पुणे-मुंबई राष्ट्रीय महामार्ग पर रोजाना हजारों वाहन आते-जाते हैं। इस व्यस्त सड़क पर कभी-कभी दुर्घटनाएं भी होती हैं। ऐसे में कुछ कामगार ऐसे हैं जो दिन-रात हाईवे पर तैनात रहते हैं और दुर्घटना होने पर तुरंत घायलों की मदद करते हैं। इन कामगारों को लोग ‘देवदूत’ कहते हैं क्योंकि इन्होंने अनगिनत लोगों की जान बचाई है। लेकिन जो लोग दूसरों की जान बचाते हैं, उनके अपने हक और अधिकारों की किसी को परवाह नहीं है। इसी अन्याय के खिलाफ 26 जनवरी 2026 को कुसगांव में भारतीय मजदूर संघ ने एक बड़ा आंदोलन किया।
यह आंदोलन आयरन पंप कंपनी के प्रशासन के खिलाफ था, जो इन मेहनतकश कामगारों की उचित मांगों को लगातार नजरअंदाज कर रहा था। आखिरकार कामगारों को आवाज उठानी पड़ी और उन्हें भारतीय मजदूर संघ का साथ मिला।
कौन हैं ये ‘देवदूत’ कामगार?
पुणे-मुंबई हाईवे पर काम करने वाले ये कामगार सिर्फ सड़क बनाने या मरम्मत का काम नहीं करते। इनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है हाईवे पर होने वाली दुर्घटनाओं में तुरंत पहुंचना और घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाना। कई बार इन्होंने आग लगी गाड़ियों से लोगों को निकाला है, खून से लथपथ लोगों को संभाला है और समय पर अस्पताल पहुंचाकर उनकी जान बचाई है।
यह काम बेहद खतरनाक है। तेज रफ्तार वाहनों के बीच काम करना, किसी भी समय दुर्घटना की आशंका, रात-दिन की ड्यूटी, बारिश-धूप में काम करना – यह सब आसान नहीं है। फिर भी ये कामगार बिना किसी शिकायत के अपना काम करते रहे। लेकिन अब उनका धैर्य टूट चुका है।

कामगारों की क्या हैं मांगें?
भारतीय मजदूर संघ ने कामगारों की ओर से कई उचित मांगें रखीं। सबसे पहली मांग थी उचित वेतन की। इतना जोखिम भरा काम करने के बावजूद इन कामगारों को बहुत कम पैसे मिलते हैं। कई बार ओवरटाइम का पैसा भी नहीं दिया जाता।
दूसरी बड़ी मांग थी बीमा और सामाजिक सुरक्षा की। जो लोग रोज अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों को बचाते हैं, उनके पास खुद का कोई बीमा नहीं है। अगर इन्हें काम के दौरान कुछ हो जाए तो इनके परिवार का क्या होगा? इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
तीसरी मांग थी सुरक्षा उपकरणों की। हाईवे पर काम करते समय सुरक्षा जैकेट, हेलमेट, दस्ताने और अन्य जरूरी सामान होना चाहिए। लेकिन कंपनी इन चीजों की भी व्यवस्था ठीक से नहीं करती थी।
इसके अलावा निश्चित काम के घंटे, कानूनी अधिकार और बेहतर काम करने की स्थिति की मांग भी की गई।
आंदोलन का स्वरूप
26 जनवरी को जब पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब कुसगांव में मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई। यह तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि हमारा संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है। लेकिन व्यवहार में ये कामगार अपने मूल अधिकारों से भी वंचित थे।
भारतीय मजदूर संघ के नेताओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। संगठन सचिव श्री बालासाहेब भुजबळ, महाराष्ट्र के उपाध्यक्ष श्री सचिन मेंगाळे और श्री सागर पवार ने कामगारों के साथ खड़े होकर उनकी आवाज को मजबूती दी।
आंदोलन शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ था। नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि अगर जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इस आंदोलन को पूरे राज्य में फैलाया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि मजदूर अब और इंतजार नहीं करेंगे।

त्रिपक्षीय बैठक और समझौता
आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने हरकत में आना शुरू किया। कामगारों, कंपनी प्रशासन और श्रम विभाग के बीच त्रिपक्षीय बैठक बुलाई गई। इस बैठक में लंबी चर्चा हुई और अंततः सकारात्मक नतीजे सामने आए।
कंपनी प्रशासन ने लिखित रूप में कुछ महत्वपूर्ण बातों पर सहमति जताई। सबसे पहले, कामगारों के वेतन में वृद्धि करने का फैसला लिया गया। हालांकि सटीक राशि का खुलासा नहीं किया गया, लेकिन यह सुनिश्चित किया गया कि वेतन उनके काम और जोखिम के अनुरूप होगा।
दूसरा बड़ा निर्णय था 20 लाख रुपये के दुर्घटना बीमा का। अब अगर किसी कामगार के साथ काम के दौरान कोई दुर्घटना होती है तो उसे या उसके परिवार को 20 लाख रुपये का बीमा मिलेगा। यह एक बहुत बड़ी राहत है।
तीसरा महत्वपूर्ण फैसला था परिवार सहित 3 लाख रुपये का मेडिक्लेम। इससे कामगार और उनके परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में आर्थिक मदद मिलेगी।
इसके अलावा, लंबे समय से लंबित ओवरटाइम का भुगतान करने पर भी सहमति बनी। कई कामगारों का महीनों का ओवरटाइम बकाया था, जो अब चुकाया जाएगा।
आंदोलन स्थगित, लेकिन अभी खत्म नहीं
इन सकारात्मक फैसलों के बाद भारतीय मजदूर संघ ने 31 जनवरी 2026 तक आंदोलन स्थगित करने का निर्णय लिया। लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
संघ के नेताओं ने साफ कर दिया है कि अगर 31 जनवरी तक कंपनी ने अपने वादे पूरे नहीं किए या लिखित समझौते को लागू नहीं किया, तो 2 फरवरी से अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू किया जाएगा। यानी कामगार तब तक आंदोलन नहीं रोकेंगे जब तक उनकी सभी मांगें पूरी नहीं हो जातीं।
यह रणनीति समझदारी भरी है। एक तरफ कंपनी को समय दिया गया है कि वह अपनी बात पर अमल करे, दूसरी तरफ कामगारों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने अधिकारों से समझौता नहीं करेंगे।
यह आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण है?
यह आंदोलन सिर्फ कुछ कामगारों के वेतन या बीमा का मामला नहीं है। यह उन हजारों मजदूरों की आवाज है जो देश के बुनियादी ढांचे को खड़ा करते हैं, लेकिन खुद बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहते हैं।
हमारे देश में मजदूरों के साथ अक्सर अन्याय होता है। उनसे कठिन काम करवाया जाता है, लेकिन उचित वेतन नहीं दिया जाता। उनकी सुरक्षा की कोई चिंता नहीं होती। उनके परिवारों का भविष्य अंधकार में रहता है।
ऐसे में जब कामगार संगठित होकर अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। भारतीय मजदूर संघ जैसे संगठन इन कामगारों को एक मंच देते हैं और उनकी आवाज को ताकत देते हैं।
कुसगांव का यह आंदोलन दूसरे मजदूरों के लिए भी प्रेरणा बनेगा। यह दिखाता है कि अगर संगठित होकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी जाए, तो न्याय मिल सकता है।
इस आंदोलन की सफलता या असफलता 31 जनवरी के बाद तय होगी। अब देखना यह है कि कंपनी अपने वादों पर कितना खरी उतरती है। अगर वादे पूरे हुए तो यह मजदूर आंदोलन का एक सफल उदाहरण बनेगा। और अगर वादे झूठे निकले, तो 2 फरवरी से शुरू होने वाला आंदोलन और भी बड़ा रूप ले सकता है।