पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती को लेकर एक बार फिर विवाद की स्थिति बन गई है। SLST-2 के वंचित अभ्यर्थियों ने अपनी नौकरी और अन्य कई मांगों को लेकर बिकाश भवन की ओर मार्च करने का फैसला किया था। लेकिन करुणामयी मेट्रो स्टेशन के पास जमा होते ही बिधाननगर पुलिश ने इन आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इस घटना ने एक बार फिर राज्य में नौकरी की मांग करने वाले युवाओं और सरकार के बीच तनाव को बढ़ा दिया है।
SLST-2 अभ्यर्थियों की मांगें
SLST-2 यानी स्कूल लेवल सिलेक्शन टेस्ट-2 की परीक्षा पास करने वाले कई अभ्यर्थी लंबे समय से नौकरी का इंतजार कर रहे हैं। इन फ्रेशर्स का कहना है कि उन्होंने सभी जरूरी परीक्षाएं पास की हैं, लेकिन फिर भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। नौकरी के अलावा इन अभ्यर्थियों की और भी कई मांगें हैं जिन पर सरकार ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
इन युवाओं का कहना है कि वे अपने परिवार की उम्मीद हैं और लंबे इंतजार ने उनकी परेशानियां बढ़ा दी हैं। कई अभ्यर्थियों की उम्र भी सरकारी नौकरी की सीमा के करीब पहुंच रही है। ऐसे में उनकी चिंता स्वाभाविक है।
बिकाश भवन की ओर क्यों निकाला मार्च
बिकाश भवन पश्चिम बंगाल सरकार का मुख्य प्रशासनिक भवन है जहां से राज्य की सरकार अपना कामकाज चलाती है। वंचित SLST-2 अभ्यर्थियों ने अपनी मांगों को सीधे मुख्यमंत्री और राज्य सरकार तक पहुंचाने के लिए बिकाश भवन की ओर मार्च करने की योजना बनाई थी।
उनका मानना था कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखकर वे सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर खींच सकते हैं। लेकिन इस मार्च को करुणामयी मेट्रो स्टेशन के पास ही रोक दिया गया।
करुणामयी मेट्रो स्टेशन पर पुलिस की कार्रवाई
जब SLST-2 के अभ्यर्थी करुणामयी मेट्रो स्टेशन के पास जमा होने लगे तो बिधाननगर पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। पुलिस का कहना था कि बिना अनुमति के इस तरह का मार्च करना कानून व्यवस्था के लिए खतरा हो सकता है।
हालांकि आंदोलनकारियों का कहना है कि वे पूरी तरह से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को रख रहे थे। उन्होंने किसी भी तरह की हिंसा या उपद्रव नहीं किया था। फिर भी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई।
मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर केक काटने की योजना
जनवरी माह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जन्मदिन आता है। इसी को देखते हुए SLST-2 के वंचित अभ्यर्थियों ने एक अनोखी योजना बनाई थी। उनका कहना है कि वे केक लेकर आए थे और शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री का जन्मदिन मनाना चाहते थे।
इन अभ्यर्थियों का मानना था कि इस तरह वे अपनी नाराजगी को सकारात्मक तरीके से व्यक्त कर सकते हैं। साथ ही मुख्यमंत्री का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर खींच सकते हैं। लेकिन पुलिस ने इसे भी आंदोलन का हिस्सा मानते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस की सख्ती पर सवाल
बिधाननगर पुलिस की इस कार्रवाई पर कई सवाल उठ रहे हैं। आंदोलनकारी अभ्यर्थियों का कहना है कि उनका विरोध पूरी तरह से लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण था। उन्होंने किसी भी तरह की तोड़फोड़ या हिंसा नहीं की थी।
ऐसे में उन्हें गिरफ्तार करना उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने भी इस मामले में सरकार की आलोचना की है।
शिक्षक भर्ती विवाद का लंबा इतिहास
पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती को लेकर पिछले कुछ सालों से विवाद चल रहा है। कई अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया है कि भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। कुछ मामलों में तो अदालत को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है।
SLST-2 के मामले में भी कई अभ्यर्थी महसूस करते हैं कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है। उन्होंने सभी नियमों का पालन किया, परीक्षा पास की लेकिन फिर भी उन्हें नौकरी नहीं मिली। यह स्थिति उनके लिए बेहद निराशाजनक है।
युवाओं की बेरोजगारी की समस्या
यह मामला सिर्फ SLST-2 तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे राज्य में युवाओं की बेरोजगारी की बड़ी समस्या को दर्शाता है। पढ़े-लिखे युवा परीक्षा पास करने के बाद भी नौकरी के लिए सालों इंतजार कर रहे हैं।
यह स्थिति न केवल युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बनाती है बल्कि समाज के लिए भी चिंता का विषय है। शिक्षित बेरोजगार युवाओं की बढ़ती संख्या किसी भी राज्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
सरकार की जिम्मेदारी
राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह योग्य अभ्यर्थियों को समय पर नौकरी दे। अगर भर्ती प्रक्रिया में कोई समस्या है तो उसे जल्द से जल्द सुलझाया जाए। साथ ही जो अभ्यर्थी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख रहे हैं उनकी बात सुनी जाए।
पुलिस का उपयोग करके अभ्यर्थियों को दबाना समस्या का समाधान नहीं है। इससे युवाओं में सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है और स्थिति और खराब होती है।
आगे की राह
SLST-2 के वंचित अभ्यर्थियों का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। उनका कहना है कि वे तब तक लड़ाई जारी रखेंगे जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता। उनकी मांग है कि सरकार उनके साथ बातचीत करे और उनकी समस्याओं का समाधान निकाले।
इस मामले में न्यायालय की भी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर सरकार बातचीत के लिए तैयार नहीं होती तो अभ्यर्थी कानूनी रास्ता भी अपना सकते हैं।
यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि युवाओं की समस्याओं को गंभीरता से लेना जरूरी है। शिक्षित युवा किसी भी देश या राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति होते हैं। उनकी प्रतिभा का सही उपयोग करना और उन्हें उचित अवसर देना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।