Shankaracharya: माघ मेला, जो आध्यात्मिक साधना और धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है, इस बार अचानक एक विवाद के कारण सुर्खियों में आ गया। प्रयागराज के संगम में मौनी अमावस्या और माघ मेला के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 11वें दिन अचानक मेला छोड़ने का फैसला किया। यह पहला मौका है जब माघ मेला में आने के बावजूद किसी शंकराचार्य ने संगम में स्नान किए बिना ही विदा लिया।
शंकराचार्य का विरोध और विदाई
शंकराचार्य ने माघ मेले से अचानक विदा लेने का निर्णय मंगलवार देर रात अपने समर्थकों से चर्चा करने के बाद लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम उन्होंने अन्याय के विरोध और न्याय की प्रतीक्षा में उठाया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि प्रयाग की यह पवित्र धरती आध्यात्मिक शांति के लिए जानी जाती है, लेकिन इस बार भारी मन और विपदा के कारण उन्हें लौटना पड़ा। उनका मानना है कि जो कुछ भी यहां हुआ है, उसने उनकी आत्मा को झकझोर दिया और न्याय तथा मानवता के प्रति उनके विश्वास पर प्रश्न खड़ा किया।
संगम में स्नान का अधूरा संकल्प
शंकराचार्य ने कहा कि संगम में स्नान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि आत्मा की संतुष्टि का मार्ग भी है। हालांकि इस बार उन्होंने अपने मन में व्यथित होने के कारण यह संकल्प पूरा नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने पीछे सत्य की गूंज और अनुत्तरित प्रश्न छोड़कर जा रहे हैं, जो प्रयाग की हवा में रहेंगे और न्याय की प्रतीक्षा करेंगे।
पुलिस और प्रशासनिक विवाद
मौनी अमावस्या के दिन पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से हुए विवाद के कारण शंकराचार्य ने संगम में स्नान नहीं किया। इसके बाद भी वह अपने शिविर में नहीं गए और लगातार धरने पर डटे रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन की गलती नहीं है, बल्कि यह कार्य हुकुमरान के इशारे पर किया गया।
सत्य और मानवता के लिए आवाज
विदाई से पहले शंकराचार्य ने अपने समर्थकों और समाज को संदेश दिया कि वे सनातनियों और संतों के सम्मान में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि उनके मारे जाने की आशंका व्यक्त करना दुर्भावना नहीं, बल्कि इस धरती पर न्याय और मानवता की कमी को उजागर करना है।
हत्याकांड की आशंका और सवाल
शंकराचार्य ने यह भी आशंका जताई कि उनकी हत्या की साजिश भी हो सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि बीते महाकुम्भ में इतने लोग मारे गए, लेकिन किसी के खिलाफ जिम्मेदारी तय नहीं हुई। इसी तरह यदि उनके साथ कोई घटना होती है तो जिम्मेदार कौन होगा। उन्होंने कहा कि मीडिया में दो-चार दिन खबरें चलेंगी, लेकिन अंततः उन्हें ही दोषी ठहराया जाएगा।
समर्थकों के साथ संवाद और न्याय की प्रतीक्षा
मंगलवार को दसवें दिन भी शंकराचार्य ने विरोध जारी रखा और कहा कि वह मेला छोड़कर नहीं जाएंगे। उन्होंने समर्थकों को बताया कि इतने दिन बीत जाने के बावजूद अधिकारियों का ध्यान नहीं आया। उन्होंने यह भी कहा कि न्याय की प्रतीक्षा में ही उनका विरोध है और वे समाज और सनातन के अनुयायियों के साथ ही सत्य की आवाज उठाते रहेंगे।
शांति और धर्म की रक्षा का संदेश
शंकराचार्य ने अपने संदेश में यह स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी को डराना या धमकाना नहीं है। उनका मकसद केवल शांति, धर्म और न्याय की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि उनकी विदाई के बावजूद उनका संदेश और सत्य का संघर्ष जारी रहेगा।
माघ मेला में अनोखी घटना
शंकराचार्य की यह विदाई माघ मेले के इतिहास में अनोखी मानी जा रही है। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी शंकराचार्य ने माघ मेले में बिना संगम स्नान किए और बिना शिविर में आए ही अचानक मेला छोड़ दिया हो।