Budget 2026: देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला केंद्रीय बजट वर्ष 2026–27 इस बार कई मायनों में खास होने जा रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज रविवार को संसद में बजट पेश करेंगी, जो आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार होगा। अब तक बजट हमेशा कार्यदिवस में पेश होता रहा है, ऐसे में रविवार को बजट आना अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना मानी जा रही है।
यह बजट सिर्फ तारीख की वजह से नहीं, बल्कि इसके राजनीतिक, आर्थिक और वैश्विक संदर्भों के कारण भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह निर्मला सीतारमण का लगातार 9वां बजट होगा, जिससे वह देश की पहली महिला वित्त मंत्री बन जाएंगी जिन्होंने सबसे अधिक बार बजट पेश किया। साथ ही यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का 15वां बजट भी है।
बदलते दौर में बजट की अहमियत
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उम्मीद और चिंता दोनों साथ-साथ मौजूद हैं। देश के भीतर खपत बनी हुई है, महंगाई दर पहले के मुकाबले कुछ हद तक काबू में आई है और बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश हो रहा है। लेकिन दूसरी ओर वैश्विक माहौल अब भी अनिश्चित बना हुआ है।
दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ता संरक्षणवाद और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।
वैश्विक दबाव और भारत की चिंता
हाल के दिनों में अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर भारी शुल्क लगाए जाने से बाजारों में बेचैनी देखी गई है। इसका असर विदेशी निवेश पर पड़ा है और विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। नतीजतन रुपये पर दबाव बढ़ा है और यह अपने अब तक के निचले स्तरों के करीब पहुंच गया है।
ऐसे माहौल में बजट से यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाएगी, ताकि वैश्विक झटकों का असर आम लोगों तक न पहुंचे।
अब तक की राहत और उसकी कीमत
बीते वर्षों में सरकार ने आयकर में राहत, जीएसटी ढांचे में सुधार और बुनियादी ढांचे पर बड़े खर्च के जरिए अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश की है। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई कटौती से भी बाजार और उद्योग को कुछ सहारा मिला है।
हालांकि, इन राहत उपायों की एक कीमत भी चुकानी पड़ी है। कर कटौती के कारण सरकारी राजस्व पर असर पड़ा है, जिससे अब नए बजट में सरकार के पास खर्च बढ़ाने की गुंजाइश सीमित हो गई है। यही वजह है कि इस बार बजट में हर फैसले को बेहद सोच-समझकर लेने की जरूरत है।
किन क्षेत्रों पर रह सकती है खास नजर
अर्थशास्त्रियों और बजट पर नजर रखने वालों का मानना है कि इस बार रक्षा, बुनियादी ढांचा, पूंजीगत खर्च, बिजली और सस्ते आवास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा सकती है। इन क्षेत्रों में निवेश न सिर्फ रोजगार पैदा करता है, बल्कि लंबी अवधि में आर्थिक विकास को भी मजबूती देता है।
साथ ही सरकार के सामने सामाजिक योजनाओं और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी होगी। गरीब और कमजोर वर्ग के लिए योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन बढ़ते घाटे को काबू में रखना भी उतना ही अहम है।
वित्तीय घाटे पर सरकार की पकड़
कोविड महामारी के दौरान देश का वित्तीय घाटा 9 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया था। इसके बाद सरकार ने धीरे-धीरे इसे कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए। मौजूदा अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2026 में वित्तीय घाटा करीब 4.4 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार इस रास्ते से ज्यादा भटकेगी नहीं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों और निवेशकों की नजर भी भारत की वित्तीय स्थिति पर टिकी हुई है।
मध्यम वर्ग की उम्मीदें और सीमाएं
पिछले बजट में मध्यम वर्ग की खपत बढ़ाने पर खास ध्यान दिया गया था। इस बार उम्मीद की जा रही है कि राहत के उपाय ज्यादा सीमित और लक्ष्य आधारित होंगे। सरकार का फोकस बड़े स्तर पर खपत बढ़ाने के बजाय आर्थिक स्थिरता बनाए रखने पर ज्यादा रह सकता है।
कुल मिलाकर, वर्ष 2026 का बजट ऐसे समय में आ रहा है जब सरकार को विकास की रफ्तार बनाए रखने, वैश्विक अनिश्चितताओं से निपटने और वित्तीय अनुशासन कायम रखने के बीच बेहद संतुलित फैसला लेना होगा। यही वजह है कि यह बजट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की आर्थिक दिशा तय करने वाला रोडमैप माना जा रहा है।