भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की राह हुई आसान
India US Trade Agreement: नई दिल्ली। देश के निर्यात और आर्थिक विकास पर छाए संकट के बादल अब धीरे-धीरे छंटते नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के बीच सोमवार देर रात हुई फोन पर बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर सहमति बन गई है। इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत शुल्क की वजह से भारत के रोजगारपरक निर्यात पर जो खतरा मंडरा रहा था, वह अब कम होता दिख रहा है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार को इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इस व्यापार समझौते में देश के सभी नागरिकों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है। खासकर कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखा गया है। उन्होंने कहा कि विपक्ष, खासकर राहुल गांधी जो आरोप लगा रहे हैं, वे पूरी तरह से गलत हैं और वे लोगों को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं।
अगले 7-10 दिनों में जारी होगा साझा बयान
सूत्रों के मुताबिक, दोनों देश अगले सात से दस दिनों में इस व्यापार समझौते को लेकर एक साझा बयान जारी करेंगे। इसके बाद ही समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए जाएंगे। साझा बयान जारी होते ही रूस से तेल खरीदने के कारण लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क को भी समाप्त कर दिया जाएगा। यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े बाजार अमेरिका में भारतीय सामान की मांग लगातार बढ़ रही है।

25 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हुआ शुल्क
इस समझौते के तहत पारस्परिक शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। यह शुल्क समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद लागू होगा। मंत्री गोयल ने समझाते हुए कहा कि 18 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क के साथ पहले से लागू शुल्क जुड़ने के बाद भी भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, वियतनाम, कंबोडिया और पाकिस्तान जैसे देशों के सामान के मुकाबले सस्ता होगा।
इसकी वजह यह है कि अमेरिका ने इन देशों पर 18 प्रतिशत से कहीं अधिक का पारस्परिक शुल्क लगा रखा है। उदाहरण के लिए, चमड़े के सामान पर भारत के लिए 18 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क के साथ पहले से लागू आठ प्रतिशत शुल्क मिलाकर कुल 26 प्रतिशत शुल्क लगेगा। जबकि वियतनाम के लिए यह 27 प्रतिशत और चीन के लिए 42 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। इससे भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलेगी।
500 अरब डॉलर का आयात करेगा भारत
इस व्यापार समझौते के तहत भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से कुल 500 अरब डॉलर का आयात करने के लिए सहमत हुआ है। फिलहाल भारत अमेरिका से सालाना करीब 40 अरब डॉलर का आयात करता है। इस हिसाब से भारत को हर साल अतिरिक्त 60 अरब डॉलर की खरीदारी अमेरिका से करनी होगी। यह खरीदारी मुख्य रूप से तेल, गैस, विमान और उच्च तकनीक वाले उत्पादों की होगी।
गोयल ने बताया कि भारत फिलहाल रूस से सालाना करीब 60 अरब डॉलर का तेल खरीदता है। अब यह खरीदारी अमेरिका से की जा सकती है। इसके अलावा गैस, एयरक्राफ्ट और हाई टेक उत्पादों की खरीदारी भी अमेरिका से बढ़ाई जाएगी। इस वजह से भारत को अपनी खरीदारी की प्रतिबद्धता पूरी करने में कोई खास दिक्कत नहीं आएगी।
कृषि और डेयरी को रखा गया बाहर
इस समझौते की सबसे अहम बात यह है कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इससे बाहर रखा गया है। यह कदम देश के किसानों और दुग्ध उत्पादकों के हितों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। वाणिज्य मंत्री ने साफ किया कि सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि देश के किसी भी वर्ग के हितों को नुकसान न पहुंचे। खासकर छोटे किसानों और स्थानीय उत्पादकों के हितों की रक्षा सरकार की प्राथमिकता है।
रोजगारपरक क्षेत्रों को मिलेगी बड़ी राहत
भारत हर साल अमेरिका में करीब 90 अरब डॉलर का निर्यात करता है। इसमें से करीब 30 अरब डॉलर की हिस्सेदारी ऐसे रोजगारपरक क्षेत्रों की है जिन पर 50 प्रतिशत शुल्क लगने की वजह से गंभीर खतरा मंडरा रहा था। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से कपड़ा, चमड़ा, रत्न और आभूषण, रसायन, इंजीनियरिंग सामान, कृषि और प्रसंस्कृत वस्तुएं शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। अगर यह निर्यात प्रभावित होता तो देश में बेरोजगारी बढ़ सकती थी और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती थी। लेकिन अब इस समझौते के बाद इन क्षेत्रों के निर्यात में दोगुनी बढ़ोतरी की उम्मीद है। इसकी मुख्य वजह यह है कि अमेरिका के बाजार में भारत को प्रतिस्पर्धा देने वाले अन्य देशों पर अधिक शुल्क लगाया गया है।
स्टील और एल्युमीनियम पर 50 प्रतिशत शुल्क जारी
हालांकि इस समझौते में स्टील, एल्युमीनियम और कुछ ऑटो पार्ट्स पर लगाए गए 50 प्रतिशत शुल्क में कोई छूट नहीं दी गई है। लेकिन अच्छी बात यह है कि यह 50 प्रतिशत शुल्क अमेरिका ने दुनिया के सभी देशों के लिए लगा रखा है। इसलिए इन वस्तुओं के निर्यात में भारत को प्रतिस्पर्धा में कोई नुकसान नहीं होगा और निर्यात पहले की तरह जारी रह सकेगा।
अमेरिका का बाजार क्यों है खास
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वहां का बाजार बेहद विशाल है। भारतीय उत्पादों की वहां लगातार मांग बढ़ रही है। अमेरिकी उपभोक्ता भारतीय कपड़ों, हस्तशिल्प, रत्न-आभूषण और अन्य सामान को पसंद करते हैं। इसके अलावा सेवा क्षेत्र में भी भारत की मजबूत उपस्थिति है। सूचना प्रौद्योगिकी और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में अच्छी पकड़ है।
यूरोपीय संघ से भी बेहतर शर्तें
यह ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका ने ब्रिटेन पर 10 प्रतिशत और यूरोपीय संघ के देशों पर 15 प्रतिशत का शुल्क लगाया है जो भारत पर लगाए गए 18 प्रतिशत से कम है। लेकिन ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के देश उन वस्तुओं का अमेरिका में निर्यात नहीं करते हैं जिनका भारत करता है। इसलिए भारत को इन देशों से सीधी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा।
भारतीय निर्यातक मुख्य रूप से श्रम प्रधान उत्पादों का निर्यात करते हैं जिनमें भारत को प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से चीन, बांग्लादेश, वियतनाम जैसे देशों से मिलती है। इन देशों पर अमेरिका ने भारत से अधिक शुल्क लगाया है, इसलिए भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बढ़त मिलेगी।
आर्थिक विकास को मिलेगी गति
India US Trade Agreement: इस व्यापार समझौते से भारत के आर्थिक विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है। निर्यात बढ़ने से देश में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। छोटे और मध्यम उद्योगों को भी इससे फायदा मिलेगा। सरकार का मानना है कि यह समझौता देश के आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेगा। यह न केवल व्यापार बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने का रास्ता खोलेगा। रणनीतिक साझेदारी के साथ-साथ आर्थिक साझेदारी भी दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगी।
विपक्ष के आरोप निराधार
विपक्ष द्वारा इस समझौते को लेकर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, सरकार ने उन्हें पूरी तरह से खारिज कर दिया है। वाणिज्य मंत्री ने कहा कि विपक्ष बिना किसी आधार के लोगों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा है। सरकार ने देश के हर वर्ग के हितों को ध्यान में रखकर यह समझौता किया है। किसानों, उद्योगों और आम नागरिकों के हितों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।
सरकार का दावा है कि यह समझौता पूरी तरह से पारदर्शी है और इसमें देश के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। यह समझौता भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर किया गया है।