विदर्भ के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले किसानों के लिए एक नई उम्मीद की किरण जगी है। तकनीक और सामाजिक सेवा के मेल से तैयार की गई एक नई पहल के तहत अब गांवों में बायोगैस संयंत्र लगाए जा रहे हैं। यह योजना न केवल किसानों को स्वच्छ ऊर्जा देगी, बल्कि उनकी आमदनी बढ़ाने में भी मददगार साबित होगी। नागपुर स्थित विश्वेश्वरय्या राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी VNIT इस परियोजना में अपना पूरा तकनीकी सहयोग दे रहा है।
ASPECTI सोशल एसोसिएशन ने ली पहल
ASPECTI सोशल एसोसिएशन एक ऐसी संस्था है जो युवा सशक्तिकरण, महिला सशक्तिकरण, किसान कल्याण और कौशल विकास के क्षेत्र में लगातार काम कर रही है। इसी संस्था ने विदर्भ के ग्रामीण इलाकों में बायोगैस परियोजना शुरू करने का फैसला किया। इस योजना को धरातल पर उतारने के लिए VNIT नागपुर सहित कई अन्य संस्थाओं का सहयोग लिया गया है। VNIT को इस परियोजना में ज्ञान भागीदार के रूप में शामिल किया गया है, जो तकनीकी मार्गदर्शन और नवीन तकनीकों से किसानों को लाभान्वित करेगा।
किन गांवों को मिला लाभ
इस पहल के तहत अब तक विदर्भ के तीन जिलों के गांवों में निःशुल्क बायोगैस संयंत्र वितरित किए जा चुके हैं। अकोला जिले के मुरांबा गांव, अमरावती जिले के रेवसा गांव और नागपुर जिले के उमरी वाघ गांव में यह संयंत्र लगाए गए हैं। इन गांवों के किसानों को अब खाना पकाने और अन्य जरूरतों के लिए स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा मिल सकेगी। आने वाले समय में इस योजना को पूरे विदर्भ में लागू करने की योजना है।
बायोगैस संयंत्र के फायदे
बायोगैस संयंत्र किसानों के लिए कई मायनों में फायदेमंद साबित होते हैं। सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे गोबर और अन्य कृषि अपशिष्ट का सही उपयोग हो जाता है। गाय-भैंसों का गोबर, जो पहले बेकार पड़ा रहता था, अब ऊर्जा का स्रोत बन रहा है। इससे किसानों को खाना बनाने के लिए लकड़ी या गैस सिलेंडर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। साथ ही बायोगैस बनने के बाद जो अवशेष बचता है, वह बेहतरीन जैविक खाद के रूप में खेती में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होगी और मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।
पर्यावरण को भी मिलेगा लाभ
बायोगैस एक पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा स्रोत है। इसके उपयोग से धुआं और प्रदूषण बहुत कम होता है। जब किसान लकड़ी या कोयला जलाकर खाना बनाते हैं, तो इससे हानिकारक धुआं निकलता है जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है। खासकर महिलाओं को इसका सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है। बायोगैस से यह समस्या खत्म हो जाएगी। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और हरित भविष्य की ओर एक सकारात्मक कदम बढ़ेगा।
VNIT की भूमिका
VNIT नागपुर इस परियोजना में तकनीकी ज्ञान का भंडार है। संस्थान अपने छात्रों, शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों के माध्यम से तकनीकी मार्गदर्शन दे रहा है। नवीनतम तकनीकों का उपयोग करके बायोगैस संयंत्रों को और अधिक कुशल बनाया जा रहा है। इसके अलावा VNIT शोध और डेटा विश्लेषण में भी सहायता प्रदान कर रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि परियोजना कितनी सफल हो रही है और आगे इसमें क्या सुधार किए जा सकते हैं। Youth-Empower परियोजना के तहत VNIT की यह भागीदारी ग्रामीण विकास में शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी को भी दर्शाती है।
डॉ. विजय भटकर का संदेश
कार्यक्रम के दौरान पद्मभूषण डॉ. विजय भटकर ने कहा कि VNIT जैसे तकनीकी संस्थानों को किसानों और ग्रामीण विकास के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल शहरों में तकनीक का इस्तेमाल करना काफी नहीं है, बल्कि गांवों में भी इसका लाभ पहुंचाना जरूरी है। उनका मानना है कि यह पहल विदर्भ के ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी नवाचार और सामाजिक विकास को नई दिशा देगी। किसानों की आय बढ़ेगी, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और गांवों में आत्मनिर्भरता आएगी।
निदेशक ने दिखाई राह
VNIT के निदेशक प्रो. डॉ. प्रेमलाल पटेल ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि तकनीकी शिक्षा का असली उद्देश्य समाज की सेवा करना है। VNIT अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ग्रामीण इलाकों में तकनीक को पहुंचाने में पूरा सहयोग देगा। उन्होंने बताया कि संस्थान ने पहले भी कई सामाजिक पहलों में हिस्सा लिया है और आगे भी इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा।
किसानों की आय में होगी बढ़ोतरी
बायोगैस संयंत्र से किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। खाना पकाने में होने वाला खर्च बचेगा, जैविक खाद से फसल की गुणवत्ता बेहतर होगी और उत्पादन बढ़ेगा। इसके साथ ही अगर किसान अतिरिक्त बायोगैस या खाद को बेचते हैं, तो उससे अतिरिक्त आय भी हो सकती है। यह परियोजना सतत विकास का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी मिल रहा है।
आगे की योजना
अभी यह परियोजना शुरुआती दौर में है, लेकिन योजना पूरे विदर्भ में इसे फैलाने की है। हर जिले के चुनिंदा गांवों में बायोगैस संयंत्र लगाए जाएंगे। साथ ही किसानों को इसके रखरखाव और सही उपयोग की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। ASPECTI सोशल एसोसिएशन और VNIT मिलकर इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। यह पहल साबित करती है कि अगर सामाजिक संस्थाएं, शिक्षण संस्थान और सरकार मिलकर काम करें, तो गांवों का असली विकास संभव है।
विदर्भ में शुरू हुई यह बायोगैस परियोजना एक मिसाल बन सकती है। तकनीक, समाज सेवा और किसान कल्याण का यह संगम दिखाता है कि विकास सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। गांवों में भी अगर सही तकनीक और संसाधन पहुंचाए जाएं, तो वहां की तस्वीर बदल सकती है। VNIT और ASPECTI की यह साझेदारी विदर्भ के किसानों के जीवन में रोशनी लाने का काम कर रही है।