उम्र सिर्फ एक संख्या है, यह कहावत शायद डॉ. पांडे के लिए ही बनी है। नागपुर विश्वविद्यालय के 97 वर्षीय पूर्व छात्र को जल्द ही ‘डॉक्टर ऑफ लिटरेचर’ की प्रतिष्ठित उपाधि से नवाजा जाएगा। यह खबर न केवल शिक्षा जगत के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक संदेश है जो मानते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
अर्थशास्त्र में अनुसंधान का सफर
नागपुर विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने बताया कि डॉ. पांडे को यह उपाधि अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनके गहन शोध के लिए दी जा रही है। उनकी थीसिस का विषय ‘वैश्विक आर्थिक मंदी’ है, जो वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है। इस शोध में उन्होंने दुनिया भर में आर्थिक संकट के कारणों, प्रभावों और समाधानों पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है।
जीवनभर सीखने की ललक
डॉ. पांडे की कहानी यह साबित करती है कि ज्ञान अर्जित करने की चाह में उम्र कोई बाधा नहीं है। 97 वर्ष की आयु में भी उनका शोध कार्य पूरा करना और डॉक्टरेट हासिल करना युवा पीढ़ी के लिए एक मिसाल है। देश भर में ऐसे कम ही उदाहरण मिलते हैं जहां इतनी उम्र में कोई व्यक्ति उच्च शिक्षा की डिग्री प्राप्त करता हो।
शैक्षणिक संस्थानों के लिए गौरव
नागपुर विश्वविद्यालय के लिए यह क्षण बेहद गौरवान्वित करने वाला है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस उपलब्धि को अपने संस्थान की शैक्षणिक उत्कृष्टता का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा कि डॉ. पांडे जैसे समर्पित शोधार्थी का होना किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए सम्मान की बात है।
समाज के लिए प्रेरणा
डॉ. पांडे की यह उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह दर्शाता है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह संदेश है कि वे अपनी उम्र को सीमा न मानें और अपनी रुचियों को आगे बढ़ाते रहें।
यह घटना भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक नया अध्याय जोड़ती है और साबित करती है कि ज्ञान की खोज जीवनपर्यंत चलने वाली यात्रा है।