भारत-फ्रांस के सौर गठबंधन पर अमेरिका का बड़ा फैसला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को आगे बढ़ाते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। बुधवार को उन्होंने भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन समेत 66 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को बाहर निकालने का ऐलान किया है। यह फैसला उन संगठनों के खिलाफ लिया गया है जिन्हें ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी हितों के विपरीत माना है।
ट्रंप ने क्यों उठाया यह कदम
राष्ट्रपति ट्रंप ने एक राष्ट्रपति ज्ञापन पर हस्ताक्षर करते हुए इन संगठनों से अलग होने का निर्देश दिया। यह फैसला 4 फरवरी 2025 को जारी एक कार्यकारी आदेश के तहत की गई व्यापक समीक्षा के बाद लिया गया है। इस समीक्षा में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने उन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों की पहचान की जो अमेरिकी हितों के साथ मेल नहीं खाते।
भारत का संतुलित और दृढ़ रुख
अमेरिका के इस फैसले पर भारत सरकार ने गुरुवार को अपनी प्रतिक्रिया दी। सरकारी सूत्रों ने साफ कहा कि अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन अपने उद्देश्य पर पूरी तरह केंद्रित है और आगे भी अपना काम जारी रखेगा। भारत ने स्पष्ट किया कि किसी एक देश के हटने से इस संगठन की कार्यप्रणाली या दीर्घकालिक लक्ष्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
सौर गठबंधन की ताकत बरकरार
सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस समय अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में 125 सदस्य और हस्ताक्षरकर्ता देश शामिल हैं। यह संख्या बताती है कि यह संगठन कितना मजबूत और व्यापक है। अमेरिका के हटने के बावजूद, यह गठबंधन स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में वैश्विक सहयोग को बढ़ाने का अपना काम जारी रखेगा।
गरीब देशों की मदद करना रहेगा पहली प्राथमिकता
भारत सरकार के सूत्रों ने बताया कि सौर गठबंधन अल्पविकसित देशों और छोटे द्वीपीय देशों को विशेष तरजीह देता रहेगा। इन देशों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विकास करना और उन्हें आगे बढ़ाना इस संगठन की प्राथमिकता है। ये वही देश हैं जिन्हें जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा खतरा है और जिनके पास साधन सीमित हैं।
वित्त और क्षमता निर्माण पर जोर
सूत्रों ने यह भी कहा कि सौर गठबंधन का मुख्य फोकस सौर परियोजनाओं के लिए धन जुटाने, देशों की क्षमता बढ़ाने और सौर ऊर्जा से जुड़े जोखिमों को कम करने पर रहेगा। इससे दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव तेज होगा। यह पहल उन देशों के लिए खासतौर पर महत्वपूर्ण है जो पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर हैं।
भारत-फ्रांस की साझा पहल
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन भारत और फ्रांस की एक संयुक्त पहल है। इसका विचार 2015 में पेरिस में हुई जलवायु सम्मेलन के दौरान आया था। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने मिलकर इस योजना को आकार दिया था। शुरुआत में यह केवल उन देशों के लिए था जो कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित हैं, लेकिन 2020 में इसे सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के लिए खोल दिया गया।
2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य
इस गठबंधन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है कि 2030 तक सौर निवेश में एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाया जाए। साथ ही, सौर तकनीक और वित्तपोषण की लागत को कम करना भी इसका उद्देश्य है। यह लक्ष्य दुनिया को जीवाश्म ईंधन से हटाकर स्वच्छ ऊर्जा की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाएगा।
ट्रंप की नीति और वैश्विक प्रतिक्रिया
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में भी जलवायु समझौतों से अमेरिका को बाहर निकाला था। उन्होंने पेरिस जलवायु समझौते से भी अमेरिका को अलग कर दिया था। अब दोबारा सत्ता में आने के बाद उन्होंने फिर से यही रास्ता अपनाया है। ट्रंप का मानना है कि ये संगठन अमेरिकी करदाताओं के पैसे की बर्बादी हैं और अमेरिकी हितों के खिलाफ काम करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के निकाय भी शामिल
ट्रंप प्रशासन ने सिर्फ सौर गठबंधन से ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के कई निकायों से भी अमेरिका को अलग करने का फैसला लिया है। इनमें वैश्विक स्वास्थ्य, पर्यावरण और मानवाधिकार से जुड़े संगठन शामिल हैं। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
भारत की वैश्विक जिम्मेदारी
अमेरिका के इस फैसले के बावजूद, भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटेगा। भारत दुनिया में सौर ऊर्जा के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है। देश में बड़े पैमाने पर सौर परियोजनाएं चल रही हैं और भारत अन्य विकासशील देशों को भी इस दिशा में मदद कर रहा है।
फ्रांस का साथ बना रहेगा
फ्रांस भी इस गठबंधन का सह-संस्थापक है और उसने भी स्पष्ट किया है कि वह इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत और फ्रांस मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि अमेरिका की अनुपस्थिति से संगठन के काम में कोई बाधा न आए। दोनों देशों की साझेदारी इस गठबंधन की रीढ़ है।
विकासशील देशों के लिए उम्मीद
अफ्रीका, एशिया और प्रशांत क्षेत्र के कई छोटे देशों के लिए यह गठबंधन बेहद महत्वपूर्ण है। ये देश सौर ऊर्जा के जरिए अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना चाहते हैं लेकिन उनके पास तकनीक और धन की कमी है। सौर गठबंधन उन्हें यह दोनों मुहैया कराता है।
जलवायु परिवर्तन से लड़ाई जारी
दुनिया जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव जरूरी है। सौर ऊर्जा इस बदलाव का सबसे अहम हिस्सा है क्योंकि यह साफ, सस्ती और टिकाऊ है।
तकनीकी सहयोग बढ़ेगा
सौर गठबंधन के तहत सदस्य देश तकनीकी ज्ञान और अनुभव साझा करते हैं। भारत जैसे देश जो सौर ऊर्जा में आगे बढ़ चुके हैं, वे अन्य देशों को अपना अनुभव देते हैं। इससे सभी देशों को फायदा होता है और वे अपनी गलतियों से बच सकते हैं।
निजी निवेश को बढ़ावा
सरकारी निवेश के साथ-साथ, यह गठबंधन निजी कंपनियों को भी सौर ऊर्जा में निवेश के लिए प्रोत्साहित करता है। जब सरकारें मिलकर एक मंच बनाती हैं तो निवेशकों को भरोसा मिलता है। इससे सौर परियोजनाओं में पैसा लगाना आसान हो जाता है।
भारत की सौर क्रांति
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है। देश में कई बड़े सौर पार्क बने हैं और छोटे स्तर पर भी लोग सौर पैनल लगा रहे हैं। सरकार की योजनाओं ने इसे और बढ़ावा दिया है। भारत अब दुनिया के शीर्ष सौर ऊर्जा उत्पादकों में शामिल है।
आगे की राह
अमेरिका के हटने के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन अपने रास्ते पर मजबूती से आगे बढ़ेगा। 125 देशों का समर्थन इसे मजबूत आधार देता है। भारत और फ्रांस की दृढ़ प्रतिबद्धता इसे और भी ताकतवर बनाती है। यह गठबंधन साबित करेगा कि वैश्विक सहयोग से ही जलवायु परिवर्तन जैसी बड़ी समस्याओं का समाधान संभव है।