UGC: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में आज उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाली नियमावली 2026 को लेकर अहम सुनवाई हो रही है। इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले की वैधता और संवैधानिक पहलुओं की गहन जांच कर रही है।
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2026 में लागू की गई यह नियमावली सामान्य श्रेणी के छात्रों के साथ भेदभाव करती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समानता के नाम पर लाए गए ये नियम वास्तव में असमानता को बढ़ावा दे सकते हैं।
नियमावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि अदालत का उद्देश्य यह समझना है कि क्या ये नियम संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। पीठ ने कहा कि वह इस मामले को केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि कानूनी कसौटी पर परखेगी।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि समानता जैसे संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी तरह का असंतुलन समाज में गलत संदेश दे सकता है। इसलिए इस मामले की जांच बेहद सावधानी से की जा रही है।
अदालत की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा, “क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं? हमें जातिविहीन समाज की तरफ बढ़ना चाहिए। जिन्हें सुरक्षा चाहिए उनके लिए व्यवस्था हो।”
इस टिप्पणी ने सुनवाई को और गंभीर बना दिया। अदालत की इस बात से यह संकेत मिला कि वह केवल नियमों की भाषा ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक प्रभाव को भी ध्यान में रख रही है।
नियमों के उद्देश्य पर उठे सवाल
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू की गई इस नियमावली का उद्देश्य उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करना बताया गया है। UGC का दावा है कि यह नियम उन वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं, जिन्हें अब तक समान अवसर नहीं मिल पाए।
लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियमों का वर्तमान स्वरूप अपने उद्देश्य से भटकता हुआ नजर आता है। उनके अनुसार, यह नियम समानता को बढ़ाने के बजाय एक नई तरह की असमानता पैदा कर सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की प्रमुख दलीलें
अधिवक्ता मृत्युंजय तिवारी, विनीत जिंदल और राहुल दीवान द्वारा दायर याचिकाओं में कई आपत्तियां दर्ज की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ये नियम सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं।
याचिकाओं में कहा गया है कि नियम योग्यता और समान अवसर जैसे संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। उनका तर्क है कि किसी भी नीति का आधार योग्यता और निष्पक्षता होना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग को प्राथमिकता देना।
सामान्य श्रेणी के छात्रों की चिंता
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि इन नियमों से सामान्य श्रेणी के छात्रों के अवसर सीमित हो सकते हैं। उनका कहना है कि नियमावली का झुकाव एक वर्ग विशेष की ओर है, जिससे प्रतियोगिता का संतुलन बिगड़ सकता है।
इससे उन छात्रों में असंतोष बढ़ सकता है, जो लंबे समय से मेहनत और योग्यता के आधार पर अवसर पाने की उम्मीद करते रहे हैं।
संवैधानिक संतुलन पर बहस
यह मामला केवल एक नियमावली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समानता और न्याय के संवैधानिक संतुलन से जुड़ा हुआ है। अदालत के सामने यह सवाल है कि समानता को बढ़ावा देने और सभी वर्गों के साथ न्याय करने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह साफ होता है कि अदालत इस मुद्दे को समाज की दीर्घकालिक दिशा से जोड़कर देख रही है।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और निर्णय पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल उच्च शिक्षा की नीति को प्रभावित करेगा, बल्कि समानता और सामाजिक न्याय की बहस को भी नई दिशा दे सकता है।