हरियाणा की राजनीति में एक बार फिर से राज्यसभा चुनाव की चर्चा शुरू हो गई है। मार्च 2026 में प्रदेश की दो राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने वाला है और इस बार भी सभी की निगाहें भाजपा की रणनीति पर टिकी हुई हैं। पिछली बार दिसंबर 2024 में भाजपा ने चौंकाने वाला खेल खेलकर कांग्रेस को पूरी तरह से बाहर कर दिया था। अब सवाल यह है कि क्या इस बार भी भाजपा वैसा ही कुछ करने की योजना बना रही है।
पिछले चुनाव में क्या हुआ था
दिसंबर 2024 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ा उलटफेर किया था। उस समय भाजपा के पास केवल एक ही सीट जीतने के लिए पर्याप्त विधायक थे। लेकिन पार्टी ने अपनी चतुर रणनीति से एक निर्दलीय उम्मीदवार को अपना समर्थन देकर जिता दिया था। इस कारण कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। यह भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक जीत मानी गई थी। अब एक बार फिर से वैसी ही स्थिति बन रही है और भाजपा फिर से अपनी ताकत दिखाने की तैयारी में लग गई है।
कब खाली होंगी सीटें
हरियाणा की दो राज्यसभा सीटें 9 अप्रैल 2026 को खाली होने वाली हैं। इन सीटों पर फिलहाल भाजपा की किरण चौधरी और रामचंदर जांगड़ा बैठे हुए हैं। दोनों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इसलिए इन दोनों सीटों के लिए नए चुनाव होंगे। राज्य की कुल पांच राज्यसभा सीटों में से सभी पर फिलहाल भाजपा का कब्जा है। बाकी तीन सीटों पर रेखा शर्मा, कार्तिकेय शर्मा और सुभाष बराला बैठे हुए हैं।
विधायकों की संख्या का गणित
राज्यसभा चुनाव में विधायकों की संख्या बहुत मायने रखती है। एक सीट जीतने के लिए कम से कम 31 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। फिलहाल भाजपा के पास 48 विधायक हैं। इसके अलावा इनेलो के दो विधायक और तीन निर्दलीय विधायक भी भाजपा का साथ देते हैं। इस तरह भाजपा की कुल ताकत 53 विधायक हो जाती है। दूसरी तरफ कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं।
मौजूदा स्थिति के अनुसार दोनों पार्टियां एक-एक सीट आसानी से जीत सकती हैं। लेकिन भाजपा अगर दोनों सीटें जीतना चाहती है तो उसे 62 विधायकों का समर्थन चाहिए होगा। इसका मतलब है कि भाजपा को अभी 9 विधायकों की और जरूरत होगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस बार भी कांग्रेस के विधायकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर सकती है।
किसे मिल सकता है टिकट
राज्यसभा की इन दो सीटों के लिए भाजपा किसे टिकट देगी, यह सबसे बड़ा सवाल है। राजनीतिक समझ रखने वाले नेताओं का कहना है कि इस बार भाजपा जाट समुदाय के किसी नेता को जरूर भेजेगी। क्योंकि हरियाणा में जाट समुदाय की राजनीति में बड़ी भूमिका है। फिलहाल राज्यसभा में भाजपा के दो ब्राह्मण सांसद रेखा शर्मा और कार्तिकेय शर्मा पहले से ही हैं। तीसरे सांसद सुभाष बराला जाट समुदाय से हैं।
राज्य में जातीय संतुलन बनाने के लिए भाजपा एक जाट नेता के साथ किसी अन्य पिछड़ी जाति या दलित समुदाय के नेता को भी मौका दे सकती है। इससे पार्टी को सभी वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद मिलेगी।
प्रमुख दावेदारों के नाम
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओपी धनखड़ और पूर्व मंत्री जेपी दलाल का नाम जाट उम्मीदवार के तौर पर चर्चा में है। दोनों ही अनुभवी नेता हैं और पार्टी में इनकी अच्छी पकड़ है। इसके अलावा मौजूदा सांसद किरण चौधरी खुद भी एक और कार्यकाल चाहती हैं। उन्हें अभी राज्यसभा में सिर्फ दो साल हुए हैं और वह एक पूरा कार्यकाल चाहती हैं।
मोहन लाल बड़ौली और रामविलास शर्मा का नाम भी सुनाई दे रहा है। लेकिन चूंकि दोनों ब्राह्मण समुदाय से हैं और पहले से ही दो ब्राह्मण नेता राज्यसभा में हैं, इसलिए इन्हें टिकट मिलने की संभावना कम है।
एक और नाम राजीव जेटली का भी चर्चा में है। वह मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के मीडिया सलाहकार हैं और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं। पार्टी में उनकी सक्रियता को देखते हुए उन्हें भी मौका मिल सकता है।
दलित चेहरे की तलाश
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि भाजपा किसी दलित नेता को भी राज्यसभा भेज सकती है। लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि दलित समुदाय में से किस नेता पर विचार चल रहा है। दलित वोट बैंक को मजबूत करने के लिए पार्टी इस दिशा में सोच रही है। लेकिन अभी तक कोई नाम सामने नहीं आया है।
क्या है भाजपा की रणनीति
भाजपा की रणनीति साफ है। पार्टी दोनों सीटें जीतकर कांग्रेस को पूरी तरह से बाहर रखना चाहती है। इसके लिए पार्टी विधायकों को साधने का काम शुरू कर सकती है। पिछली बार भी भाजपा ने यही किया था और सफल रही थी। इस बार भी वैसा ही कुछ हो सकता है।
भाजपा का मानना है कि अगर दोनों सीटें जीत जाती हैं तो हरियाणा की सभी पांच राज्यसभा सीटों पर पार्टी का कब्जा बना रहेगा। यह पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। खासकर जब विपक्ष लगातार भाजपा पर हमले कर रहा है।
कांग्रेस की स्थिति
कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं जो एक सीट जीतने के लिए काफी हैं। लेकिन समस्या यह है कि अगर भाजपा ने विधायकों को तोड़ने की कोशिश की तो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पिछली बार भी कांग्रेस को शून्य पर रोक दिया गया था। इस बार कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने की पूरी कोशिश करेगी।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इस बार वे सतर्क रहेंगे और भाजपा को कोई मौका नहीं देंगे। लेकिन राजनीति में कुछ भी तय नहीं है। खासकर जब सामने भाजपा जैसी पार्टी हो जो अपनी रणनीति के लिए जानी जाती है।
निर्दलीय और छोटे दलों का रोल
इनेलो के दो विधायक और तीन निर्दलीय विधायक इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। फिलहाल ये सभी भाजपा का समर्थन करते हैं। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल है। अगर किसी तरह कांग्रेस इन विधायकों को अपनी ओर खींचने में सफल हो जाती है तो खेल पलट सकता है।
लेकिन भाजपा इतना आसान नहीं होने देगी। पार्टी अपने समर्थक विधायकों को साधने में पूरी ताकत लगा देगी। इसके लिए भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व भी सक्रिय हो सकती है।
आने वाले दिनों में क्या होगा
अभी मार्च 2026 में चुनाव होना है। लेकिन तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं। आने वाले दिनों में भाजपा अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान करेगी। इसके बाद साफ हो जाएगा कि पार्टी किस रणनीति के साथ चुनाव में उतर रही है।
कांग्रेस भी अपनी तैयारियां शुरू कर देगी। दोनों पार्टियों के बीच विधायकों को साधने की होड़ शुरू हो जाएगी। यह चुनाव सिर्फ दो सीटों का नहीं है बल्कि हरियाणा की राजनीति में अपनी ताकत दिखाने का है।
इस चुनाव के नतीजे यह भी तय करेंगे कि हरियाणा में किस पार्टी की कितनी पकड़ है। भाजपा अगर दोनों सीटें जीत जाती है तो यह साबित हो जाएगा कि राज्य में उसकी मजबूत स्थिति है। वहीं अगर कांग्रेस एक सीट जीत लेती है तो यह उसके लिए राहत की बात होगी।