हाथी के हमले का शिकार हुआ। इन गांवों में मृतकों की पहचान भले देर से हो रही हो, लेकिन डर हर घर तक पहुंच चुका है। लोग रात में सोने से डर रहे हैं और बच्चों को घर से बाहर निकलने नहीं दे रहे।

1 जनवरी से शुरू हुआ हाथियों का तांडव

जनवरी की शुरुआत से ही पश्चिमी सिंहभूम में हाथी इंसानी जान के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

1 जनवरी की रात टोंटो प्रखंड के बांडीझारी गांव में मंगल सिंह हेंब्रम की मौके पर ही मौत हो गई। उसी रात बिरसिंहहातु गांव में उर्दूप बहंदा और रोरो गांव में विष्णु सुंडी भी हाथी की चपेट में आ गए। दो महिलाएं गंभीर रूप से घायल हुईं, जिनकी जिंदगी अब भी संघर्ष कर रही है।

2 जनवरी को गोइलकेरा के सायतवा गांव में 13 वर्षीय रेंगा कयोम की मौत ने सभी को झकझोर दिया। उसी दिन चक्रधरपुर में दस साल की बच्ची ढिंगी गागराई गंभीर रूप से घायल हो गई।

4 जनवरी को अमराई कितापी गांव में एक महिला की जान चली गई, जबकि उसके पति और बेटे को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पांच जनवरी को मिस्त्रीबेड़ा गांव में जोंगा लागुरी की मौत और उनके पति का गंभीर रूप से घायल होना इस भयावह सूची में और नाम जोड़ गया।

6 जनवरी की रात: जब मासूम भी नहीं बचे

6 जनवरी की रात गोइलकेरा के सोवा गांव में हाथी ने एक ही परिवार के तीन लोगों की जान ले ली। छह साल का बच्चा, आठ महीने की बच्ची और उनके पिता की मौत ने मानवता को शर्मसार कर दिया। तीन साल की बच्ची जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। इसके बाद हाथी ने कुईलसूता गांव पहुंचकर 21 वर्षीय युवक को मार डाला।

प्रशासन और वन विभाग की तैयारी पर सवाल

हर घटना के बाद वन विभाग की टीम पहुंचती है, मुआवजे की बात होती है और हाथी की निगरानी शुरू होने का दावा किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब एक ही इलाके में लगातार मौतें हो रही हैं, तो स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा। ग्रामीणों का कहना है कि न तो पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था है, न ही हाथी को गांवों से दूर रखने के पुख्ता इंतजाम।

जंगल और इंसान के बीच बढ़ता टकराव

जंगलों का सिमटना, खनन गतिविधियां और हाथियों के पारंपरिक रास्तों का खत्म होना इस संघर्ष की बड़ी वजह है। हाथी अपना रास्ता ढूंढते हुए गांवों में घुस रहे हैं और कीमत इंसानी जानों से चुकानी पड़ रही है।

Rashtra Bharat
Rashtra Bharat पर पढ़ें ताज़ा खेल, राजनीति, विश्व, मनोरंजन, धर्म और बिज़नेस की अपडेटेड हिंदी खबरें।

Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।