नागपुर की स्थानीय राजनीति में एक अजीबोगरीब घटना सामने आई है जिसने पूरे शहर में सियासी हलचल मचा दी है। भारतीय जनता पार्टी के ही कार्यकर्ताओं ने अपनी पार्टी के नगरसेवक प्रत्याशी किशन गावंडे को उनके अपने घर में बंद करके नामांकन फॉर्म वापस लेने के लिए दबाव बनाया। यह घटना नागपुर महानगर पालिका चुनाव की तैयारियों के बीच हुई है और इसने पार्टी के अंदरूनी विवादों को सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया है।
घटना का पूरा विवरण
किशन गावंडे ने नागपुर महानगर पालिका के चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र भरा था। शुरुआत में उन्हें बीजेपी कार्यकर्ताओं का समर्थन भी मिला था। लेकिन अचानक स्थिति बदल गई और वही कार्यकर्ता जिन्होंने पहले उनका साथ दिया था, अब उनके खिलाफ हो गए। सूत्रों के अनुसार, कुछ पार्टी नेताओं की नाराजगी के बाद कार्यकर्ताओं ने गावंडे पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
घटना के दिन, बीजेपी कार्यकर्ताओं का एक समूह किशन गावंडे के घर पहुंचा। उन्होंने गावंडे से फॉर्म वापस लेने की मांग की। जब गावंडे ने इनकार किया, तो कार्यकर्ताओं ने उन्हें उनके ही घर के लॉकर रूम में बंद कर दिया। करीब एक घंटे तक वे वहां फंसे रहे। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने जोरदार नारेबाजी की और फॉर्म वापसी की मांग को लेकर बवाल मचाया।
पार्टी के अंदरूनी विवाद
यह घटना बीजेपी की अंदरूनी राजनीति और गुटबाजी को साफ तौर पर दर्शाती है। नागपुर में महानगर पालिका चुनाव को लेकर पार्टी के अंदर कई गुट सक्रिय हैं। हर गुट अपने समर्थित प्रत्याशी को मैदान में उतारना चाहता है। किशन गावंडे के नामांकन से कुछ नेताओं को आपत्ति थी क्योंकि उनका अपना कोई और चेहरा उस क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहता था।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, गावंडे को शुरू में समर्थन देने वाले कार्यकर्ताओं पर बाद में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने दबाव बनाया। इसके बाद इन कार्यकर्ताओं ने अपना रुख बदल लिया और गावंडे के खिलाफ हो गए। यह स्थानीय राजनीति में होने वाली उठापटक का एक जीता जागता उदाहरण है।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
इस घटना की खबर जैसे ही फैली, स्थानीय लोगों में आक्रोश देखा गया। कई लोगों ने इसे लोकतंत्र का मजाक बताया। एक स्थानीय निवासी ने कहा कि जो पार्टी दूसरों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाती है, वह अपने ही प्रत्याशी के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है। यह बेहद शर्मनाक है।
सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने सवाल उठाया कि अगर पार्टी को गावंडे के नामांकन से आपत्ति थी तो उन्हें पहले ही मना क्यों नहीं किया गया। पहले समर्थन देना और फिर बलपूर्वक फॉर्म वापस लेने का दबाव बनाना कहां तक उचित है।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटना नागपुर की स्थानीय राजनीति में बढ़ते तनाव का संकेत है। बीजेपी जो महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, उसके अंदर भी कई विवाद चल रहे हैं। नगर निकाय चुनावों में टिकट वितरण को लेकर हमेशा विवाद होते हैं, लेकिन इस तरह की घटना दुर्लभ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और कार्यकर्ताओं के इस व्यवहार की जांच करनी चाहिए। अगर प्रत्याशी चयन में कोई गलती हुई थी तो उसे लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाया जाना चाहिए था।
आगे क्या होगा
अब सवाल यह है कि किशन गावंडे अपना नामांकन वापस लेंगे या नहीं। घटना के बाद उन्होंने अभी तक कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। पार्टी नेतृत्व भी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के वरिष्ठ नेता इस मामले को आंतरिक रूप से सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।
अगर गावंडे अपना नामांकन वापस नहीं लेते हैं तो यह विवाद और बढ़ सकता है। वहीं अगर वे दबाव में आकर फॉर्म वापस ले लेते हैं तो यह पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
नागपुर में हुई यह घटना राजनीतिक दलों के अंदर चल रहे सत्ता संघर्ष और गुटबाजी को दर्शाती है। यह घटना यह भी बताती है कि स्थानीय चुनावों में किस तरह की राजनीति होती है। एक ओर जहां पार्टियां जनता के सामने लोकतंत्र और अनुशासन की बात करती हैं, वहीं अंदरूनी मामलों में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं।
यह जरूरी है कि राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा दें। किसी भी विवाद को हिंसा या दबाव से नहीं बल्कि बातचीत और समझदारी से सुलझाया जाना चाहिए। नागपुर की यह घटना भारतीय राजनीति में होने वाली ऐसी ही कई घटनाओं में से एक है जो लोकतंत्र के लिए चुनौती पेश करती हैं।
अब देखना होगा कि बीजेपी नेतृत्व इस मामले में क्या कदम उठाता है और किशन गावंडे का अंतिम फैसला क्या होता है। नागपुर की जनता और राजनीतिक विश्लेषक इस मामले पर पूरी नजर बनाए हुए हैं।