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भविष्य के वादे और वर्तमान की उपेक्षा: बजट में आम आदमी की चिंताओं का अभाव

Union Budget 2026: भविष्य के सपनों में खो गई आम नागरिक की असली जरूरतें
Union Budget 2026: भविष्य के सपनों में खो गई आम नागरिक की असली जरूरतें

Budget 2026: केंद्रीय बजट 2026 में भविष्य की योजनाओं पर जोर दिया गया, लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और मध्यम वर्ग पर बढ़ते आर्थिक दबाव जैसे तात्कालिक मुद्दों को नजरअंदाज किया गया। बजट आम नागरिकों की जमीनी हकीकत से दूर रहा।

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देश का केंद्रीय बजट हर साल करोड़ों लोगों की उम्मीदों का केंद्र बनता है। इस बार भी जब वित्त मंत्री ने संसद में बजट पेश किया, तो चमकदार योजनाओं और भविष्य की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की झड़ी लग गई। लेकिन जब हम इस बजट को आम नागरिक की नजर से देखते हैं, तो एक गहरा सवाल उभरता है – क्या यह बजट वाकई उस इंसान के लिए है जो रोज सुबह उठकर महंगाई से जूझता है, बेरोजगारी की मार झेलता है, और अपने परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष करता है?

चमक-दमक में खोया सच

बजट में हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं पर खूब जोर दिया गया। निस्संदेह ये परियोजनाएं देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करेंगी और दीर्घकालिक विकास में योगदान देंगी। लेकिन सवाल यह है कि जब एक किसान अपनी फसल का उचित दाम नहीं पा रहा, जब एक युवा डिग्री लेकर भी नौकरी की तलाश में भटक रहा है, जब एक मध्यम वर्गीय परिवार महंगाई की मार से कराह रहा है, तो क्या उन्हें इन भविष्य के सपनों से कोई तात्कालिक राहत मिलेगी?

बजट की चकाचौंध में वे मुद्दे गायब हो गए जो रोज शाम की चाय की चर्चा में, गांव की चौपाल पर और शहर की झुग्गियों में सुनाई देते हैं। महंगाई पर काबू पाने के लिए कोई प्रभावी रणनीति नहीं दिखी। बेरोजगारी के आंकड़ों को संबोधित करने वाली कोई ठोस योजना सामने नहीं आई।

किसानों की आवाज अनसुनी

देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों के लिए यह बजट एक बार फिर निराशाजनक साबित हुआ। न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर किसान वर्षों से आंदोलनरत हैं, लेकिन इस बार भी इस मुद्दे को दरकिनार कर दिया गया। कर्ज में डूबे किसानों के लिए कोई राहत पैकेज नहीं आया। खेती की बढ़ती लागत को कम करने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं दिखे।

उर्वरक, बीज, बिजली और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन उत्पादों की कीमतें उसी अनुपात में नहीं बढ़तीं। नतीजा यह होता है कि किसान हर साल घाटे में चला जाता है। बजट में इन समस्याओं के समाधान के लिए कोई दीर्घकालिक और प्रभावी योजना नहीं दिखी।

बेरोजगारी का भूत

युवाओं के लिए रोजगार सृजन हमेशा से बजट की प्राथमिकता रही है, कम से कम घोषणाओं में तो जरूर। लेकिन हकीकत यह है कि देश में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य व्यावसायिक डिग्रियां लेकर भी लाखों युवा नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं।

इस बजट में स्किल डेवलपमेंट और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की बातें जरूर की गईं, लेकिन स्थायी और सुरक्षित रोजगार के अवसर कहां हैं? असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा की कोई व्यापक योजना नहीं दिखी।

मध्यम वर्ग की उपेक्षा

मध्यम वर्ग, जो देश की अर्थव्यवस्था की धुरी है, इस बजट से काफी हद तक निराश रहा। आयकर में राहत की उम्मीद थी, लेकिन वह भी बहुत सीमित रही। रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों के लिए बजट आवंटन अपर्याप्त है।

निजी अस्पतालों में इलाज की बढ़ती लागत और सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी के बीच आम आदमी पिस रहा है। शिक्षा का बढ़ता खर्च माता-पिता के लिए बोझ बन गया है। इन मुद्दों पर बजट में कोई संवेदनशील पहल नहीं दिखी।

असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है

देश में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि गरीब और गरीब। बजट में इस खाई को पाटने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी योजनाएं तो हैं, लेकिन उनकी पहुंच और प्रभावशीलता पर सवाल उठते रहते हैं।

ग्रामीण विकास के नाम पर आवंटन तो होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की कमी से वे योजनाएं कागजों तक सिमट कर रह जाती हैं। लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की बातें होती हैं, लेकिन व्यावहारिक सहायता नहीं मिलती।

जरूरत है संवेदनशील दृष्टिकोण की

बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। यह देश के करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला दस्तावेज है। इसे बनाते समय उन लोगों की आवाज सुनना जरूरी है जो हाशिए पर हैं, जो रोज संघर्ष करते हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना चुनौती है।

भविष्य की योजनाएं बनाना गलत नहीं है, लेकिन वर्तमान की समस्याओं को नजरअंदाज करके कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती। अगर किसान खुशहाल नहीं होगा, युवा बेरोजगार रहेगा, मध्यम वर्ग आर्थिक दबाव में रहेगा, तो हाई-स्पीड ट्रेनें और स्मार्ट सिटीज किसके लिए होंगी?

जरूरत इस बात की है कि बजट बनाते समय जमीनी हकीकत को ध्यान में रखा जाए। सब्सिडी, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार गारंटी और आर्थिक असमानता को कम करने वाली नीतियों पर ज्यादा जोर दिया जाए। तभी एक समावेशी और संतुलित विकास संभव है।

यह बजट भविष्य के सपने तो दिखाता है, लेकिन वर्तमान की पीड़ा को कम करने में विफल रहा है। आने वाले समय में सरकार को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा, वरना आम आदमी की निराशा और गहराती जाएगी।

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Gangesh Kumar

Rashtra Bharat में Writer, Author और Editor। राजनीति, नीति और सामाजिक विषयों पर केंद्रित लेखन। BHU से स्नातक और शोधपूर्ण रिपोर्टिंग व विश्लेषण के लिए पहचाने जाते हैं।