हर 3 में से 1 अधिक वजन का महिला शिकार
Obesity Epidemic In Maharashtra: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के हालिया आंकड़ों ने देश और विशेषकर महाराष्ट्र में जन-स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र में लगभग हर तीन में से एक महिला (31.1%) अब अधिक वजन या मोटापे की शिकार है। यदि पिछले सर्वेक्षण से तुलना करें, तो तब यह आंकड़ा 23.5% था। यानी कुछ ही वर्षों में महिलाओं में मोटापे की दर में 32% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह स्थिति केवल एक राज्य की नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली और खान-पान के संकट का एक बड़ा राष्ट्रीय संकेत है।
शहर में हर 10 में से 4 महिलाएं प्रभावित
रिपोर्ट के सबसे चिंताजनक आंकड़े शहरी क्षेत्रों से सामने आए हैं। शहरी महाराष्ट्र में 40.1% महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स 25 या उससे अधिक पाया गया है। भारत में बॉडी मास इंडेक्स के मानकों के अनुसार, 25 या उससे अधिक के स्कोर को ‘ओवरवेट’ या ‘मोटापे’ की श्रेणी में रखा जाता है।
इसका सीधा और डरावना मतलब यह है कि महाराष्ट्र के शहरों में रहने वाली हर 10 में से 4 महिलाएं मोटापे की शिकार हैं। चिकित्सा विज्ञान और हालिया शोध बताते हैं कि मोटापा केवल रूप-रंग या वजन से जुड़ी समस्या नहीं है। आधुनिक समय में यह कैंसर, टाइप-2 डायबिटीज, स्ट्रोक, बांझपन और हृदय रोगों सहित 200 से अधिक बीमारियों का मूल कारण बनकर उभरा है।
दक्षिण बनाम पश्चिम भारत
यद्यपि महाराष्ट्र में मोटापे की दर राष्ट्रीय औसत (पूरे भारत में 27% महिलाएं ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त हैं) से अधिक है, लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र की स्थिति अभी भी थोड़ी बेहतर है। आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण भारत इस स्वास्थ्य संकट के बेहद गंभीर दौर से गुजर रहा है:
आंध्र प्रदेश: यहां शहरी महिलाओं में मोटापे की दर सबसे अधिक 57.3% है।
कर्नाटक: शहरी महिलाओं में यह आंकड़ा 51.7% है।
तमिलनाडु: 49.1% शहरी महिलाएं प्रभावित हैं।
तेलंगाना: 48.7% (कुल राज्य में 36.3% से लेकर शहरी इलाकों में 48.7% तक)।
केरल: यहां शहरी क्षेत्रों में 48.3% महिलाएं मोटापे की शिकार हैं।
दक्षिण भारत में मोटापे के कारण
बांद्रा के लीलावती अस्पताल के वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. शशांक जोशी के अनुसार, “दक्षिण भारत में मोटापे की इतनी ऊंची दर का मुख्य कारण वहां का खान-पान है। वहां के आहार में कार्बोहाइड्रेट और वसा की मात्रा बहुत अधिक होती है, जबकि प्रोटीन की भारी कमी देखी जाती है।”
आखिर क्यों बढ़ रहा है वजन?
डॉ. जोशी के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में पूरे भारत में औसत BMI बढ़ने के पीछे जैविक, आहार संबंधी और जीवनशैली के कारक सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं:
जैविक बनावट: पुरुषों की तुलना में महिलाओं के शरीर की प्राकृतिक बनावट ऐसी होती है कि उनमें फैट (वसा) का प्रतिशत अधिक होता है।
गर्भावस्था: गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद होने वाला वजन बढ़ना भी महिलाओं में मोटापे के बोझ को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाता है।
कम शारीरिक सक्रियता: हाल के दिनों में, विशेष रूप से शहरी केंद्रों में, शारीरिक सक्रियता का स्तर बेहद गिर गया है, जिसने वजन बढ़ने की समस्या को और बदतर बना दिया है।
महाराष्ट्र और केरल की अलग कहानी
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण भारत के राज्य ‘मोटापा महामारी’ के एक ऐसे उन्नत और खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ अत्यधिक वजन की समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी आम हो चुकी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल है, जहाँ की 45.1% ग्रामीण महिलाएं भी ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में आती हैं।
इसके विपरीत, महाराष्ट्र में अभी भी एक स्पष्ट ‘शहरी-ग्रामीण विभाजन’ देखने को मिलता है:
शहरी महाराष्ट्र: 40.1% महिलाएं प्रभावित हैं।
ग्रामीण महाराष्ट्र: यह आंकड़ा गिरकर 24.8% पर आ जाता है।
इससे साफ है कि महाराष्ट्र में मोटापे का बोझ फिलहाल बड़े शहरों और कस्बों तक ही अधिक केंद्रित है।
आधुनिकीकरण और गतिहीन जीवनशैली
बढ़ते मशीनीकरण और सुस्त जीवनशैली ने लोगों को शारीरिक रूप से निष्क्रिय बना दिया है। डॉ. जोशी बताते हैं कि चाहे पुरुष हों या महिलाएं, दोनों में ही मोटापे के बढ़ने की वजह यह है कि लोगों ने अब चलना या साइकिल चलाना लगभग बंद कर दिया है। छोटी-छोटी दूरियों के लिए भी लोग पूरी तरह से मोटर चालित वाहनों पर निर्भर हो चुके हैं, जिससे शहरों में शारीरिक कसरत का नामोनिशान मिटता जा रहा है।
केवल महिलाओं का नहीं, पुरुषों का भी है यही हाल
एनएफएचएस-6 के आंकड़ों ने एक और रूढ़िवादी धारणा को तोड़ा है- वह यह कि मोटापा केवल महिलाओं की समस्या है। महाराष्ट्र के संदर्भ में, अब यह पुरुषों के लिए भी उतना ही बड़ा संकट बन चुका है।
महाराष्ट्र में 32.8% पुरुष ओवरवेट या मोटापे के शिकार हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 31.1% है।
यह आंकड़े चौंकाने वाले इसलिए हैं क्योंकि अब पुरुषों में मोटापे की दर महिलाओं से भी थोड़ी आगे निकल चुकी है। डॉ. जोशी इसके पीछे का सच बताते हुए कहते हैं, “आर्थिक रूप से विकसित राज्यों में पुरुष तेजी से गतिहीन होते जा रहे हैं। महाराष्ट्र में पुरुषों और महिलाओं के बीच मोटापे की दरों का लगभग बराबर हो जाना इस बात का प्रमाण है कि कामकाजी और सामाजिक स्तर पर हमारी जीवनशैली कितनी निष्क्रिय हो चुकी है।”
समाधान की आवश्यकता
एनएफएचएस-6 के ये आंकड़े भारत के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) की तरह हैं। मोटापा केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि आने वाले समय में देश के स्वास्थ्य ढांचे पर पड़ने वाले भारी आर्थिक और चिकित्सा संबंधी बोझ का संकेत है।
ऐसे रोकें इस महामारी को
Obesity Epidemic In Maharashtra: यदि इस महामारी को रोकना है, तो समाज और सरकार दोनों स्तरों पर प्रयास करने होंगे:
आहार में सुधार: रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, जंक फूड और अत्यधिक वसायुक्त भोजन की जगह प्रोटीन, फाइबर और संतुलित पोषण को प्राथमिकता देनी होगी।
दैनिक कसरत: शहरी बुनियादी ढांचे को ऐसा बनाना होगा जहाँ वॉकवे और साइकिलिंग को बढ़ावा मिले।
जागरूकता: मोटापे को केवल एक ‘दिखावे की समस्या’ न मानकर, इसे एक गंभीर बीमारी के रूप में देखना होगा ताकि समय रहते इसका इलाज और प्रबंधन किया जा सके।