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Explainer: सरकारी कोचिंग योजना, समान अवसर या जाति आधारित भेदभाव?

Government Free Coaching Scheme with Physics Wallah: जनरल कैटेगरी को बाहर रखना क्या न्यायसंगत है? जानिए पूरा विवाद
Government Free Coaching Scheme with Physics Wallah: जनरल कैटेगरी को बाहर रखना क्या न्यायसंगत है? जानिए पूरा विवाद (File Photo)

Government Free Coaching Scheme with Physics Wallah News: सामाजिक न्याय मंत्रालय ने Physics Wallah के साथ 5000 छात्रों को UPSC, SSC व बैंकिंग परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग देने का समझौता किया। लेकिन योजना में केवल SC, OBC शामिल, जनरल कैटेगरी और ST को बाहर रखा गया। समान अवसर पर सवाल।

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Government Free Coaching Scheme with Physics Wallah: केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने हाल ही में Physics Wallah Foundation के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत हर साल 5000 छात्रों को UPSC, SSC और बैंकिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग दी जाएगी। पहली नजर में यह योजना शिक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक कदम लगती है। लेकिन जब हम इसके पात्रता मानदंड को देखते हैं, तो एक गंभीर सवाल खड़ा होता है – क्या यह योजना वाकई समान अवसर देने की दिशा में कदम है या फिर यह जाति आधारित चयनात्मक न्याय का एक और उदाहरण?

योजना की बारीकियां

सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह मुफ्त कोचिंग केवल अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और PM CARES for Children Scheme के लाभार्थियों के लिए उपलब्ध होगी। चयन प्रक्रिया मेरिट आधारित होगी और छात्रों को लाइव व रिकॉर्डेड क्लासेस, टेस्ट सीरीज, अध्ययन सामग्री, मेंटरशिप और काउंसलिंग जैसी सुविधाएं मुफ्त मिलेंगी।

Explainer: सरकारी कोचिंग योजना, समान अवसर या जाति आधारित भेदभाव?

निस्संदेह ये सुविधाएं बेहद जरूरी हैं। आज के दौर में जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थान लाखों रुपये फीस वसूलते हैं, तब ऐसी मुफ्त सुविधाएं गरीब छात्रों के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या गरीबी केवल कुछ विशेष जातियों तक सीमित है?

जनरल कैटेगरी की अनदेखी

इस पूरी योजना में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सामान्य वर्ग के छात्रों का कहीं भी उल्लेख नहीं है। न ही आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए कोई विशेष प्रावधान बताया गया है। जो सरकार “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देती है, वही योग्य लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर जनरल कैटेगरी के छात्रों को इस योजना से पूरी तरह बाहर कर देती है।

क्या भारत में गरीब केवल SC और OBC वर्ग में ही हैं? क्या सामान्य वर्ग के गरीब परिवार नहीं हैं? क्या उनके बच्चे महंगी कोचिंग का खर्च नहीं उठा पाते?

गरीबी का असली चेहरा

देश के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में घूमकर देखिए। आपको हजारों ऐसे परिवार मिलेंगे जो सामान्य वर्ग से हैं, लेकिन आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। पिता मजदूरी करते हैं, मां घरेलू काम करती है, और बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। उनके लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए लाखों रुपये की कोचिंग फीस जुटा पाना असंभव है।

ऐसे परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चे जब इस योजना के बारे में सुनेंगे और यह जानेंगे कि वे सिर्फ अपनी जाति के कारण इसका लाभ नहीं ले सकते, तो उन्हें कैसा लगेगा? क्या यह उनके मन में निराशा और असंतोष नहीं पैदा करेगा?

जनजातीय छात्रों की उपेक्षा

Government Free Coaching Scheme with Physics Wallah: दिलचस्प बात यह भी है कि प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया गया है कि जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस प्रकार का कोई समझौता नहीं किया है। यानी अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए भी इस पहल में कोई सीधा प्रावधान नहीं है।

यह और भी अजीब है क्योंकि जनजातीय समुदाय देश के सबसे पिछड़े और उपेक्षित वर्गों में से एक है। दूरदराज के आदिवासी इलाकों में शिक्षा की पहुंच आज भी बेहद सीमित है। अगर सरकार वाकई समावेशी शिक्षा की बात करती है, तो ST छात्रों को बाहर रखना किस तर्क से उचित है?

समावेशिता का दावा खोखला

सरकार जब समावेशी नीतियों की बात करती है, तो उसका मतलब यह होना चाहिए कि सभी जरूरतमंद वर्गों को लाभ मिले। लेकिन यहां तो कुछ वर्गों को शामिल किया गया और कुछ को पूरी तरह बाहर कर दिया गया। यह समावेशिता नहीं, बल्कि चयनात्मक कल्याण है।

जाति बनाम आर्थिक स्थिति

इस योजना से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गरीबी को जाति से जोड़कर देखना सही है? आज के भारत में यह मान लेना कि सभी SC/OBC छात्र गरीब हैं और सभी जनरल कैटेगरी छात्र अमीर हैं, एक बेहद गलत धारणा है।

हकीकत यह है कि आरक्षण का लाभ उठाकर कई SC/OBC परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके हैं। उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, महंगी कोचिंग ले सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, कई सामान्य वर्ग के परिवार गरीबी में जी रहे हैं।

क्रीमी लेयर का सवाल

OBC वर्ग में क्रीमी लेयर का प्रावधान तो है, लेकिन क्या इस योजना में इसका ध्यान रखा जा रहा है? अगर एक OBC परिवार जिसकी वार्षिक आय 15-20 लाख रुपये है, वह भी इस मुफ्त कोचिंग का लाभ ले सकता है, जबकि 50,000 रुपये सालाना कमाने वाला सामान्य वर्ग का परिवार इससे वंचित रहता है, तो यह किस तरह का सामाजिक न्याय है?

संवैधानिक मूल्यों का प्रश्न

भारतीय संविधान में समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) सभी नागरिकों को समान अवसर की गारंटी देता है। यह भी कहता है कि राज्य किसी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

जब एक सरकारी योजना किसी वर्ग विशेष के छात्रों को सिर्फ उनकी जाति के आधार पर बाहर कर देती है, तो क्या यह संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ नहीं है?

सकारात्मक भेदभाव की सीमा

सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे लाना है। यह जरूरी भी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अन्य जरूरतमंद वर्गों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए।

संतुलित नीति वह होती है जो सभी जरूरतमंदों को लाभ पहुंचाए, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या वर्ग से हों।

राजनीतिक मकसद की आशंका

ऐसी योजनाओं को लेकर हमेशा यह आशंका रहती है कि कहीं इनके पीछे राजनीतिक मकसद तो नहीं। SC/OBC वोट बैंक को साधने के लिए ऐसी योजनाएं लाई जाती हैं, जबकि जनरल कैटेगरी को नजरअंदाज किया जाता है क्योंकि वे संख्या में कम हैं।

अगर यह सच है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। शिक्षा को राजनीतिक लाभ का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। हर योग्य और जरूरतमंद छात्र को, चाहे वह किसी भी वर्ग से हो, समान अवसर मिलना चाहिए।

वोट बैंक राजनीति का शिकार शिक्षा

जब शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी वोट बैंक की राजनीति हावी हो जाती है, तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाता है। प्रतिभाशाली छात्र जो देश की संपत्ति हैं, अगर वे सिर्फ अपनी जाति के कारण अवसरों से वंचित रह जाएं, तो यह पूरे राष्ट्र के लिए नुकसान है।

Government Free Coaching Scheme with Physics Wallah: EWS का क्या हुआ?

सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। यह मानते हुए कि सामान्य वर्ग में भी गरीब परिवार हैं जिन्हें विशेष सहायता की जरूरत है।

लेकिन इस कोचिंग योजना में EWS के लिए कोई विशेष प्रावधान क्यों नहीं है? क्या EWS प्रावधान केवल कागजों पर है और व्यावहारिक योजनाओं में इसे नजरअंदाज किया जाता है?

आधा-अधूरा न्याय

जब सरकार एक ओर EWS आरक्षण देती है और दूसरी ओर अपनी योजनाओं में उन्हें शामिल नहीं करती, तो यह आधा-अधूरा न्याय है। या तो पूरी तरह आर्थिक आधार पर योजनाएं बनाई जाएं, या फिर जाति आधारित योजनाओं में भी सभी वर्गों को समान रूप से शामिल किया जाए।

समाधान क्या हो सकता है?

इस समस्या का समाधान बेहद सरल है। सरकार चाहे तो:

आर्थिक आधार पर चयन करे: योजना को पूरी तरह आर्थिक आधार से जोड़ दिया जाए। जिस परिवार की वार्षिक आय एक निश्चित सीमा से कम है, चाहे वह किसी भी जाति का हो, वह इस योजना का लाभ ले सके।

सभी वर्गों को शामिल करे: SC, OBC के साथ-साथ ST, EWS और सामान्य वर्ग के जरूरतमंद छात्रों को भी शामिल किया जाए। सीटों का बंटवारा आरक्षण नीति के अनुसार हो, लेकिन किसी को पूरी तरह बाहर न किया जाए।

समानांतर योजना शुरू करे: अगर यह योजना विशेष वर्गों के लिए है, तो अन्य जरूरतमंद वर्गों के लिए एक समानांतर योजना शुरू की जाए, ताकि किसी को भी वंचित न रहना पड़े।

पारदर्शिता और मेरिट

चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और मेरिट आधारित होनी चाहिए। जो छात्र वाकई जरूरतमंद हैं और प्रतिभाशाली हैं, उन्हें ही यह सुविधा मिलनी चाहिए। किसी भी तरह की सिफारिश या भाई-भतीजावाद की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

सामाजिक सद्भाव का सवाल

ऐसी योजनाएं जो कुछ वर्गों को बाहर करती हैं, समाज में असंतोष और विभाजन पैदा करती हैं। जब एक गरीब सामान्य वर्ग का छात्र देखता है कि उससे बेहतर आर्थिक स्थिति वाले SC/OBC छात्र को मुफ्त कोचिंग मिल रही है, लेकिन उसे नहीं, तो वह क्या महसूस करेगा?

यह उसके मन में कड़वाहट पैदा करता है, जो सामाजिक सद्भाव के लिए खतरनाक है। हमें ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो समाज को जोड़ें, न कि तोड़ें।

जातिगत ध्रुवीकरण का खतरा

जब सरकारी योजनाएं लगातार जाति के आधार पर बनती हैं और कुछ वर्गों को बाहर रखती हैं, तो इससे जातिगत ध्रुवीकरण बढ़ता है। यह देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है।


Physics Wallah के साथ मिलकर मुफ्त कोचिंग देने की यह पहल निस्संदेह सराहनीय है। ऐसी योजनाएं जरूरी हैं और इन्हें बढ़ावा मिलना चाहिए। लेकिन जब ये योजनाएं सभी जरूरतमंद छात्रों के लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं होतीं, तो वे सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि चयनात्मक राहत बन जाती हैं।

सरकार को समझना होगा कि प्रतिभा की कोई जाति नहीं होती। गरीबी भी किसी विशेष जाति तक सीमित नहीं है। अगर वाकई समान अवसर देना है, तो योजनाओं का दायरा भी समान होना चाहिए।

आर्थिक आधार पर योजनाएं बनाना, सभी जरूरतमंद वर्गों को शामिल करना, और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाना – यही वास्तविक सामाजिक न्याय है। अन्यथा ये योजनाएं केवल राजनीतिक लाभ के साधन बनकर रह जाएंगी और समाज में विभाजन बढ़ाएंगी।

उम्मीद करते हैं कि सरकार इन सवालों पर गंभीरता से विचार करेगी और अपनी नीतियों में जरूरी बदलाव लाएगी। शिक्षा का अधिकार हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसमें किसी भी तरह का भेदभाव अस्वीकार्य है।


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Gangesh Kumar

Rashtra Bharat में Writer, Author और Editor। राजनीति, नीति और सामाजिक विषयों पर केंद्रित लेखन। BHU से स्नातक और शोधपूर्ण रिपोर्टिंग व विश्लेषण के लिए पहचाने जाते हैं।