केंद्रीय बजट 2026 की घोषणा के बाद महाराष्ट्र में खुशी की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जब यह ऐलान किया कि राज्य को करीब एक लाख करोड़ रुपये मिलेंगे, तो यह सुनकर लगा जैसे महाराष्ट्र के विकास में एक नया अध्याय शुरू होने वाला है। लेकिन क्या वाकई यह रकम राज्य की तस्वीर बदल देगी? क्या यह पैसा उन लोगों तक पहुंचेगा जिन्हें सबसे ज्यादा इसकी जरूरत है? आइए, इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं।
एक लाख करोड़ की हकीकत
मुख्यमंत्री फडणवीस ने बताया कि केंद्रीय करों के बंटवारे से महाराष्ट्र को 98,306 करोड़ रुपये मिलेंगे और विभिन्न परियोजनाओं के लिए 12,355 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यानी कुल मिलाकर करीब 1,10,661 करोड़ रुपये। यह राशि निश्चित रूप से बड़ी है और इससे कई योजनाओं को गति मिल सकती है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी जरूरी है। केंद्रीय करों से मिलने वाला हिस्सा कोई विशेष अनुदान नहीं है, बल्कि यह राज्य का संवैधानिक अधिकार है। हर साल राज्यों को केंद्रीय करों से उनका हिस्सा मिलता है। असली सवाल यह है कि क्या इस बार का आवंटन पिछले साल की तुलना में ज्यादा है? क्या महाराष्ट्र को उसकी आर्थिक योगदान के अनुपात में उचित हिस्सा मिल रहा है?
बुनियादी ढांचे में निवेश का दावा
बजट में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 12 लाख करोड़ रुपये के निवेश की बात कही गई है, जो पहले केवल 1 लाख करोड़ था। यह 12 गुना बढ़ोतरी सुनने में बेहद आकर्षक लगती है। मुंबई-पुणे और पुणे-हैदराबाद हाई-स्पीड कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं निश्चित रूप से राज्य की कनेक्टिविटी और व्यापार को बढ़ावा देंगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये परियोजनाएं समय पर पूरी होंगी? हमने पहले भी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं की घोषणाएं देखी हैं जो सालों-साल अधूरी पड़ी रहीं। मुंबई मेट्रो, कोस्टल रोड, समृद्धि एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि की कहानियां किसी से छिपी नहीं हैं। इस बार क्या अलग होगा?
शहरीकरण की योजना और जमीनी हकीकत
पांच लाख की आबादी वाले शहरों के समग्र विकास पर ध्यान देने की बात की गई है। महाराष्ट्र में ऐसे कई शहर हैं जो तेजी से बढ़ रहे हैं – नासिक, औरंगाबाद, नागपुर, सोलापुर, कोल्हापुर। इन शहरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, यातायात की समस्या, पानी की किल्लत और प्रदूषण जैसी दिक्कतें हैं।
योजनाबद्ध शहरीकरण की बात तो अच्छी है, लेकिन क्या इसमें झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए भी कोई व्यवस्था है? क्या शहरों के विस्तार के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाएगा? क्या स्थानीय निकायों को इतनी आर्थिक और प्रशासनिक स्वायत्तता मिलेगी कि वे अपने शहर की समस्याओं को प्रभावी ढंग से हल कर सकें?
कृषि और किसानों की चिंता
बजट में कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और सिंचाई के लिए प्रावधान की बात की गई है। महाराष्ट्र में लाखों किसान हैं जो सूखे, बाढ़, फसल के उचित दाम न मिलने और कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं। विदर्भ और मराठवाड़ा में किसान आत्महत्याओं की समस्या आज भी गंभीर है।
क्या बजट में इन समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस योजना है? न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, कर्ज माफी, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार – ये सब किसानों की प्राथमिकताएं हैं। लेकिन इन मुद्दों पर स्पष्टता नहीं दिखती। सिर्फ प्रावधान की बात करना काफी नहीं है, उसका सही इस्तेमाल कैसे होगा, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
महिला सशक्तिकरण के वादे
लखपति दीदी योजना के बाद महिलाओं के लिए अलग मॉल और उद्योग के अवसरों की बात की गई है। यह कदम सराहनीय है क्योंकि महिला उद्यमिता को बढ़ावा देना जरूरी है। हर जिले में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली छात्राओं के लिए छात्रावास की योजना भी अच्छी पहल है।
लेकिन यहां भी सवाल उठते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं, जो खेती, मजदूरी और घरेलू उद्योगों में लगी हैं, क्या उन्हें भी इन योजनाओं का लाभ मिलेगा? क्या छात्रावासों में सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण भोजन और शिक्षा के लिए उचित वातावरण होगा? अक्सर ऐसी योजनाएं सिर्फ शहरी या अर्धशहरी क्षेत्रों तक सीमित रह जाती हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति
जिला अस्पतालों में आपात चिकित्सा सेवाओं को बेहतर बनाने की बात की गई है। यह बेहद जरूरी कदम है क्योंकि महाराष्ट्र के ग्रामीण और छोटे शहरों में स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत बेहद खराब है। डॉक्टरों की कमी, दवाइयों का अभाव, आधुनिक उपकरणों की कमी – ये सब आम समस्याएं हैं।
लेकिन क्या सिर्फ बजट आवंटन से यह समस्या हल हो जाएगी? स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए डॉक्टरों और नर्सों की भर्ती, बुनियादी ढांचे का सुधार, दवाओं की समय पर आपूर्ति और प्रशासनिक सुधार जरूरी हैं। क्या इन सब पर ध्यान दिया जाएगा?
रोजगार और उद्योग की स्थिति
बजट में उद्योग और उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात की गई है। महाराष्ट्र पहले से ही औद्योगिक रूप से विकसित राज्य है, लेकिन पिछले कुछ सालों में कई उद्योग गुजरात और अन्य राज्यों में शिफ्ट हो गए हैं। निवेश आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार को प्रतिस्पर्धी नीतियां बनानी होंगी।
लेकिन सिर्फ बड़े उद्योगों पर ध्यान देना काफी नहीं है। छोटे और मध्यम उद्योग, जो लाखों लोगों को रोजगार देते हैं, उन्हें भी प्रोत्साहन चाहिए। बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे।
क्षेत्रीय असंतुलन की समस्या
महाराष्ट्र में मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों में विकास तो दिखता है, लेकिन विदर्भ, मराठवाड़ा और कोंकण के कई हिस्से अभी भी पिछड़े हुए हैं। क्या बजट में इन क्षेत्रों के संतुलित विकास के लिए कोई विशेष प्रावधान है?
मुंबई-पुणे कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं तो अच्छी हैं, लेकिन क्या विदर्भ और मराठवाड़ा के लिए भी ऐसी कोई योजना है? क्या पिछड़े जिलों में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए कोई विशेष पैकेज है?
पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल
बड़ी-बड़ी घोषणाएं करना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना असली चुनौती है। महाराष्ट्र में कई योजनाओं में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की शिकायतें आती रही हैं। ठेकेदारों और नौकरशाहों की मिलीभगत से अक्सर परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है और गुणवत्ता खराब हो जाती है।
इस बार की घोषणाओं को सफल बनाने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। हर परियोजना की प्रगति की नियमित समीक्षा होनी चाहिए और जनता को इसकी जानकारी मिलनी चाहिए। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है।
केंद्रीय बजट में महाराष्ट्र को करीब एक लाख करोड़ रुपये मिलने की घोषणा निश्चित रूप से सकारात्मक है। बुनियादी ढांचे, शहरीकरण, कृषि, महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किए गए प्रावधान राज्य के विकास में योगदान दे सकते हैं।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये घोषणाएं केवल कागजों पर सिमटी रहेंगी या जमीन पर उतरेंगी? क्या इस पैसे का फायदा उन लोगों को मिलेगा जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है – किसानों, मजदूरों, बेरोजगार युवाओं, छोटे व्यापारियों को?
विकास तभी सार्थक है जब वह समावेशी हो, जब हर क्षेत्र और हर वर्ग को उसका लाभ मिले। महाराष्ट्र जैसे बड़े और विविधतापूर्ण राज्य में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच की खाई को पाटना, और हर नागरिक तक विकास का लाभ पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है।
उम्मीद करते हैं कि मुख्यमंत्री फडणवीस और उनकी टीम इन चुनौतियों को समझेगी और इस बजट को राज्य के वास्तविक विकास का माध्यम बनाएगी। लेकिन इसके लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि ईमानदार प्रयास, पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही की जरूरत होगी।