
महाराष्ट्र विधानसभा के सत्र के दौरान कांग्रेस नेता विजय वाडेत्तीवार ने अंतिम सप्ताह प्रस्ताव रखकर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया। इस प्रस्ताव के माध्यम से उन्होंने सरकार का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचा, जो सीधे तौर पर आम जनता से जुड़े हुए हैं। विधानसभा के अंतिम सप्ताह में लाया गया यह प्रस्ताव केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि इसमें सरकार से साफ और सीधे जवाब की मांग की गई। विजय वाडेत्तीवार अपनी साफ और सीधी बात रखने के लिए जाने जाते हैं। विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जब सत्र का अंतिम सप्ताह होता है, तब सरकार की

महाराष्ट्र विधानसभा के सत्र के दौरान कांग्रेस नेता विजय वाडेत्तीवार ने अंतिम सप्ताह प्रस्ताव रखकर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया। इस प्रस्ताव के माध्यम से उन्होंने सरकार का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचा, जो सीधे तौर पर आम जनता से जुड़े हुए हैं। विधानसभा के अंतिम सप्ताह में लाया गया यह प्रस्ताव केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि इसमें सरकार से साफ और सीधे जवाब की मांग की गई। विजय वाडेत्तीवार अपनी साफ और सीधी बात रखने के लिए जाने जाते हैं। विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जब सत्र का अंतिम सप्ताह होता है, तब सरकार की

महाराष्ट्र विधानसभा में सोयाबीन किसानों की समस्याओं को लेकर एक बार फिर गरमागरम बहस देखने को मिली। विपक्ष के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री विजय वडेट्टीवार ने सदन में सरकार पर जमकर हमला बोलते हुए किसानों की परेशानियों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि सोयाबीन उत्पादक किसान लंबे समय से उचित दाम और सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। वडेट्टीवार ने अपने भाषण में कहा कि सोयाबीन की खेती करने वाले किसान महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाकों में लाखों किसान

महाराष्ट्र विधानसभा में सोयाबीन किसानों की समस्याओं को लेकर एक बार फिर गरमागरम बहस देखने को मिली। विपक्ष के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री विजय वडेट्टीवार ने सदन में सरकार पर जमकर हमला बोलते हुए किसानों की परेशानियों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि सोयाबीन उत्पादक किसान लंबे समय से उचित दाम और सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। वडेट्टीवार ने अपने भाषण में कहा कि सोयाबीन की खेती करने वाले किसान महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाकों में लाखों किसान