कोलकाता नगर निगम के 124 नंबर वार्ड के पार्षद राजीव दास, उनके पिता और माता को एसआईआर सुनवाई में बुलाया गया है। पार्षद के पिता भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी मन्मथ रंजन दास हैं जिनकी उम्र 83 साल है। मन्मथ रंजन दास ने 1965 और 1971 के युद्ध में सीधे तौर पर हिस्सा लिया था। हाल ही में भारतीय नौसेना की तरफ से उन्हें ’80 ईयर्स अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है।
शिकायत के मुताबिक, ठाकुरपुकुर जनकल्याण विद्यापीठ स्कूल में आयोजित एसआईआर सुनवाई में बूढ़ी उम्र में उन्हें अपनी पत्नी के साथ हाजिर होना पड़ा, जिससे वे मानसिक रूप से परेशान हो गए हैं। पूरी जिंदगी देश की सेवा करने के बाद भी उन्हें सुनवाई में आना पड़ रहा है, इस बात से वे हैरान और दुखी हैं।
पार्षद राजीव दास का दावा है कि वे मतुआ समुदाय के एकमात्र निर्वाचित पार्षद हैं। उनका आरोप है कि जानबूझकर आखिरी समय में उन्हें और उनके माता-पिता को सुनवाई में बुलाया गया है।
इस मामले में राजीव दास के पिता और पूर्व नौसेना अधिकारी मन्मथ रंजन दास ने कहा कि अगर उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
एक वीर सैनिक की कहानी
मन्मथ रंजन दास सिर्फ एक सामान्य नागरिक नहीं हैं। वे भारतीय नौसेना के उन वीर जवानों में से एक हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 1965 के भारत-पाक युद्ध और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में उन्होंने सीधे तौर पर भाग लिया। उस दौर में जब देश को उनकी जरूरत थी, तब उन्होंने बिना किसी डर के मातृभूमि की सेवा की।
83 साल की उम्र में भी उनका सम्मान और योगदान याद किया जाता है। हाल ही में नौसेना ने उन्हें 80 साल पूरे होने पर विशेष सम्मान दिया था। ऐसे में जब उन्हें और उनकी बुजुर्ग पत्नी को सुनवाई के लिए बुलाया गया, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह उचित है।
सुनवाई का मुद्दा क्या है
एसआईआर यानी समरी रिविजन की सुनवाई मतदाता सूची को अपडेट करने की एक प्रक्रिया है। इसमें उन लोगों को बुलाया जाता है जिनके दस्तावेजों में कोई समस्या हो या जिनकी नागरिकता को लेकर सवाल उठे हों। लेकिन जब यह सुनवाई एक ऐसे व्यक्ति के लिए होती है जो पूर्व सैनिक है और देश के लिए लड़ चुका है, तो यह संवेदनशील मामला बन जाता है।
राजीव दास का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक रूप से प्रेरित है। मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल में एक महत्वपूर्ण वोट बैंक माना जाता है। राजीव दास इस समुदाय के एकमात्र निर्वाचित पार्षद हैं। उनका आरोप है कि उन्हें और उनके परिवार को परेशान करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
परिवार की मानसिक स्थिति
83 साल के बुजुर्ग व्यक्ति को सुनवाई के लिए बुलाना और वह भी अपनी बुजुर्ग पत्नी के साथ, यह किसी के लिए भी मानसिक रूप से कठिन हो सकता है। मन्मथ रंजन दास ने अपनी पूरी जिंदगी देश की सेवा में बिताई। उन्होंने युद्ध के मैदान में अपनी जान जोखिम में डाली। ऐसे में बुढ़ापे में उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए बुलाया जाना उनके लिए अपमानजनक लग रहा है।
राजीव दास ने बताया कि उनके पिता इस पूरे मामले से बहुत परेशान हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जब उन्होंने देश के लिए इतना कुछ किया, तो फिर उन्हें ऐसी सुनवाई में क्यों बुलाया जा रहा है।
राजनीतिक पहलू
पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय का राजनीतिक महत्व बहुत अधिक है। यह समुदाय मुख्य रूप से अनुसूचित जाति से संबंध रखता है और बड़ी संख्या में बंगाल के विभिन्न हिस्सों में रहता है। राजीव दास इस समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में कोलकाता नगर निगम में चुने गए थे।
उनका आरोप है कि राजनीतिक कारणों से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। आखिरी समय में सुनवाई का नोटिस देना और वह भी उनके बुजुर्ग माता-पिता को शामिल करके, यह सब जानबूझकर किया गया है। उनका मानना है कि यह उन्हें डराने और परेशान करने की कोशिश है।
कानूनी विकल्प
मन्मथ रंजन दास ने साफ कर दिया है कि अगर उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे। एक पूर्व सैनिक के रूप में उन्हें अपने अधिकारों का पूरा ज्ञान है और वे इसके लिए लड़ने को तैयार हैं।
यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं है, बल्कि यह उन सभी पूर्व सैनिकों के सम्मान का सवाल है जिन्होंने देश की सेवा की है। अगर एक युद्ध में लड़ने वाले सैनिक को अपनी नागरिकता साबित करनी पड़े, तो यह चिंता का विषय है।
समाज की प्रतिक्रिया
इस घटना ने समाज में भी बहस छेड़ दी है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सचमुच ऐसे बुजुर्ग लोगों को, जो देश के लिए लड़ चुके हैं, सुनवाई में बुलाना जरूरी था। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा हो रही है।
कई लोगों का मानना है कि पूर्व सैनिकों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए। उनके लिए विशेष प्रावधान होने चाहिए। बुजुर्ग और सम्मानित नागरिकों को इस तरह की परेशानी से बचाया जाना चाहिए।
आगे की राह
यह मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह एक सामाजिक और नैतिक सवाल बन गया है। पूर्व सैनिकों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना हर सरकार की जिम्मेदारी है। मन्मथ रंजन दास जैसे लोगों ने अपनी जवानी देश को दे दी। अब जब वे बुजुर्ग हैं, तो उन्हें सम्मान और शांति मिलनी चाहिए।
राजीव दास और उनके परिवार ने कहा है कि वे हर कानूनी रास्ता अपनाएंगे। अगर जरूरत पड़ी तो वे इस मामले को उच्चतम न्यायालय तक ले जाएंगे। उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ उनके परिवार की नहीं, बल्कि सभी पूर्व सैनिकों के सम्मान की है।
इस पूरे मामले में यह देखना होगा कि प्रशासन क्या रुख अपनाता है और क्या वह पूर्व सैनिकों के प्रति संवेदनशीलता दिखाता है। देश के वीर जवानों का सम्मान बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।