
भारत में जीवनशैली तेजी से बदल रही है। लोग सुबह से शाम तक कुर्सी पर बैठे रहते हैं, कंप्यूटर स्क्रीन पर झुके काम करते हैं और रात को फोन स्क्रीन देखते-देखते नींद में डूब जाते हैं। ऐसे में रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ता है, कमर दर्द बढ़ता है और धीरे-धीरे शरीर अपना बैलेंस खोने लगता है। यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों में ही नहीं, बल्कि 18 से 35 वर्ष के युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कमर दर्द का सबसे बड़ा कारण कमजोर कोर मांसपेशियां, खराब पॉस्चर और लगातार बैठने की आदत है।

भारत में जीवनशैली तेजी से बदल रही है। लोग सुबह से शाम तक कुर्सी पर बैठे रहते हैं, कंप्यूटर स्क्रीन पर झुके काम करते हैं और रात को फोन स्क्रीन देखते-देखते नींद में डूब जाते हैं। ऐसे में रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ता है, कमर दर्द बढ़ता है और धीरे-धीरे शरीर अपना बैलेंस खोने लगता है। यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों में ही नहीं, बल्कि 18 से 35 वर्ष के युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कमर दर्द का सबसे बड़ा कारण कमजोर कोर मांसपेशियां, खराब पॉस्चर और लगातार बैठने की आदत है।

ब्रिटिशकालीन पहाड़ियों की गोद में बसे लोणावला में आज विभूतिपूर्ण आयोजन हुआ। कैवल्यधाम योग संस्थान ने अपनी १०१वीं वर्षगाँठ पर वह संवाद आयोजित किया, जिसमें योग के माध्यम से प्रकृति-मानव संबंध, सतत विकास और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की अनिवार्यता पर बल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु एवं कैवल्यधाम के सीईओ सुबोध तिवारी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। योग = केवल व्यायाम नहीं, संयोग का सूत्र डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कहा कि मानव ने भौतिक प्रगति के नाम पर प्रकृति को भारी क्षति पहुंचाई है,

ब्रिटिशकालीन पहाड़ियों की गोद में बसे लोणावला में आज विभूतिपूर्ण आयोजन हुआ। कैवल्यधाम योग संस्थान ने अपनी १०१वीं वर्षगाँठ पर वह संवाद आयोजित किया, जिसमें योग के माध्यम से प्रकृति-मानव संबंध, सतत विकास और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की अनिवार्यता पर बल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु एवं कैवल्यधाम के सीईओ सुबोध तिवारी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। योग = केवल व्यायाम नहीं, संयोग का सूत्र डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कहा कि मानव ने भौतिक प्रगति के नाम पर प्रकृति को भारी क्षति पहुंचाई है,