ईरान में सरकार के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों पर खूनी दमन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के साथ हो रही हिंसा को लेकर ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ किया है कि अगर ईरान ने अपने नागरिकों पर अत्याचार जारी रखा तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। हालांकि ट्रंप ने बातचीत का विकल्प भी खुला रखा है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी युद्धपोतों की भारी तादाद एक अलग ही संदेश दे रही है।
खाड़ी के पानी में तैनात अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा दुनिया को बता रहा है कि अमेरिका किसी भी समय कार्रवाई के लिए तैयार है। अगर ट्रंप सैन्य हमले का फैसला करते हैं तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह हमला किस तरह का होगा। सैन्य विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के सामने तीन मुख्य रणनीतियां हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है।
पहला विकल्प: ऊर्जा की नाकाबंदी
ट्रंप प्रशासन अब तक जिस तरह की सावधानी बरत रहा है, उससे कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वेनेजुएला जैसी रणनीति हो सकती है। इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर दबाव बनाकर अपने प्रभाव को बढ़ाया था। ठीक उसी तरह की योजना ईरान के खिलाफ भी तैयार की जा सकती है।
जेनेवा के एक प्रमुख संस्थान के शोधकर्ता फरजान साबित के अनुसार, अमेरिका ईरान की ऊर्जा व्यवस्था को अपना निशाना बना सकता है। ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है और उसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात पर निर्भर है। अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और उसके साथ तीन विध्वंसक जहाज ईरानी तेल ले जाने वाले गुप्त जहाजों को रोक सकते हैं।
इन जहाजों को डार्क फ्लीट कहा जाता है क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय नियमों से बचते हुए तेल की तस्करी करते हैं। अगर अमेरिका इन जहाजों को रोक देता है तो ईरान का तेल निर्यात पूरी तरह बंद हो सकता है। यह दबाव हफ्तों और महीनों तक जारी रह सकता है जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था अंदर से कमजोर हो जाएगी। यह रणनीति बिना सीधे युद्ध किए दुश्मन को घुटनों पर लाने की कोशिश है।
दूसरा विकल्पः सर्जिकल स्ट्राइक
अगर अमेरिका सीधे हमले का रास्ता चुनता है तो उसका मुख्य निशाना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी होगा। यह ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य और राजनीतिक संस्था है। इसके अलावा बसीज मिलिशिया भी अमेरिका के रडार पर है। इन दोनों समूहों पर आरोप है कि इन्होंने ईरान में प्रदर्शनकारियों पर बर्बर हमले किए हैं जिसमें हजारों लोग मारे गए हैं।
स्वतंत्र सैन्य विशेषज्ञ ईवा जे. कुलौरियोटिस का कहना है कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से अमेरिका के पास इन सैन्य ठिकानों की पूरी जानकारी है। अमेरिका के पास टोमाहॉक मिसाइलें हैं जो बेहद सटीक होती हैं और हजारों किलोमीटर दूर से लक्ष्य को भेद सकती हैं। इन मिसाइलों और लड़ाकू विमानों की मदद से अमेरिका उन कमांड सेंटरों को नष्ट कर सकता है जो प्रदर्शनों को कुचलने में शामिल हैं।
यह हमला सीमित होगा लेकिन इसका असर बहुत गहरा होगा। इसे सर्जिकल स्ट्राइक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह किसी डॉक्टर की सर्जरी की तरह सटीक और सीमित होता है। इसमें केवल उन्हीं ठिकानों को निशाना बनाया जाता है जो सीधे तौर पर हिंसा में शामिल हैं। इस तरह की कार्रवाई से ईरान को एक कठोर लेकिन नपा-तुला संदेश जाएगा कि अमेरिका मानवाधिकारों के उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करेगा।
तीसरा विकल्पः पूर्ण युद्ध और सत्ता परिवर्तन
सबसे खतरनाक और चरम विकल्प यह है कि अमेरिका ईरान की पूरी सरकारी व्यवस्था को ही उखाड़ फेंकने की कोशिश करे। 1979 की क्रांति के बाद से ईरान में धार्मिक नेताओं का शासन है। अयातुल्ला अली खामेनेई इस व्यवस्था के सर्वोच्च नेता हैं। दशकों से अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी चल रही है और अमेरिका कई बार ईरान पर प्रतिबंध लगा चुका है, लेकिन यह व्यवस्था अब तक टिकी हुई है।
अटलांटिक मिडिल ईस्ट फोरम के सह-संस्थापक डेविड खल्फा के मुताबिक, अमेरिका का असली उद्देश्य शासन को अस्थिर करना हो सकता है। इसका मतलब है कि अमेरिका खामेनेई, उनके करीबी सलाहकारों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को सीधे निशाना बना सकता है। इससे ईरान की कमान की पूरी व्यवस्था टूट जाएगी और देश अराजकता में डूब सकता है।
इस तरह के ऑपरेशन के लिए कतर और संयुक्त अरब अमीरात में तैनात दर्जनों अमेरिकी लड़ाकू विमान इस्तेमाल किए जा सकते हैं। यह एक बड़ा और जोखिम भरा कदम होगा क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में अराजकता फैल सकती है। ईरान के पास भी मिसाइलें और सैन्य ताकत है, और वह अपने सहयोगियों के जरिए जवाबी हमले कर सकता है। इस तरह की कार्रवाई से पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध छिड़ सकता है जिसमें कई देश शामिल हो सकते हैं।
दुनिया खतरनाक मोड़ पर
अभी की स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि अमेरिका सीमित कार्रवाई के पक्ष में है। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान की सरकार इतनी कमजोर हो जाए कि वह जवाबी हमला न कर सके, लेकिन साथ ही अमेरिका पूरे क्षेत्र में युद्ध के जोखिम से भी बचना चाहता है। यह एक नाजुक संतुलन है जिसे बनाए रखना बेहद मुश्किल है।
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दशकों से इस तरह के हमलों की तैयारी कर रखी है। उनके पास भूमिगत बंकर हैं, मिसाइलें छिपाई गई हैं और सैनिकों को गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी गई है। इसलिए अमेरिका के लिए यह काम आसान नहीं होगा। हर कदम पर जोखिम है और हर विकल्प के अपने परिणाम हैं।
अब पूरी दुनिया की नजरें ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। क्या वे कूटनीति और बातचीत का रास्ता चुनेंगे या फिर खाड़ी के पानी में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों की मिसाइलें गरजेंगी? यह सवाल सिर्फ अमेरिका और ईरान का नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की शांति और स्थिरता का है।
आर्मडा का मतलब क्या है
आर्मडा शब्द स्पेनिश भाषा से आया है और इसका मतलब होता है युद्धपोतों का एक विशाल बेड़ा। यह किसी देश की नौसैनिक ताकत का प्रदर्शन होता है। इतिहास में सबसे मशहूर आर्मडा 16वीं सदी में स्पेन का था, जिसे इंग्लैंड पर हमला करने के लिए भेजा गया था। आज जब कोई देश अपने कई युद्धपोत, विमानवाहक पोत और विध्वंसक जहाजों को एक साथ किसी मिशन पर भेजता है तो उसे आर्मडा कहा जाता है।
अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में जो नौसैनिक बेड़ा तैनात किया है, उसे भी आर्मडा कहा जा रहा है। इसमें यूएसएस अब्राहम लिंकन जैसे विशाल विमानवाहक पोत शामिल हैं जिन पर दर्जनों लड़ाकू विमान तैनात हो सकते हैं। इसके साथ विध्वंसक जहाज भी हैं जो मिसाइलें दाग सकते हैं। यह आर्मडा समुद्र में अमेरिका की ताकत का एक बड़ा प्रदर्शन है और यह ईरान को एक स्पष्ट संदेश देता है कि अमेरिका कार्रवाई के लिए तैयार है।
क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक प्रभाव
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ दो देशों का मामला नहीं है। इसका असर पूरे मध्य पूर्व और दुनिया पर पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल प्राप्त करता है। अगर यहां युद्ध छिड़ता है तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।
इसके अलावा, ईरान के क्षेत्र में कई सहयोगी हैं जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूथी विद्रोही और इराक में कुछ मिलिशिया समूह। अगर ईरान पर हमला होता है तो ये सभी समूह भी सक्रिय हो सकते हैं और इजरायल, सऊदी अरब और अन्य अमेरिकी सहयोगियों पर हमले कर सकते हैं। इससे पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में जल सकता है।
भारत के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं और वहां से तेल आयात होता है। अगर स्थिति बिगड़ती है तो भारत को अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालना पड़ सकता है और ऊर्जा सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
राजनीतिक और मानवीय पहलू
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान के आम नागरिक अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। वे अपनी सरकार से जवाबदेही मांग रहे हैं और बेहतर जीवन की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन उन पर हो रहा दमन बेहद क्रूर है। हजारों लोग मारे जा चुके हैं और कई गिरफ्तार किए गए हैं।
अमेरिका का कहना है कि वह इन प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सैन्य हमले से वास्तव में इन लोगों की मदद होगी या स्थिति और खराब हो जाएगी? इतिहास बताता है कि सैन्य हस्तक्षेप अक्सर लंबे समय तक अराजकता और पीड़ा लाता है। इराक और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं।
इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि बातचीत और राजनयिक दबाव बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर ईरान पर दबाव बनाना चाहिए कि वह अपने नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करे। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ट्रंप के पास तीन मुख्य विकल्प हैं – ऊर्जा नाकाबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक या पूर्ण युद्ध। हर विकल्प के अपने जोखिम और परिणाम हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप कौन सा रास्ता चुनेंगे, लेकिन खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों की मौजूदगी साफ करती है कि स्थिति गंभीर है।
पूरी दुनिया को उम्मीद है कि यह संकट बातचीत से सुलझ जाए और युद्ध टल सके। लेकिन अगले कुछ दिन और हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण होंगे। दुनिया की निगाहें अब ट्रंप के फैसले पर टिकी हैं।