महाराष्ट्र में चल रहे नगर निकाय चुनावों ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इन चुनावों में विकास से ज्यादा चर्चा गठबंधन की हो रही है। खास बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने कुछ जगहों पर कांग्रेस और AIMIM जैसी पार्टियों के साथ मिलकर सत्ता बनाई या बनाने की कोशिश की। इससे पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह सवाल खड़े हो गए हैं।
नगर निकाय चुनाव और बदलती राजनीति
नगर निकाय चुनाव आम तौर पर स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं। सड़क, पानी, सफाई और बिजली जैसे मुद्दे इसमें अहम होते हैं। लेकिन इस बार महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में राजनीतिक दलों के फैसलों ने सबका ध्यान खींचा है। ठाणे जिले के अंबरनाथ और अकोला जिले के अकोट में हुए गठबंधन ने यह दिखा दिया कि स्थानीय राजनीति अब बड़े सियासी फैसलों से जुड़ गई है।
अंबरनाथ में कांग्रेस के साथ गठबंधन
ठाणे जिले के अंबरनाथ नगर परिषद में बीजेपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सत्ता बनाई। यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला रहा। आम तौर पर बीजेपी और कांग्रेस एक-दूसरे की विरोधी मानी जाती हैं। ऐसे में दोनों का साथ आना कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के लिए हैरानी की बात थी। स्थानीय नेताओं का कहना था कि यह गठबंधन नगर के हित में किया गया, ताकि स्थिर सरकार बनाई जा सके।
अकोट में AIMIM से समझौता
अकोला जिले के अकोट नगर निकाय में बीजेपी और AIMIM के बीच गठबंधन की खबर ने विवाद को और बढ़ा दिया। AIMIM को लेकर बीजेपी पहले कई बार तीखा रुख दिखाती रही है। ऐसे में दोनों का साथ आना पार्टी की नीति पर सवाल खड़े करता है। विपक्ष ने इसे अवसर की राजनीति बताया, जबकि बीजेपी के कुछ नेताओं ने इसे स्थानीय मजबूरी कहा।
फडणवीस की सख्त नाराजगी
इन गठबंधनों पर उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस और AIMIM के साथ किसी भी तरह का गठबंधन पार्टी को मंजूर नहीं है। फडणवीस ने यह भी कहा कि इन फैसलों के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व से कोई मंजूरी नहीं ली गई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे कदम पार्टी अनुशासन के खिलाफ हैं और जिम्मेदार नेताओं पर कार्रवाई की जाएगी।
पार्टी अनुशासन का मुद्दा
बीजेपी हमेशा से खुद को अनुशासित पार्टी बताती रही है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर लिए गए इन फैसलों ने संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। फडणवीस का बयान यह संकेत देता है कि पार्टी नेतृत्व अब इस मामले को हल्के में नहीं लेना चाहता। इससे यह भी साफ होता है कि बीजेपी राज्य में अपनी राजनीतिक लाइन को स्पष्ट रखना चाहती है।
शिंदे गुट की नाराजगी
डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के गुट ने भी इन गठबंधनों पर आपत्ति जताई। उनके बेटे श्रीकांत शिंदे ने अंबरनाथ के गठबंधन का विरोध किया था। शिंदे गुट का मानना है कि ऐसे फैसले गठबंधन सरकार में गलत संदेश देते हैं। इससे सरकार की एकजुटता पर भी असर पड़ सकता है।
विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया है। शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने कहा कि बीजेपी सत्ता में बने रहने के लिए किसी के भी साथ जा सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कांग्रेस और AIMIM गलत हैं, तो फिर उनके साथ सत्ता क्यों बनाई जा रही है। विपक्ष का कहना है कि बीजेपी की कथनी और करनी में फर्क साफ दिख रहा है।
स्थानीय मजबूरी या सियासी अवसर
इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन स्थानीय मजबूरी का नतीजा है या फिर राजनीतिक अवसरवाद का। कई बार नगर निकायों में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, ऐसे में पार्टियां समझौता करती हैं। लेकिन जब यह समझौता पार्टी की घोषित नीति के खिलाफ हो, तो विवाद होना तय है।
आने वाले चुनावों पर असर
इन घटनाओं का असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। मतदाता यह देख रहे हैं कि पार्टियां सत्ता के लिए कितनी दूर तक जा सकती हैं। बीजेपी के लिए यह जरूरी होगा कि वह अपने फैसलों को साफ तौर पर जनता के सामने रखे, ताकि भ्रम की स्थिति न बने।
राजनीति में संदेश की अहमियत
राजनीति में सिर्फ फैसले ही नहीं, उनका संदेश भी उतना ही अहम होता है। कांग्रेस और AIMIM के साथ गठबंधन का संदेश बीजेपी के पारंपरिक समर्थकों तक क्या जाता है, यह सवाल अभी खुला है। पार्टी नेतृत्व की सख्ती यह दिखाती है कि वह इस संदेश को संभालना चाहता है।