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Amravati News: अंधेरे में डूबा अमरावती रोड फ्लायओवर, विभागों की उदासीनता से खतरे में जनजीवन

Amravati Road Flyover Nagpur: नए स्ट्रीट लाइट लगे लेकिन चालू नहीं, NHAI और महावितरण में ठनी
Amravati Road Flyover Nagpur: नए स्ट्रीट लाइट लगे लेकिन चालू नहीं, NHAI और महावितरण में ठनी

Amravati News: अमरावती रोड फ्लायओवर के नीचे यूनिवर्सिटी कैंपस से भरतनगर चौक तक लगे नए स्ट्रीट लाइट महीनों से बंद हैं। NHAI और महावितरण आपस में जिम्मेदारी टाल रहे हैं। अंधेरे में दुर्घटना का गंभीर खतरा, नागरिकों में असुरक्षा का माहौल।

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अमरावती रोड पर यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर भरतनगर चौक तक फैले फ्लायओवर के नीचे की सड़क पर घुप्प अंधेरा छाया रहता है। नए स्ट्रीट लाइट तो लगा दिए गए हैं, लेकिन वे महीनों से बंद पड़े हैं। इस अंधेरे में रोज हजारों वाहन गुजरते हैं, दोपहिया सवार और पैदल चलने वाले अपनी जान हथेली पर रखकर इस सड़क का उपयोग करते हैं। और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिम्मेदार विभाग आपस में आरोप-प्रत्यारोप के खेल में लगे हैं, जबकि आम नागरिकों की सुरक्षा दांव पर लगी है।

सड़क पर अंधेरा, जिम्मेदारी में अंधकार

यह घटना नागपुर की नहीं, बल्कि पूरे देश में सरकारी तंत्र की उस मानसिकता की कहानी है जहां नागरिकों की सुरक्षा से ज्यादा विभागीय अहंकार और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश महत्वपूर्ण हो जाती है। स्ट्रीट लाइट लग गए हैं, यानी पैसा खर्च हो चुका है, लेकिन उन्हें चालू करने के लिए NHAI (राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) और महावितरण के बीच समन्वय नहीं हो पा रहा।

एक कहता है दूसरे की जिम्मेदारी है, दूसरा कहता है पहले की। और इस खींचतान के बीच, जो सबसे ज्यादा पीड़ित है वह है आम नागरिक – वाहन चालक, दोपहिया सवार, पैदल चलने वाले, और खासकर महिलाएं जिन्हें रात के समय इस अंधेरे से गुजरना पड़ता है।

खतरे की गंभीरता

फ्लायओवर के नीचे की सड़क पर अंधेरा होना सामान्य समस्या नहीं है। यह एक गंभीर सुरक्षा खतरा है। रात के समय जब वाहन तेज गति से गुजर रहे होते हैं, तब अंधेरे में कोई भी पैदल चलने वाला, कोई खड़ा वाहन, या सड़क पर कोई अवरोध दिखाई नहीं देता। इससे दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

दोपहिया सवारों के लिए तो यह और भी खतरनाक है। गड्ढे, टूटी सड़क, या कोई अन्य बाधा अंधेरे में दिखाई नहीं देती और अचानक उससे टकराने से गंभीर दुर्घटना हो सकती है।

विभागीय ठेलमठोल का शिकार नागरिक

NHAI और महावितरण के बीच की यह जिम्मेदारी की लुका-छिपी नई नहीं है। देश भर में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहां दो या अधिक विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण जनता को परेशानी होती है।

लेकिन सवाल यह है कि जब स्ट्रीट लाइट लगाने का काम हुआ होगा, तब क्या योजना नहीं बनाई गई थी कि बिजली कनेक्शन कौन देगा? क्या टेंडर में यह स्पष्ट नहीं था कि संपूर्ण काम किसकी जिम्मेदारी है?

नौकरशाही का जाल

सरकारी विभागों में काम की जटिलता और नौकरशाही का जाल इतना घना होता है कि एक सीधा-सा काम भी महीनों लटक जाता है। फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर घूमती रहती हैं, लेकिन निर्णय नहीं होता।

इस मामले में भी यही हो रहा है। NHAI कहता है कि महावितरण को बिजली कनेक्शन देना है, महावितरण कहता है कि पहले NHAI को कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी हैं। और इस बीच, हर रात हजारों नागरिक उस अंधेरे से गुजरने को मजबूर हैं।

नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि

किसी भी सभ्य समाज में नागरिकों की सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सड़कों पर उचित रोशनी होना बुनियादी आवश्यकता है, विलासिता नहीं। खासकर फ्लायओवर जैसे व्यस्त मार्गों पर जहां हर समय भारी यातायात रहता है।

लेकिन यहां जो हो रहा है वह नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सरकारी तंत्र की घोर उदासीनता को दर्शाता है। स्ट्रीट लाइट लगा दिए, फोटो खिंचवा लिए, उद्घाटन हो गया, लेकिन वास्तव में काम नहीं कर रहे तो क्या फायदा?

महिलाओं की असुरक्षा

अंधेरी सड़कों पर सबसे ज्यादा असुरक्षित महिलाएं महसूस करती हैं। रात के समय जब उन्हें इस रास्ते से गुजरना पड़ता है, तो भय का माहौल होता है। अपराध की घटनाएं अंधेरे में ज्यादा होती हैं।

क्या जिम्मेदार अधिकारी अपनी बहन-बेटियों को इस अंधेरी सड़क से रात में गुजरने के लिए भेजेंगे? अगर नहीं, तो फिर दूसरों की बहन-बेटियों की सुरक्षा की चिंता क्यों नहीं?

दुर्घटना की आशंका हमेशा बनी रहती है

अंधेरी सड़क पर दुर्घटना कभी भी हो सकती है। यह सिर्फ आशंका नहीं, बल्कि एक वास्तविक खतरा है। हर दिन जो बीत रहा है, वह एक संभावित त्रासदी के करीब ला रहा है।

अगर कल को कोई दुर्घटना हो जाती है और किसी की जान चली जाती है, तो कौन जिम्मेदार होगा? NHAI कहेगा हमारी जिम्मेदारी नहीं थी, महावितरण कहेगा हमें सूचना नहीं मिली। लेकिन जो जान गई, वह वापस नहीं आएगी।

रिएक्टिव बनाम प्रोएक्टिव

हमारी सरकारी व्यवस्था हमेशा रिएक्टिव (प्रतिक्रियाशील) रहती है, प्रोएक्टिव (सक्रिय) नहीं। जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो जाती, तब तक कोई कदम नहीं उठाया जाता। फिर हड़बड़ी में काम होता है, जांच बिठाई जाती है, निलंबन होते हैं।

लेकिन समय रहते अगर सतर्कता बरती जाए, तो कितनी जानें बचाई जा सकती हैं। यह मामला भी इसी का उदाहरण है। स्ट्रीट लाइट लग चुके हैं, बस उन्हें चालू करने की देरी है। लेकिन यह “छोटी सी” देरी किसी की जान ले सकती है।

समन्वय की कमी

विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी एक व्यापक समस्या है। हर विभाग अपने दायरे में काम करता है और दूसरे विभाग से तालमेल बिठाने में रुचि नहीं लेता।

इस मामले में NHAI ने फ्लायओवर बनाया, स्ट्रीट लाइट भी लगवा दिए। अब बिजली कनेक्शन के लिए महावितरण से संपर्क करना था। लेकिन शायद वह औपचारिक प्रक्रिया में कहीं अटक गया।

एकल खिड़की प्रणाली की जरूरत

ऐसी परियोजनाओं के लिए एकल खिड़की प्रणाली (Single Window System) होनी चाहिए जहां सभी विभागों का समन्वय एक ही स्थान पर हो। परियोजना शुरू करने से पहले सभी विभागों को बैठाकर स्पष्ट जिम्मेदारियां तय की जाएं।

लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा बहुत कम होता है। हर विभाग अपने काम तक सीमित रहता है और समग्र परियोजना की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता।

जनप्रतिनिधियों की भूमिका

ऐसे मामलों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों – विधायक, पार्षद, निगम आयुक्त – की क्या भूमिका है? क्या उन्हें इस समस्या की जानकारी नहीं है? अगर है, तो क्या कार्रवाई की गई?

जनप्रतिनिधियों का काम सिर्फ चुनाव के समय वोट मांगना नहीं है। उनकी जिम्मेदारी है कि वे अपने क्षेत्र की ऐसी समस्याओं पर ध्यान दें और संबंधित विभागों पर दबाव बनाएं।

जनता की आवाज

नागरिकों को भी आवाज उठानी चाहिए। सोशल मीडिया, स्थानीय अखबार, शिकायत पोर्टल – कई माध्यम हैं। अगर सामूहिक रूप से दबाव बनाया जाए, तो विभाग कार्रवाई करने को मजबूर होते हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से हम ऐसी समस्याओं को नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं। “सरकारी काम है, होगा कभी” कहकर चुप बैठ जाते हैं।

तत्काल कार्रवाई की मांग

यह मामला तत्काल ध्यान और कार्रवाई की मांग करता है। NHAI और महावितरण दोनों विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत बैठक करनी चाहिए और इस समस्या का समाधान निकालना चाहिए।

अगर बिजली कनेक्शन में कोई तकनीकी या प्रशासनिक अड़चन है, तो उसे प्राथमिकता से हल किया जाए। नागरिकों की सुरक्षा का सवाल है, इसमें किसी भी तरह की ढिलाई स्वीकार्य नहीं है।

जिम्मेदारी तय हो

साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार है। अगर किसी अधिकारी या विभाग की लापरवाही है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने।

भविष्य के लिए सबक

यह घटना भविष्य की परियोजनाओं के लिए सबक है। जब भी कोई बुनियादी ढांचा परियोजना शुरू हो, तब सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाए। केवल निर्माण करना काफी नहीं है, उसे पूरी तरह कार्यशील बनाना भी जरूरी है।

स्ट्रीट लाइट लगाने का क्या फायदा अगर वे काम ही न करें? यह सरकारी पैसे की बर्बादी है और नागरिकों के साथ धोखा है।

पूर्ण परियोजना योजना

हर परियोजना के लिए पूर्ण योजना होनी चाहिए जिसमें निर्माण से लेकर रखरखाव तक सभी पहलू शामिल हों। सभी संबंधित विभागों को शुरू से ही जोड़ा जाए और उनकी जिम्मेदारियां स्पष्ट की जाएं।


अमरावती रोड फ्लायओवर के नीचे बंद पड़े स्ट्रीट लाइट की यह कहानी हमारी सरकारी व्यवस्था की उस खामी को उजागर करती है जहां नागरिकों की सुरक्षा से ज्यादा विभागीय औपचारिकताएं और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश महत्वपूर्ण हो जाती है।

NHAI और महावितरण के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। हर रात जो अंधेरे से गुजरती है, वह एक संभावित दुर्घटना के करीब ले जाती है।

यह मामला केवल स्ट्रीट लाइट का नहीं है। यह नागरिकों की सुरक्षा, सरकारी जवाबदेही और विभागीय समन्वय का मामला है। तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

संबंधित अधिकारियों से अपील है कि वे अपनी आपसी खींचतान भूलकर नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दें। स्ट्रीट लाइट तुरंत चालू किए जाएं और भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

नागपुर के नागरिक, खासकर जो रोज इस मार्ग का उपयोग करते हैं, उन्हें भी सतर्क रहने और इस मुद्दे पर आवाज उठाने की जरूरत है। सामूहिक दबाव से ही सरकारी तंत्र को जगाया जा सकता है।


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Gangesh Kumar

Rashtra Bharat में Writer, Author और Editor। राजनीति, नीति और सामाजिक विषयों पर केंद्रित लेखन। BHU से स्नातक और शोधपूर्ण रिपोर्टिंग व विश्लेषण के लिए पहचाने जाते हैं।