Greenland Controversy: ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने एक विवादित बयान देते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का प्राकृतिक या स्वाभाविक हिस्सा नहीं है। यह बयान उस समय सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ग्रीनलैंड पर नियंत्रण या इसे खरीदने की बात कर रहे हैं। इस पूरे विवाद ने अमेरिका, डेनमार्क और यूरोपीय संघ के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।
लावरोव का विवादास्पद बयान
मंगलवार को मॉस्को में पत्रकारों से बात करते हुए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सिद्धांत रूप में ग्रीनलैंड डेनमार्क का प्राकृतिक हिस्सा नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि यह द्वीप न तो नॉर्वे का स्वाभाविक हिस्सा था और न ही डेनमार्क का। लावरोव ने इसे एक औपनिवेशिक विजय बताया। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि वहां रहने वाले लोग अब इस व्यवस्था के आदी हो चुके हैं और सहज महसूस करते हैं।
लावरोव के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का यह बयान अमेरिका और यूरोप के बीच चल रहे विवाद में घी डालने का काम करेगा। इससे पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में और खटास आ सकती है।
रूस की स्पष्ट स्थिति
रूसी विदेश मंत्री ने यह भी साफ किया कि रूस को ग्रीनलैंड के मामलों में हस्तक्षेप करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन को अच्छी तरह पता है कि मॉस्को की इस द्वीप पर कब्जा करने की कोई योजना नहीं है। यह बयान उस समय आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आरोप लगाया था कि रूस भी ग्रीनलैंड पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहा है।
लावरोव ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि रूस का ग्रीनलैंड में कोई हित नहीं है। उन्होंने साफ कर दिया कि मॉस्को इस विवाद में शामिल नहीं होना चाहता है। लेकिन उनके बयान से यह भी स्पष्ट हो गया कि रूस डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर ऐतिहासिक दावे को पूरी तरह वैध नहीं मानता है।
ट्रंप की ग्रीनलैंड योजना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने की बात कही है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताया है। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की रणनीतिक जरूरतों के लिए बेहद अहम है। यह द्वीप आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है और यहां खनिज संपदा भी बहुत है।
ट्रंप ने डेनमार्क और यूरोपीय संघ को चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि अगर यूरोपीय देश अमेरिका के इस प्रस्ताव का विरोध करेंगे तो उन पर टैरिफ लगाया जाएगा। इस धमकी ने अमेरिका और यूरोप के बीच रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है।
डेनमार्क और यूरोप की प्रतिक्रिया
डेनमार्क ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है। डेनिश सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और वहां की स्थानीय सरकार ने भी अमेरिका के प्रस्ताव को नामंजूर किया है।
यूरोपीय संघ के देशों ने भी डेनमार्क का समर्थन किया है। यूरोपीय नेताओं का कहना है कि ट्रंप द्वारा टैरिफ की धमकी पिछले साल हुए व्यापार समझौतों का उल्लंघन होगी। इस मुद्दे पर चर्चा के लिए यूरोपीय संघ के नेता ब्रुसेल्स में एक आपातकालीन शिखर सम्मेलन करने वाले हैं। इस बैठक में संभावित जवाबी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
ग्रीनलैंड का इतिहास
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है जो आर्कटिक और अटलांटिक महासागरों के बीच स्थित है। इस द्वीप पर सदियों से स्थानीय इनुइट लोग रहते आए हैं। नॉर्वे और डेनमार्क ने अलग-अलग समय पर इस द्वीप पर अपना दावा किया। अंततः यह डेनमार्क का हिस्सा बना।
हालांकि 1979 में ग्रीनलैंड को स्वायत्तता मिली और वहां की अपनी सरकार बनी। फिर भी रक्षा और विदेश नीति के मामलों में यह डेनमार्क पर निर्भर है। लावरोव ने इसी इतिहास का जिक्र करते हुए इसे औपनिवेशिक विजय बताया है।
रणनीतिक महत्व
ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है। यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है जहां रूस, अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों की दिलचस्पी है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक में बर्फ पिघल रही है और नए जहाजी रास्ते खुल रहे हैं। इसके अलावा यहां तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार भी हैं।
अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा संचालित करता है। ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका का इस द्वीप पर पूर्ण नियंत्रण हो ताकि रूस और चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
भविष्य की संभावनाएं
Greenland Controversy: इस विवाद का भविष्य अभी अनिश्चित है। अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। रूस के बयान ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद जल्द खत्म होने वाला नहीं है।
डेनमार्क और यूरोपीय संघ ने साफ कर दिया है कि वे अमेरिका के दबाव में नहीं आएंगे। अगर ट्रंप ने टैरिफ लगाया तो यूरोप भी जवाबी कार्रवाई कर सकता है। इससे दोनों पक्षों के बीच व्यापार युद्ध शुरू हो सकता है।
वहीं ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार ने स्वतंत्रता की मांग को भी तेज कर दिया है। कुछ स्थानीय नेताओं का कहना है कि अगर ग्रीनलैंड को पूर्ण स्वतंत्रता मिल जाए तो वह खुद अपने भविष्य का फैसला कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून की भूमिका
अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि किसी देश को जबरन किसी क्षेत्र पर कब्जा करने या खरीदने की इजाजत नहीं है। ग्रीनलैंड के लोगों की इच्छा सबसे अहम है। अगर वहां के लोग डेनमार्क के साथ रहना चाहते हैं तो कोई भी देश इसे बदल नहीं सकता।
लेकिन ट्रंप का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अंतरराष्ट्रीय कानून अलग तरह से लागू होता है। यह विवाद आने वाले दिनों में और भी गहरा हो सकता है।