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भारतीय भाषाओं की शाब्दिक समानता को समझना होगा – प्रो. सर्राजू

Understanding Indian Languages Similarity: भारतीय भाषाओं की समानता पर जोर, राष्ट्रीय एकता की कुंजी
Understanding Indian Languages Similarity: भारतीय भाषाओं की समानता पर जोर, राष्ट्रीय एकता की कुंजी

Understanding Indian Languages Similarity: नागपुर विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में भारतीय भाषा समिति के सलाहकार प्रो. सर्राजू ने भारतीय भाषाओं की शाब्दिक समानता को समझने पर जोर दिया। हिंदी-मराठी के समान शब्दों पर चर्चा हुई और सरदार पटेल पर पुस्तक का विमोचन किया गया।

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Understanding Indian Languages Similarity: भाषाएं किसी भी देश की सांस्कृतिक पहचान होती हैं। भारत जैसे विविधता से भरे देश में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन अलग-अलग भाषाओं में कितनी समानता है? नागपुर में हाल ही में आयोजित एक राष्ट्रीय कार्यशाला में इसी विषय पर गहन चर्चा हुई। इस कार्यक्रम में भारतीय भाषा समिति के विशेषज्ञों ने बताया कि हमारी भाषाओं में जो समानता है, वह राष्ट्रीय एकता की मजबूत नींव बन सकती है।

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में यह दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें देशभर से हिंदी, मराठी और संस्कृत के लगभग 40 विषय विशेषज्ञों ने भाग लिया।

भारतीय भाषाओं में छिपी समानता

भारतीय भाषा समिति के सलाहकार प्रो. सर्राजू ने कार्यशाला के समापन समारोह में कहा कि भारतीय भाषाओं की मूल प्रकृति लगभग एक समान है। उन्होंने बताया कि भले ही अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाती हैं, लेकिन उनमें अर्थ की दृष्टि से काफी समानता पाई जाती है।

प्रो. सर्राजू ने समझाया कि प्रयोग के स्तर पर भले ही कुछ अंतर हो, लेकिन शब्दों के अर्थ और भाव लगभग एक जैसे होते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि क्षेत्रीय अस्मिताओं को ध्यान में रखते हुए भी हमें भाषाओं की शाब्दिक समानता को समझने की जरूरت है। यह समझ ही राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने का काम करेगी।

भाषाएं राष्ट्र को जोड़ने का माध्यम

प्रो. सर्राजू ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि भाषाएं सिर्फ संवाद या बातचीत का माध्यम नहीं हैं। वे राष्ट्र को जोड़ने का भी एक सशक्त माध्यम रही हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की अंतर्सूत्रता को समझने के लिए हमें भाषाओं के बीच की समानता को पहचानना होगा।

उन्होंने बताया कि हमारी भाषाओं में वैविध्य के बावजूद पर्याप्त समानता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सांस्कृतिक दृष्टि से यह राष्ट्र एक है। एक ही संस्कृति से जुड़े होने के कारण हमारी भाषाएं भी आपस में जुड़ी हुई हैं। यह समानता ही हमारी विविधता में एकता का आधार है।

समान शब्द संग्रह की आवश्यकता

प्रो. सर्राजू ने भारतीय भाषाओं के समान शब्दों के संग्रह और निर्माण की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर हम विभिन्न भाषाओं में समान या मिलते-जुलते शब्दों का संग्रह तैयार करें, तो यह भाषाई समझ को बढ़ाने में मददगार होगा। ऐसा संग्रह राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक ठोस कदम होगा।

हिंदी और मराठी की समान प्रकृति

कार्यक्रम की प्रमुख अतिथि डॉ. वंदना खुशलानी ने अपने उद्बोधन में हिंदी और मराठी भाषा की समान प्रकृति पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि भाषाएं सामाजिक अनुबंध का माध्यम हैं। यानी समाज में रहने वाले लोग आपस में जो समझौते करते हैं, जो नियम बनाते हैं, वह सब भाषा के माध्यम से ही संभव होता है।

डॉ. खुशलानी ने बताया कि भाषाओं के जरिए ही समाज के विविध क्रियाकलाप संपन्न होते हैं। चाहे वह व्यापार हो, शिक्षा हो, प्रशासन हो या फिर सामाजिक रिश्ते – सब कुछ भाषा के माध्यम से ही चलता है। उन्होंने कहा कि भाषाओं के जरिए ही मानवीय अंतर्संबंध मजबूत होते हैं।

समन्वय के लिए समान शब्दों का प्रयोग जरूरी

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि अजय पाठक ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय तभी स्थापित होगा जब समान शब्दों का व्यवहार बढ़ेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि अलग-अलग भाषाओं में जो समान या मिलते-जुलते शब्द हैं, उनका प्रयोग बढ़ाना चाहिए। इससे एक भाषा बोलने वाला दूसरी भाषा को आसानी से समझ सकेगा।

शब्द ही राष्ट्रीय एकीकरण के आधार

कार्यशाला के संयोजक डॉ. मनोज पाण्डेय ने संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के समान शब्द ही राष्ट्रीय एकीकरण के आधार हैं। उन्होंने कहा कि शब्द ही राष्ट्र को और समाज को जोड़ने के माध्यम हैं। भाषा केवल बोलचाल का जरिया नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच और संस्कृति को भी दर्शाती है।

डॉ. पाण्डेय ने एक गहरी बात कही कि अगर भाषाएं संरक्षित होंगी तो जीवन सुरक्षित होगा। भाषाओं का संरक्षण सिर्फ शब्दों को बचाना नहीं है, बल्कि संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखना है। उन्होंने कहा कि भाषाओं के संरक्षण से संबंध सुदृढ़ होंगे और समाज में भाईचारा बढ़ेगा।

सरदार पटेल पर पुस्तक का विमोचन

कार्यक्रम में एक विशेष पल तब आया जब भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित एक पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक राष्ट्र शिल्पी सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती के निमित्त प्रकाशित की गई है। इस पुस्तक का संपादन डॉ. मनोज पाण्डेय ने किया है। अतिथियों ने मिलकर इस पुस्तक का विमोचन किया।

सरदार पटेल ने भारत को एक सूत्र में पिरोने का काम किया था। उनकी 150वीं जयंती पर प्रकाशित यह पुस्तक भाषाई एकता के विषय पर आयोजित इस कार्यशाला के लिए बेहद उपयुक्त थी।

काव्य गोष्ठी में कवियों ने किया काव्य पाठ

कार्यशाला के दौरान एक काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में कई प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। डॉ. लोकेंद्र सिंह, अविनाश बागड़े, अनिल मालोकर, नीरज श्रीवास्तव जैसे कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से भाषा और संस्कृति के महत्व को उजागर किया।

वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के महानिदेशक नरेंद्र कुमार, सत्येंद्र प्रसाद सिंह, शशिकांत शर्मा सहित अनेक कवियों ने काव्य पाठ में भाग लिया। इन कविताओं में भाषा की मधुरता और उसकी शक्ति को बखूबी दर्शाया गया।

विशेषज्ञों की उपस्थिति

दो दिवसीय कार्यशाला में देशभर से आए विषय विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इनमें डॉ. प्रकाश कोपार्डे (हैदराबाद), डॉ. दिनेश पाठक (मुंबई), डॉ. संदीप सपकाल (वर्धा), डॉ. विजय कलमधार (छिंदवाड़ा), डॉ. सुनील व्यवहारे (किनवट), डॉ राहुल म्हैसकर (पुणे), डॉ. भूषण भावे (गोवा), डॉ. महेंद्र ठाकुरदास (पुणे), डॉ. सपना तिवारी, डॉ. अमृता इंदुरकर, डॉ. विनय कुमार उपाध्याय, डॉ. कल्याणी कॉळे शामिल थे।

हिंदी, मराठी और संस्कृत के कुल 40 विषय विशेषज्ञों की उपस्थिति ने इस कार्यशाला को और भी महत्वपूर्ण बना दिया। इन सभी विद्वानों ने अपने-अपने अनुभव और ज्ञान साझा किया।

हिंदी-मराठी की समान शब्दावली पर चर्चा

दो दिवसीय कार्यशाला में हिंदी और मराठी की समान शब्दावली पर उत्साहवर्धक और उपयोगी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि दोनों भाषाओं में कई ऐसे शब्द हैं जो लगभग एक समान हैं या फिर थोड़े बदलाव के साथ प्रयोग किए जाते हैं। इन समान शब्दों की पहचान और उनका दस्तावेजीकरण भाषाई समझ बढ़ाने में मददगार होगा।

चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि कैसे एक ही मूल से निकलने वाली भाषाएं अलग-अलग रूप ले लेती हैं, लेकिन उनकी जड़ें एक ही रहती हैं। यह समझ भाषाओं के प्रति सम्मान और उन्हें बचाने की भावना को मजबूत करती है।

भाषा और राष्ट्रीय एकता का संबंध

इस कार्यशाला का मुख्य संदेश यह था कि भाषाएं राष्ट्रीय एकता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब हम अलग-अलग भाषाओं में समानता देखते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हम सब एक ही संस्कृति की संतान हैं। यह भावना राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाती है।

भारत में विविधता को हमेशा से शक्ति माना गया है। लेकिन यह विविधता तभी शक्ति बन सकती है जब हम इसमें छिपी एकता को पहचानें। भाषाओं की समानता उस एकता को उजागर करती है। जब एक भाषा बोलने वाला दूसरी भाषा के शब्दों को समझ सकता है, तो दोनों के बीच की दूरी कम हो जाती है।

शिक्षा में भाषाई समानता का महत्व

शिक्षा के क्षेत्र में भी भाषाई समानता का बड़ा महत्व है। अगर छात्रों को यह बताया जाए कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में कितनी समानता है, तो वे दूसरी भाषाओं को सीखने में अधिक रुचि लेंगे। यह बहुभाषिकता को बढ़ावा देगा और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा।

नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। ऐसे में भाषाओं की समानता पर काम करना और भी जरूरी हो जाता है। इससे छात्रों को एक भाषा सीखते हुए दूसरी भाषा की समझ भी विकसित होगी।

आगे की राह

Understanding Indian Languages Similarity: इस कार्यशाला ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय भाषाओं की शाब्दिक समानता पर काम करना न केवल भाषाविज्ञान की दृष्टि से जरूरी है, बल्कि राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अब जरूरत है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।

समान शब्दों का एक व्यापक संग्रह तैयार किया जाना चाहिए। इसे शिक्षण संस्थानों में पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। साथ ही, आम लोगों तक भी यह संदेश पहुंचाया जाना चाहिए कि हमारी भाषाएं कितनी एक-दूसरे के करीब हैं।

नागपुर में आयोजित यह राष्ट्रीय कार्यशाला एक महत्वपूर्ण पहल थी। इसने भाषाविदों, शिक्षकों और विद्यार्थियों को एक मंच पर लाकर भाषाओं की समानता पर चर्चा का अवसर दिया। उम्मीद है कि इस तरह की पहल भविष्य में भी जारी रहेगी और भारतीय भाषाओं को जोड़ने का काम करती रहेगी।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।