Sunetra Pawar: महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। दिवंगत डिप्टी सीएम अजीत पवार के जाने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर जो राजनीतिक खालीपन बना था, उसे भरने की दिशा में अब निर्णायक कदम उठा लिया गया है। राज्यसभा सांसद और अजीत पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को एनसीपी विधायक दल का नेता चुना गया है। आज शाम वह महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रही हैं। यह फैसला केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनात्मक, राजनीतिक और रणनीतिक तीनों स्तरों पर बेहद अहम माना जा रहा है।
अजीत पवार के निधन के बाद से ही यह सवाल उठ रहा था कि एनसीपी के उस गुट की कमान अब किसके हाथ में जाएगी, जो सत्ता में मजबूत भूमिका निभा रहा था। सुबह आई खबरों में जिस तरह पार्टी के भीतर बैठकों और सहमति की बात सामने आई थी, उसी का नतीजा अब औपचारिक रूप से दिखने लगा है।
एनसीपी में नेतृत्व का खालीपन और सुनेत्रा पवार का चयन
अजीत पवार न केवल सरकार में अहम चेहरा थे, बल्कि पार्टी संगठन और विधायकों के बीच उनकी पकड़ भी मजबूत मानी जाती थी। उनके अचानक चले जाने से पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि नेतृत्व का संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। ऐसे समय में सुनेत्रा पवार का नाम सामने आना कई मायनों में स्वाभाविक भी है और चौंकाने वाला भी।
सुनेत्रा पवार अब तक सीधे सक्रिय राज्य राजनीति में नहीं दिखती थीं, लेकिन एक राज्यसभा सांसद के तौर पर उनका संसदीय अनुभव और राजनीतिक समझ पार्टी के लिए उपयोगी मानी जा रही है। विधायक दल का नेता चुना जाना इस बात का संकेत है कि पार्टी ने भावनात्मक निरंतरता के साथ-साथ राजनीतिक स्थिरता को भी प्राथमिकता दी है।
शपथ ग्रहण से पहले बदला राजनीतिक माहौल
आज शाम होने वाले शपथ ग्रहण समारोह से पहले महाराष्ट्र का राजनीतिक माहौल काफी सक्रिय रहा। सुबह से ही मंत्रिमंडल विस्तार, विभागों के बंटवारे और सत्ता संतुलन को लेकर चर्चाएं तेज रहीं। एनसीपी के कई विधायकों ने खुलकर कहा कि इस कठिन समय में पार्टी को एकजुट रखने के लिए यह फैसला जरूरी था।
सुनेत्रा पवार के नाम पर सहमति बनना यह भी दिखाता है कि अजीत पवार गुट के भीतर फिलहाल किसी बड़े विरोध या टूट की स्थिति नहीं है। यह सरकार के लिए राहत की बात मानी जा रही है।
विपक्ष की नजर और सवाल
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष की नजर भी टिकी हुई है। कुछ विपक्षी दलों ने इसे “परिवारवाद” से जोड़कर सवाल उठाए हैं, जबकि सत्तापक्ष का तर्क है कि यह फैसला अनुभव, भरोसे और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है। आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर बहस तेज हो सकती है।
हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि फिलहाल सरकार की प्राथमिकता स्थिरता बनाए रखना है, न कि वैचारिक बहस में उलझना।
सुनेत्रा पवार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती होगी खुद को केवल एक दिवंगत नेता की पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि एक निर्णय लेने वाली राजनीतिक नेता के रूप में स्थापित करना। प्रशासनिक अनुभव, विधायकों के साथ तालमेल और गठबंधन सहयोगियों के साथ संतुलन—ये सभी कसौटियां उनके सामने होंगी।
महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में उपमुख्यमंत्री की भूमिका आसान नहीं होती। लेकिन पार्टी के भीतर जो भरोसा उनके नाम पर जताया गया है, वह उन्हें मजबूत शुरुआत जरूर देता है।