झारखंड की राजधानी रांची के खड़गड़ा इलाके में स्थित अंतरराज्यीय बस टर्मिनस पर रविवार दोपहर जो हादसा हुआ, वह एक बार फिर हमारे सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। छह बसों के जलकर राख हो जाने की यह घटना भले ही किसी जानमाल के नुकसान के बिना टल गई हो, लेकिन यह एक गंभीर चेतावनी है कि अगर समय रहते सुरक्षा मानकों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो अगली बार हम इतने भाग्यशाली नहीं हो सकते।
दो घंटे की जद्दोजहद
लोअर बाजार थाना क्षेत्र के खड़गड़ा में रविवार दोपहर जब एक क्षतिग्रस्त बस से आग की लपटें उठीं, तो देखते ही देखते यह आग पास खड़ी अन्य बसों में भी फैल गई। पांच दमकल गाड़ियों को करीब दो घंटे की जद्दोजहद के बाद आग पर काबू पाना पड़ा। खारगड़ा पुलिस चौकी के प्रभारी सुनील ने बताया कि आग लगने के समय किसी भी गाड़ी में कोई नहीं था, इसलिए कोई हताहत नहीं हुआ।
रांची के खादगढ़ा बस स्टैंड 6 बसों में लगी आग।#Ranchi #Jharkhand pic.twitter.com/zp5rTbDqiK
— Sohan singh (@sohansingh05) February 1, 2026
यह राहत की बात जरूर है कि कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह महज संयोग था या फिर दैवीय कृपा? अगर यह हादसा दिन के किसी अन्य समय हुआ होता, जब यात्री बसों में सवार होते या आसपास होते, तो क्या नतीजे होते?
शॉर्ट सर्किट की आशंका
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि आग लगने का सटीक कारण अभी पता नहीं चल सका है, लेकिन प्रारंभिक जांच में शॉर्ट सर्किट की आशंका जताई जा रही है। यह पहली बार नहीं है जब शॉर्ट सर्किट के कारण ऐसी घटना हुई हो। देश भर में ऐसी अनगिनत घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन हम हर बार सबक लेने के बजाय भूल जाते हैं।
क्षतिग्रस्त बस में विद्युत तारों की स्थिति कैसी थी? क्या नियमित रूप से बसों की तकनीकी जांच होती है? क्या टर्मिनस पर खड़ी बसों की विद्युत व्यवस्था की निगरानी का कोई तंत्र है? ये सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं।
बस टर्मिनस की सुरक्षा व्यवस्था
रांची जैसे शहर में, जो झारखंड की राजधानी है और जहां से रोज हजारों यात्री विभिन्न राज्यों के लिए आते-जाते हैं, वहां के प्रमुख बस टर्मिनस पर सुरक्षा व्यवस्था कैसी है? क्या यहां अग्निशमन यंत्र उपलब्ध हैं? क्या स्टाफ को आपात स्थिति में क्या करना है, इसका प्रशिक्षण दिया गया है?
अक्सर हम देखते हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा उपकरण या तो होते ही नहीं, या फिर इतने पुराने होते हैं कि जरूरत के समय काम नहीं आते। फायर एक्सटिंगुइशर रखे तो होते हैं, लेकिन उनकी समय-समय पर जांच नहीं होती।
आपदा प्रबंधन की कमी
इस घटना में यह भी देखने वाली बात है कि पांच दमकल गाड़ियों को आग बुझाने में दो घंटे लग गए। क्या यह समय बहुत ज्यादा नहीं है? क्या दमकलकर्मियों के पास पर्याप्त उपकरण थे? क्या उन्हें ऐसी आपात स्थितियों के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण मिला है?
आग लगने की सूचना मिलने के बाद दमकल विभाग की प्रतिक्रिया कितनी तेज थी? क्या टर्मिनस पर पानी की पर्याप्त व्यवस्था थी? ये सब महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनके जवाब हमें मिलने चाहिए।
क्षतिग्रस्त बसों का सवाल
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस बस से आग शुरू हुई, वह पहले से क्षतिग्रस्त थी। तो सवाल यह उठता है कि एक क्षतिग्रस्त बस टर्मिनस पर क्यों खड़ी थी? क्या उसकी मरम्मत हो रही थी? अगर हां, तो क्या मरम्मत के दौरान सुरक्षा के उचित इंतजाम किए गए थे?
अक्सर हम देखते हैं कि खराब या क्षतिग्रस्त वाहन लंबे समय तक सार्वजनिक स्थानों पर पड़े रहते हैं। न तो उनकी मरम्मत होती है और न ही उन्हें हटाया जाता है। यह लापरवाही कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
परिवहन विभाग की जिम्मेदारी
परिवहन विभाग की यह जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि टर्मिनस पर खड़ी सभी बसें तकनीकी रूप से सुरक्षित हैं। नियमित जांच होनी चाहिए, और जो बसें मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें तुरंत हटाया जाना चाहिए।
लेकिन हकीकत यह है कि अधिकतर जगहों पर यह जांच या तो होती ही नहीं, या फिर महज औपचारिकता बनकर रह जाती है। परिणाम यह होता है कि खराब हालत की बसें सड़कों पर और टर्मिनस पर चलती रहती हैं, जो किसी भी समय दुर्घटना का कारण बन सकती हैं।
यात्रियों की सुरक्षा
रोज हजारों यात्री इन बस टर्मिनसों का उपयोग करते हैं। उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या प्रशासन, परिवहन विभाग और बस ऑपरेटरों को यह एहसास है कि उनकी एक छोटी सी लापरवाही कितने लोगों की जान ले सकती है?
इस घटना में भाग्यवश कोई यात्री घायल नहीं हुआ, लेकिन अगर यह हादसा तब हुआ होता जब यात्री बसों में सवार हो रहे होते या टर्मिनस पर भीड़ होती, तो स्थिति भयावह हो सकती थी। भगदड़ में कितने लोग घायल होते, कितनों की जान जा सकती थी – यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
बीमा और मुआवजे का मुद्दा
छह बसों के जल जाने से बस ऑपरेटरों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ होगा। सवाल यह है कि क्या इन बसों का बीमा था? क्या ऑपरेटरों को मुआवजा मिलेगा? और अगर यह दुर्घटना किसी की लापरवाही के कारण हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
छोटे बस ऑपरेटरों के लिए एक-एक बस बड़ी पूंजी होती है। उसके जल जाने से उनकी आजीविका पर असर पड़ता है। क्या प्रशासन ने इस पहलू पर विचार किया है?
बार-बार दोहराई जाने वाली घटनाएं
यह पहली बार नहीं है जब किसी बस टर्मिनस या पार्किंग में आग लगने की घटना हुई हो। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी खबरें आती रहती हैं। लेकिन हर बार कुछ दिनों की हलचल के बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। न तो ठोस जांच होती है और न ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई कदम उठाए जाते हैं।
क्या हम हमेशा इसी तरह दुर्घटनाओं का इंतजार करते रहेंगे और फिर भूल जाएंगे? क्या हम कभी सबक नहीं लेंगे? क्या हमारी व्यवस्था हमेशा प्रतिक्रियाशील (रिएक्टिव) ही रहेगी, सक्रिय (प्रोएक्टिव) कभी नहीं बनेगी?
जांच और जवाबदेही
इस घटना की गहन जांच होनी चाहिए। सिर्फ यह पता लगाना काफी नहीं है कि आग कैसे लगी। यह भी जानना जरूरी है कि:
- टर्मिनस पर सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी?
- क्षतिग्रस्त बस वहां क्यों थी?
- आग फैलने में इतना समय क्यों लगा?
- दमकल विभाग की प्रतिक्रिया कितनी तेज थी?
- भविष्य में ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है?
और सबसे महत्वपूर्ण – अगर किसी की लापरवाही सामने आती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सुधार की जरूरत
रांची के इस बस टर्मिनस पर हुई यह घटना पूरे देश के बस टर्मिनसों और सार्वजनिक परिवहन स्थलों के लिए एक चेतावनी है। हमें गंभीरता से सुरक्षा मानकों पर ध्यान देना होगा।
कुछ जरूरी सुधार जो किए जाने चाहिए:
- सभी बसों की नियमित तकनीकी जांच
- टर्मिनस पर पर्याप्त अग्निशमन उपकरण
- स्टाफ का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण
- आपातकालीन निकास व्यवस्था
- सीसीटीवी निगरानी
- क्षतिग्रस्त वाहनों को तुरंत हटाना
जन जागरूकता भी जरूरी
सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। यात्रियों और बस ऑपरेटरों को भी सतर्क रहना होगा। अगर कोई खतरा दिखे, तो तुरंत अधिकारियों को सूचित करना चाहिए। धूम्रपान, माचिस या अन्य ज्वलनशील पदार्थों का सावधानी से उपयोग करना चाहिए।
रांची के खड़गड़ा बस टर्मिनस पर हुई यह घटना भले ही जनहानि के बिना टल गई हो, लेकिन यह हमारे लिए एक गंभीर चेतावनी है। छह बसों का जलकर राख हो जाना सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है, यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी का प्रतीक है।
हमें इस घटना से सबक लेना होगा। गहन जांच होनी चाहिए, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। सुरक्षा मानकों को कड़ाई से लागू करना होगा।
यात्रियों की सुरक्षा सर्वोपरि है। अगर हम अब भी नहीं जागे, तो अगली बार हम इतने भाग्यशाली नहीं हो सकते। समय रहते चेत जाना ही समझदारी है। उम्मीद करते हैं कि प्रशासन इस घटना को गंभीरता से लेगा और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाएगा