लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सरकार के बीच तनातनी एक बार फिर से सुर्खियों में आ गई है। राहुल गांधी ने मंगलवार को स्पीकर ओम बिरला को एक पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए हैं कि उन्हें सदन में बोलने से जानबूझकर रोका जा रहा है। उनका कहना है कि यह लोकतांत्रिक परंपरा और संसदीय मर्यादा का खुला उल्लंघन है। यह मामला तब सामने आया जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने चीन से जुड़े मुद्दे पर बोलना चाहा, लेकिन उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई।
संसदीय इतिहास में पहली बार नेता प्रतिपक्ष को रोका गया
राहुल गांधी ने अपने पत्र में साफ शब्दों में कहा है कि संसदीय इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी नेता प्रतिपक्ष को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका गया है। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर काला धब्बा करार दिया है। राहुल का आरोप है कि यह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है और स्पीकर की भूमिका निष्पक्ष नहीं रह गई है। उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष का बोलना सिर्फ एक अधिकार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है।
लोकतांत्रिक अधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है
पत्र में राहुल गांधी ने यह भी लिखा कि हर संसद सदस्य को बोलने का अधिकार संविधान और लोकतंत्र की बुनियाद है। लेकिन इन बुनियादी अधिकारों को नजरअंदाज करके एक खतरनाक स्थिति पैदा की जा रही है। उनका कहना है कि जब नेता प्रतिपक्ष जैसे अहम पद पर बैठे व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे पर बोलने से रोका जाता है, तो यह पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
चीन के मुद्दे पर बोलने की कोशिश
सदन में लगातार दो दिन राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख एम एम नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण पर आधारित एक लेख का हवाला देकर चीन के मुद्दे को उठाने की कोशिश की। सोमवार को भी उन्होंने इस विषय पर बोलना चाहा था, लेकिन उन्हें मौका नहीं दिया गया। मंगलवार को जब उन्होंने फिर से यही मुद्दा उठाया, तो स्पीकर ने उन्हें पहले उस लेख को सत्यापित करने के लिए कहा। राहुल ने लेख को सत्यापित भी किया और सदन के पटल पर रखा, लेकिन फिर भी उन्हें बोलने की अनुमति नहीं मिली।
संसदीय परंपरा का हवाला
राहुल गांधी ने अपने पत्र में संसदीय परंपरा और पुराने अध्यक्षों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब कोई सदस्य किसी दस्तावेज का उल्लेख करना चाहता है, तो उसे पहले उसे सत्यापित करना होता है। एक बार सत्यापन हो जाने के बाद स्पीकर को सदस्य को बोलने की अनुमति देनी चाहिए। उसके बाद उस पर जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी होती है, न कि स्पीकर को हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज जो हुआ वह इस परंपरा का साफ उल्लंघन है।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा जरूरी
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति के अभिभाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। ऐसे में इस मुद्दे पर संसद में चर्चा होना बेहद जरूरी है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष को जानबूझकर इस मुद्दे पर बोलने से रोका जा रहा है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने साफ किया कि यह सिर्फ उनके बोलने का सवाल नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर संसद में खुली बहस होनी चाहिए।
सदन में गतिरोध जारी
लोकसभा में पिछले कुछ दिनों से गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, जबकि सरकार अपनी बात रखने में लगी हुई है। राहुल गांधी के इस पत्र ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक तरीके से काम नहीं कर रही और संसदीय परंपराओं को कमजोर किया जा रहा है।
संसदीय मर्यादा पर सवाल
राहुल गांधी के इस पत्र ने संसदीय मर्यादा और स्पीकर की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का कहना है कि स्पीकर को निष्पक्ष रहकर सभी सदस्यों को समान अवसर देना चाहिए। लेकिन जब नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोका जाता है, तो यह लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। राहुल ने अपने पत्र में इसी बात पर जोर दिया है कि उनके साथ जो हुआ वह संसदीय इतिहास में एक दुखद घटना है।
विपक्ष का एकजुट होना जरूरी
इस मुद्दे पर विपक्ष के अन्य दलों ने भी राहुल गांधी का समर्थन किया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ कांग्रेस या राहुल गांधी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे विपक्ष और लोकतंत्र का मुद्दा है। अगर नेता प्रतिपक्ष को ही बोलने से रोका जाएगा, तो फिर आम सदस्यों की क्या स्थिति होगी? विपक्ष ने मांग की है कि स्पीकर को इस मामले में स्पष्टीकरण देना चाहिए।
सरकार का पक्ष
हालांकि सरकार की तरफ से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी बिना सत्यापित जानकारी के सदन में गलत बयान दे रहे थे, इसलिए उन्हें रोका गया। उनका कहना है कि संसद में किसी भी दस्तावेज का हवाला देने से पहले उसे सत्यापित करना जरूरी है और राहुल गांधी इस नियम का पालन नहीं कर रहे थे।
आगे क्या होगा
यह मामला अब संसदीय बहस का मुद्दा बन गया है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। राहुल गांधी के इस पत्र के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि स्पीकर ओम बिरला क्या जवाब देते हैं और क्या वे इस मामले में कोई स्पष्टीकरण देते हैं। विपक्ष का कहना है कि अगर इस मुद्दे का संतोषजनक समाधान नहीं निकला, तो वे इसे और आगे ले जाएंगे।
यह पूरा मामला सिर्फ संसदीय प्रक्रिया का नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की मजबूती और संसदीय परंपराओं की रक्षा का सवाल है। राहुल गांधी ने अपने पत्र में जो मुद्दे उठाए हैं, वे गंभीर हैं और इन पर संसद में विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।