साहित्य में लोक की महत्ता पर विशेष व्याख्यान
नागपुर। साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि यह समाज की आत्मा और लोक की अस्मिता को दर्शाता है। यह महत्वपूर्ण बात सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में कही। यह कार्यक्रम महाकवि निराला की जयंती और बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर आयोजित किया गया था।
प्रोफेसर शर्मा ने अपने व्याख्यान में साहित्य और लोक के बीच के गहरे रिश्ते को समझाया। उन्होंने कहा कि साहित्य का असली काम लोक की भावनाओं, उनकी समस्याओं और उनके जीवन को शब्दों में पिरोना है। बिना लोक के साहित्य की कल्पना करना असंभव है।
साहित्य का लोकवृत्त और मानव सभ्यता
प्रोफेसर शर्मा ने अपने संबोधन में बताया कि साहित्य का लोकवृत्त यानी लोक से जुड़ाव मानव सभ्यता की असली पहचान कराता है। साहित्य के दायरे में मानव समाज की प्रगति का हर कदम, हर बदलाव दर्ज होता है। जब हम पुराने साहित्य को पढ़ते हैं तो हमें उस समय के समाज की स्थिति का पता चलता है।
उन्होंने कहा कि लोक ही साहित्य और समाज की असली अस्मिता है। लोक की पहचान के बिना समाज का अस्तित्व अधूरा माना जाता है। यह केवल एक सिद्धांत नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का मूल आधार है। साहित्य तभी सार्थक होता है जब वह लोक की आवाज बने, उनकी पीड़ा को समझे और उनकी खुशियों को बयान करे।

निराला का साहित्य और लोक चेतना
कार्यक्रम निराला जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था इसलिए प्रोफेसर शर्मा ने महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साहित्य पर विशेष चर्चा की। उन्होंने कहा कि निराला का साहित्य हमारे लोक की चेतना का साहित्य है। निराला ने अपनी रचनाओं में लोक के अनेक रूपों का जीवंत चित्रण किया है।
निराला ने अपनी कविताओं और रचनाओं में आम लोगों की जिंदगी, उनके संघर्ष, उनकी मुश्किलें और उनकी आशाओं को बखूबी दर्शाया है। चाहे वह तोड़ती पत्थर कविता हो या राम की शक्तिपूजा, हर रचना में लोक की गहरी छाप दिखाई देती है। निराला का साहित्य केवल कल्पना का खेल नहीं था बल्कि यथार्थ का दर्पण था।
भारतीय भाषाओं में लोक साहित्य की एकता
प्रोफेसर शर्मा ने एक महत्वपूर्ण बात और कही कि भारतीय भाषाओं में लिखा गया लोक साहित्य पूरे देश में एक जैसा प्रतीत होता है। चाहे वह हिंदी हो, मराठी हो, बंगाली हो या कोई अन्य भाषा, लोक साहित्य का स्वर एक जैसा सुनाई देता है। इसका कारण यह है कि भारतीय लोक की संवेदना एक जैसी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय लोक का भावबोध भारतीयता की संकल्पना में रचा-बसा है। हमारी प्रकृति, हमारे संस्कार, हमारी परंपराएं पूरे राष्ट्र में एक चेतना से संचालित होती हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु का लोक साहित्य हो या कश्मीर का, उसमें भारतीयता की एक समान सुगंध मिलती है।
लोक साहित्य की बुनियाद पर चर्चा
कार्यक्रम में प्रारंभिक वक्तव्य देते हुए नागपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर मनोज पांडेय ने कहा कि लोक ही साहित्य की बुनियाद है। साहित्य का असली विषय लोक-समाज की चिंता है। बिना लोक के साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती।
डॉक्टर पांडेय ने कहा कि लोक ही रचना का जीवद्रव्य है। जब एक लेखक या कवि रचना करता है तो वह अपने आसपास के लोक से ही प्रेरणा लेता है। लोक की समस्याएं, उनकी खुशियां, उनके त्यौहार, उनके रीति-रिवाज सब साहित्य का हिस्सा बनते हैं। साहित्य की कसौटी लोकवृत्त की परख पर ही केंद्रित होती है।
निराला का साहित्य भारतीय समाज की चिंताओं का प्रतीक
विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के राजभाषा अधिकारी सत्येंद्र प्रसाद सिंह ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। उन्होंने कहा कि निराला का साहित्य भारतीय समाज की चिंताओं का प्रतिपादक है। निराला ने अपनी रचनाओं में उस समय के समाज की विसंगतियों, असमानताओं और सामाजिक समस्याओं को उठाया।
निराला का साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं था बल्कि यह समाज को दिशा देने वाला साहित्य था। उन्होंने स्त्री सशक्तिकरण, गरीबी, शोषण जैसे मुद्दों को अपनी रचनाओं में जगह दी। इसलिए निराला का साहित्य आज भी प्रासंगिक है और आने वाले समय में भी रहेगा।
लोक को साहित्य का केंद्र बताया गया
भाषा विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर शैलेंद्र कुमार ने चर्चा में भाग लेते हुए लोक को साहित्य की चिंता का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य का मुख्य उद्देश्य लोक की सेवा करना है। साहित्य को लोक से जुड़ा रहना चाहिए तभी वह सार्थक होता है।
डॉक्टर कुमार ने कहा कि आजकल कुछ साहित्य ऐसा भी लिखा जा रहा है जो लोक से कटा हुआ है। ऐसा साहित्य केवल कुछ समय के लिए चर्चा में रहता है लेकिन लंबे समय तक नहीं टिक पाता। जो साहित्य लोक से जुड़ा होता है, वह पीढ़ियों तक याद रखा जाता है।
कार्यक्रम का सफल आयोजन
कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर सुमित सिंह ने बहुत ही सुंदर तरीके से किया। उन्होंने सभी वक्ताओं का परिचय दिया और कार्यक्रम को सुव्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया। कार्यक्रम के अंत में डॉक्टर जागृति सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर प्रोफेसर कुंजनलाल लिल्हारे, प्रोफेसर दामोदर द्विवेदी, प्रोफेसर विनय उपाध्याय सहित अनेक शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे। सभी ने कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और वक्ताओं के विचारों को ध्यान से सुना।
विश्वविद्यालय के छात्रों ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन उनके लिए बहुत लाभदायक होते हैं। इससे उन्हें साहित्य और समाज के बीच के रिश्ते को समझने का मौका मिलता है। निराला जैसे महान साहित्यकारों के विचारों को जानने का अवसर भी मिलता है।
यह कार्यक्रम साहित्य प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण आयोजन था। इसने यह संदेश दिया कि साहित्य केवल किताबों तक सीमित नहीं है बल्कि यह समाज और लोक से जुड़ा हुआ है। साहित्य की असली ताकत लोक में बसती है और जब तक साहित्य लोक से जुड़ा रहेगा, तब तक वह प्रासंगिक बना रहेगा।