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NEET PG 2025 Cutoff: क्वालिफाइंग परसेंटाइल घटने से मचा बवाल, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

NEET PG 2025 Cutoff: क्वालिफाइंग परसेंटाइल घटने से मचा बवाल, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
NEET PG 2025 Cutoff: क्वालिफाइंग परसेंटाइल घटने से मचा बवाल, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
नीट पीजी 2025 में क्वालिफाइंग परसेंटाइल घटाने का फैसला विवादों में है। डॉक्टरों और छात्रों ने इसे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के लिए खतरनाक बताया है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है, जहां इस निर्णय के भविष्य पर अहम फैसला होना है।
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NEET PG 2025 Cutoff: नीट पीजी 2025 को लेकर एक ऐसा फैसला सामने आया है, जिसने देश की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने राउंड-2 काउंसलिंग के बाद सभी श्रेणियों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में भारी कटौती कर दी है। इस निर्णय ने न सिर्फ मेडिकल स्टूडेंट्स बल्कि डॉक्टर समुदाय और शिक्षा विशेषज्ञों को भी असमंजस में डाल दिया है।

शुरुआत में यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक कदम माना जा रहा था, लेकिन जैसे-जैसे इसके आंकड़े सामने आए, मामला तूल पकड़ता चला गया। अब यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और इसके खिलाफ याचिका दायर की गई है। सवाल सिर्फ कटऑफ घटाने का नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य के डॉक्टरों और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा नीट पीजी कटऑफ विवाद

NBEMS के इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। यह याचिका पीआईएल सोशल वर्कर हरिशरण देवगन, सौरभ कुमार, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के डॉक्टर लक्ष्य मित्तल और वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉक्टर आकाश सोनी की ओर से दायर की गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि क्वालिफाइंग परसेंटाइल को इस हद तक कम करना मेडिकल शिक्षा के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका तर्क है कि यह फैसला शॉर्ट टर्म समाधान हो सकता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे।

सोशल मीडिया पर डॉक्टरों का विरोध

इस फैसले के खिलाफ सबसे मुखर आवाज डॉक्टर लक्ष्य मित्तल की रही है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X और इंस्टाग्राम पर लगातार पोस्ट और वीडियो साझा कर इस मुद्दे को उठाया है। डॉक्टर मित्तल का कहना है कि मेडिकल प्रोफेशन कोई सामान्य करियर विकल्प नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर इंसानी जिंदगी से जुड़ा हुआ है।

उनका आरोप है कि कटऑफ घटाने का यह कदम मेडिकल एजुकेशन के स्तर को कमजोर करता है और इससे निजी मेडिकल कॉलेजों को सीधा फायदा पहुंचता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब प्रवेश की शर्तें इतनी ढीली कर दी जाएंगी, तो मेहनती और मेरिट वाले छात्रों के साथ अन्याय होगा।

NBEMS ने क्यों घटाया कटऑफ?

NBEMS की ओर से यह फैसला राउंड-2 काउंसलिंग के बाद लिया गया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण देशभर के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में 18 हजार से ज्यादा पीजी सीटों का खाली रह जाना बताया जा रहा है।

बोर्ड का मानना है कि सीटें खाली रहने से संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। इसी को देखते हुए सभी कैटेगरी के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल में कटौती की गई।

EWS वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 50 से घटाकर सिर्फ 7 कर दिया गया है। जनरल PwBD कैटेगरी के लिए यह 45 से घटाकर 5 कर दिया गया है। वहीं SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए भी परसेंटाइल में ऐतिहासिक कमी की गई है।

जीरो परसेंटाइल से एडमिशन पर सवाल

सोशल मीडिया पर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या जीरो या बेहद कम परसेंटाइल पर मेडिकल पीजी में एडमिशन देना सही है। लोगों की चिंता सिर्फ परीक्षा प्रणाली को लेकर नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा को लेकर भी है।

डॉक्टर समुदाय का कहना है कि मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता से समझौता करना भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। कमजोर शैक्षणिक आधार वाले डॉक्टरों की एंट्री से पेशेंट सेफ्टी पर सीधा असर पड़ सकता है।

नीट पीजी कटऑफ से जुड़े प्रमुख खतरे

  • क्वालिटी पर असर
    बेहद कम स्कोर पर एडमिशन से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है।
  • पेशेंट सेफ्टी पर खतरा
    कमजोर ट्रेनिंग वाले डॉक्टर मरीजों की जान के लिए जोखिम बन सकते हैं।
  • मेरिट का हनन
    मेहनती और हाई-स्कोरिंग कैंडिडेट्स को सिस्टम से निराशा होगी।
  • विश्वास में कमी
    परीक्षा और चयन प्रक्रिया से छात्रों का भरोसा टूट सकता है।

भारत में नीट पीजी सीटों की स्थिति

भारत में नीट पीजी सीटों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। 2021 से 2025 के बीच सीटों में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। फिलहाल देशभर में लगभग 80 हजार के आसपास पीजी सीटें उपलब्ध हैं।

हर साल करीब 2.4 लाख छात्र नीट पीजी परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं, जिनमें से लगभग एक लाख छात्र परीक्षा पास करते हैं। इसके बावजूद हजारों सीटों का खाली रह जाना सिस्टम की जटिलताओं और असंतुलन को दर्शाता है।

आगे क्या होगा?

अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है। कोर्ट का फैसला न केवल इस साल के एडमिशन प्रोसेस को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भी एक मिसाल बनेगा। सवाल यह है कि क्या सीटें भरने की मजबूरी मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता से बड़ी हो सकती है, या फिर सिस्टम को संतुलित करने के लिए कोई बीच का रास्ता निकलेगा।

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Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।