Mohan Bhagwat: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने कल सोमवार को एक अहम फैसले में उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत को दी जा रही जेड-प्लस सुरक्षा की लागत उनसे वसूलने की मांग की गई थी। अदालत ने न सिर्फ याचिका को खारिज किया, बल्कि याचिकाकर्ता की मंशा पर भी गंभीर सवाल उठाए, जिससे यह मामला चर्चा का विषय बन गया है।
अदालत ने क्या कहा ?
मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति अनिल किलोर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि यह याचिका उचित आधार पर नहीं टिकती। कोर्ट ने माना कि सुरक्षा प्रदान करना एक नीतिगत और प्रशासनिक फैसला होता है, जिसे तय करने का अधिकार सरकार के पास होता है। ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित होता है, जब तक कि कोई ठोस कानूनी आधार न हो।
नागपुर के ललन सिंह ने दायर की थी याचिका
यह याचिका नागपुर निवासी ललन सिंह द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि RSS एक पंजीकृत संगठन नहीं है, इसलिए उसके प्रमुख को सरकारी खर्च पर इतनी उच्च स्तरीय सुरक्षा देना करदाताओं के पैसों का दुरुपयोग है। उन्होंने यह भी दावा किया कि मोहन भागवत की सुरक्षा पर हर महीने करीब 40 से 45 लाख रुपये खर्च होते हैं, जो सरकारी खजाने पर बोझ है। इसी आधार पर उन्होंने मांग की थी कि यह पूरी राशि भागवत से वसूली जाए।
हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी व्यक्ति को सुरक्षा देना उसके पद, खतरे के आकलन और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट पर निर्भर करता है। यह कोई ऐसा विषय नहीं है, जिसमें केवल संगठन की कानूनी स्थिति को आधार बनाकर निर्णय लिया जा सके।
अदालत में उठा मुकेश अंबानी का मुद्दा
याचिकाकर्ता ने अपनी बात को मजबूत करने के लिए उद्योगपति मुकेश अंबानी से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला भी दिया था, जिसमें कहा गया था कि उन्हें सुरक्षा तो मिलेगी, लेकिन उसका खर्च उनके परिवार को उठाना होगा। लेकिन हाई कोर्ट ने इस मामले को अलग मानते हुए उस तर्क को लागू करने से इनकार कर दिया।
मोहन भागवत के पास Z+ श्रेणी की सुरक्षा
गौरतलब है कि मोहन भागवत की सुरक्षा जून 2015 में बढ़ाकर जेड-प्लस श्रेणी की गई थी और फिलहाल उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी CISF के पास है। इससे पहले उनकी सुरक्षा में महाराष्ट्र पुलिस के जवान तैनात थे।