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Shibu Soren Birthday: जानिए दिशोम गुरु की कहानी, जिनके सपनों से बना झारखंड

Shibu Soren Birthday: जानिए दिशोम गुरु की कहानी, जिनके सपनों से बना झारखंड
Shibu Soren Birthday: जानिए दिशोम गुरु की कहानी

झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक दिशोम गुरु शिबू सोरेन के 82वें जन्मदिन पर पूरा झारखंड राज्य उन्हें याद कर रहा है. आदिवासी अधिकारों से लेकर झारखंड राज्य निर्माण तक उनका संघर्ष आज भी राजनीति और समाज को मार्गदर्शन देता है।

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Dipali Kumari
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Shibu Soren Birthday: आज झारखंड की मिट्टी एक बार फिर अपने सबसे बड़े जननेता को याद कर रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक, झारखंड आंदोलन के प्राण और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की आज 82 वां जन्मदिन है। 11 जनवरी 1944 को जन्मे शिबू सोरेन भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनकी राजनीति और उनका सपना आज भी झारखंड की आत्मा में सांस ले रहा है। 4 अगस्त 2025 को उनके निधन के बाद यह उनकी पहली जयंती है.

आज रांची से लेकर गांव-टोला तक, पार्टी कार्यालयों से लेकर आदिवासी बहुल इलाकों तक, दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि दी जा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की उपस्थिति में राजधानी रांची में मुख्य कार्यक्रम आयोजित है, जबकि धनबाद, दुमका, बोकारो, रामगढ़ समेत पूरे राज्य में झामुमो कार्यकर्ता अपने नेता को याद कर रहे हैं।

संघर्ष से जन्मी राजनीति और अन्याय के खिलाफ आवाज

शिबू सोरेन का जीवन किसी पाठ्यपुस्तक की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड के आदिवासी समाज के दर्द और संघर्ष की जीवंत तस्वीर है। उनका जन्म रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ। उनके पिता सोबरन मांझी एक शिक्षक थे, जो आदिवासियों की जमीन और अधिकारों की लड़ाई खुलकर लड़ते थे। उस दौर में महाजन कर्ज के जाल में फंसाकर आदिवासियों की जमीन हड़प लेते थे। सोबरन मांझी ने इसका विरोध किया, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

जब यह घटना हुई, तब शिबू सोरेन मात्र 13 वर्ष के थे। पिता की हत्या ने उनके बचपन को छीन लिया, लेकिन उसी दिन उनके भीतर अन्याय के खिलाफ आग जल उठी। यही वह मोड़ था, जहां से एक साधारण आदिवासी बालक भविष्य का जननेता बनने की राह पर चल पड़ा।

धनकटनी आंदोलन और जननेता का उदय

पिता की शहादत के बाद शिबू सोरेन ने महाजनों के खिलाफ धनकटनी आंदोलन की शुरुआत की। यह आंदोलन केवल फसल काटने का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान वापस पाने का प्रतीक था। आदिवासी अपने हक की फसल महाजनों के खेतों से काटकर ले जाते थे। तीर-धनुष से लैस युवाओं और महिलाओं की भागीदारी ने इस आंदोलन को जनआंदोलन बना दिया।

एक चर्चित घटना में जब पुलिस उन्हें पकड़ने गांव पहुंची, तो शिबू सोरेन ने स्वयं पुलिस को रास्ता दिखाया। गांव पहुंचते ही महिलाओं ने पुलिस को घेर लिया और शिबू सोरेन बच निकले। यह घटना उनकी निर्भीकता और रणनीति दोनों को दर्शाती है। इसी दौर में उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि मिली, यानी ऐसा गुरु जो पूरे देश को राह दिखाए।

झारखंड राज्य आंदोलन का केंद्रीय स्तंभ

झारखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई में शिबू सोरेन की भूमिका ऐतिहासिक रही। उन्होंने बिनोद बिहारी महतो और कॉमरेड ए.के. राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। यह संगठन सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि झारखंडी अस्मिता की आवाज बना।

1980 में शिबू सोरेन ने दुमका से पहली बार लोकसभा में कदम रखा। इसके बाद वे आठ बार दुमका का प्रतिनिधित्व करते रहे। संसद के भीतर और बाहर उन्होंने झारखंड के आदिवासियों, दलितों और वंचितों की आवाज को मजबूती से उठाया। वे नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे, लेकिन सत्ता में रहते हुए भी जमीन से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा।

मुख्यमंत्री बने, पर अधूरा रह गया सपना

शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि वे झारखंड के निर्माता होकर भी कभी पूरा कार्यकाल मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देख सके। 2005 में वे मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाए। 2008 और 2009 में भी उन्हें यह जिम्मेदारी मिली, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों और विधायकी संकट के कारण कुर्सी छोड़नी पड़ी।

विरासत और वर्तमान की जिम्मेदारी

आज दिशोम गुरु की विरासत को उनके पुत्र हेमंत सोरेन आगे बढ़ा रहे हैं, जो वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। लेकिन यह विरासत केवल सत्ता की नहीं, बल्कि संघर्ष, संवेदना और जनता से जुड़े रहने की है।
दिशोम गुरु आज भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका सपना, उनकी आवाज और उनका संघर्ष आज भी झारखंड की राजनीति और समाज को दिशा दे रहा है।

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Dipali Kumari

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