Bangladesh Hindu Murder: बांग्लादेश की धरती पर हिंदू समुदाय के लिए बीते कुछ हफ्ते डर, दहशत और असहायता की कहानी बन चुके हैं। जिस देश का जन्म धर्मनिरपेक्षता के मूल विचारों पर हुआ था, वहां आज अल्पसंख्यक हिंदुओं की जान की कीमत लगातार कम होती जा रही है। पिछले 18 दिनों में छह हिंदुओं की नृशंस हत्या केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे चीखते हुए सवाल हैं, जो बांग्लादेश की सरकार, कानून व्यवस्था और समाज के सामने खड़े हैं।
पिछले 24 घंटे में दो और हिंदुओं की हत्या ने इस सच्चाई को और भयावह बना दिया है कि हिंसा अब अपवाद नहीं, बल्कि एक सिलसिला बन चुकी है। सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो और तस्वीरें इस बात की गवाही देती हैं कि ये हत्याएं केवल व्यक्तिगत रंजिश नहीं, बल्कि भय पैदा करने की साजिश का हिस्सा हैं।
दीपू चंद्र दास की हत्या
18 दिसंबर 2025 को ढाका में दीपू चंद्र दास की हत्या ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। भीड़ ने पहले उन्हें पीटा, फिर मौत के बाद शव को पेड़ से लटकाकर आग के हवाले कर दिया। यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि मानवता को जलाने जैसा कृत्य था। सवाल यह है कि इतनी भयावह घटना के बाद भी प्रशासन की प्रतिक्रिया इतनी धीमी क्यों रही।
अमृत मंडल की हत्या
24 दिसंबर 2025 को राजबाड़ी जिले के होसेनडांगा गांव में अमृत मंडल उर्फ सम्राट की हत्या कर दी गई। जबरन वसूली का आरोप लगाकर भीड़ ने खुद को जज और जल्लाद दोनों बना लिया। पुलिस के पहुंचने से पहले ही एक युवा की जान ले ली गई। यह घटना बताती है कि भीड़ को अब कानून का कोई डर नहीं रह गया है।
बजेंद्र बिसवास की गोली मारकर हत्या
29 दिसंबर को मयमन सिंह जिले में कपड़ा फैक्ट्री के सिक्योरिटी गार्ड बजेंद्र बिसवास की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 42 वर्षीय बजेंद्र रोज की तरह काम पर थे, उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनकी पहचान ही उनकी मौत की वजह बन जाएगी। आरोपी की गिरफ्तारी हुई, लेकिन क्या इससे डर का माहौल खत्म हो पाएगा?
नए साल की रात, जलती इंसानियत
31 दिसंबर 2025 की रात, जब दुनिया नए साल का स्वागत कर रही थी, तब खोकन दास अपनी जान बचाने के लिए तालाब में कूदने को मजबूर थे। उन पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई। तीन दिन तक जिंदगी और मौत से लड़ते हुए आखिरकार 3 जनवरी को उन्होंने दम तोड़ दिया। यह घटना बताती है कि हिंसा त्योहार, समय या इंसानियत नहीं देखती।
पत्रकार और व्यापारी भी सुरक्षित नहीं
5 जनवरी 2026 को जेस्सोर में राणा प्रताप बैरागी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वे केवल एक बर्फ फैक्ट्री के मालिक नहीं थे, बल्कि एक अखबार के संपादक भी थे। उनकी हत्या यह संकेत देती है कि अब सच बोलने और पहचान रखने वाले लोग भी निशाने पर हैं।
इसी दिन ढाका के नरसिंगड़ी में शरत चक्रवर्ती मणि को धारदार हथियारों से मार डाला गया। उन्हें सड़क पर लहूलुहान छोड़ दिया गया। अस्पताल पहुंचने के बाद उनकी मौत हो गई।
सरकार की चुप्पी और अंतरराष्ट्रीय चिंता
इन घटनाओं पर यूनुस सरकार की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है। न कड़े बयान, न ठोस कार्रवाई और न ही अल्पसंख्यकों को भरोसा दिलाने की कोई गंभीर कोशिश। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की नजरें अब बांग्लादेश पर टिक चुकी हैं, लेकिन जमीनी हालात में बदलाव नजर नहीं आ रहा।