Germany Army Expansion 2026: जनवरी 2026 का महीना दुनिया की राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हो रहा है। एक तरफ यूक्रेन में जंग जारी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के बीच ग्रीनलैंड को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। इसी बीच जर्मनी के नए चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने एक ऐसा फैसला लिया है जो आने वाले समय में पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था को बदल सकता है। जर्मनी अब यूरोप की सबसे मजबूत और ताकतवर पारंपरिक सेना बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह फैसला सिर्फ एक सैन्य कदम नहीं है, बल्कि यह साफ संकेत है कि जर्मनी अब अमेरिका के पीछे चलने को तैयार नहीं है।
सवाल यह है कि जर्मनी, जो दशकों तक सैन्य मामलों में पीछे रहा, अचानक इतना आक्रामक क्यों हो गया है? और इस पूरे मामले का अमेरिका-ग्रीनलैंड विवाद से क्या संबंध है? आइए विस्तार से समझते हैं।
जर्मनी की सेना विस्तार योजना
साल 2026 की शुरुआत से ही जर्मनी में 18 साल के सभी युवा पुरुषों को एक खास फॉर्म भरना जरूरी हो गया है। इस फॉर्म में उन्हें अपनी शारीरिक क्षमता के बारे में जानकारी देनी होती है। यह कदम पिछले महीने पास हुए एक नए कानून के तहत उठाया गया है। फिलहाल सेना में शामिल होना स्वैच्छिक है, लेकिन यह कानून सरकार को यह अधिकार देता है कि अगर लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो अनिवार्य सैन्य सेवा लागू की जा सके।
नवंबर 2025 में जर्मन सेना में सक्रिय ड्यूटी पर तैनात सैनिकों की संख्या 184000 थी, जो मई 2025 से 2500 ज्यादा है। इस दौरान चांसलर मर्ज ने संसद में साफ शब्दों में कहा था कि बुंडेसवेहर यानी जर्मन सेना को यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनना है।
बुंडेसवेहर के सैन्य इतिहास केंद्र के वरिष्ठ शोधकर्ता टिमो ग्राफ के अनुसार, यह काफी समय बाद सबसे बड़ा सैन्य विस्तार है। यह 2021 के बाद की सबसे मजबूत ताकत भी है। जर्मनी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसकी जीडीपी 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है।
युवाओं को आकर्षित करने के लिए मोटी पेशकश
जर्मनी सरकार युवाओं को सेना में भर्ती के लिए लुभावने पैकेज दे रही है। 23 महीने के स्वैच्छिक कॉन्ट्रैक्ट पर करीब 2600 यूरो मासिक वेतन, मुफ्त आवास और स्वास्थ्य बीमा दिया जा रहा है। कर कटौती के बाद भी युवाओं के हाथ लगभग 2300 यूरो बच जाते हैं। ये कॉन्ट्रैक्ट आगे चलकर स्थायी नौकरी में भी बदले जा सकते हैं।
2035 तक का बड़ा लक्ष्य
जर्मनी ने NATO को वादा किया है कि 2035 तक सक्रिय ड्यूटी पर तैनात सैनिकों की संख्या 260000 कर दी जाएगी। साथ ही रिजर्व सैनिकों की संख्या 200000 तक दोगुनी की जाएगी। इस तरह कुल मिलाकर जर्मन सेना की ताकत करीब पांच लाख के करीब पहुंच जाएगी, जो शीत युद्ध के अंत में थी।
ग्रीनलैंड विवाद और अमेरिका का दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी मांग को फिर से उठाया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इसे साफ मना कर दिया। इसके बाद अमेरिका ने 17 जनवरी को जर्मनी, फ्रांस और डेनमार्क समेत आठ यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने का ऐलान कर दिया। यह 1 फरवरी 2026 से लागू हो सकता है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ये शुल्क तब तक जारी रहेंगे जब तक ग्रीनलैंड की पूरी खरीद पर कोई समझौता नहीं होता। अमेरिका ग्रीनलैंड को आर्कटिक में रूस और चीन के खिलाफ एक रणनीतिक किले के रूप में देखता है।
यूरोप ने इसे अपनी आजादी पर हमला माना है। यूरोपीय देशों का मानना है कि अमेरिका अब मित्र कम और एक कठोर व्यापारी की तरह ज्यादा व्यवहार कर रहा है।
ऑपरेशन आर्कटिक एनड्योरेंस
अमेरिका के दबाव के आगे झुकने के बजाय, यूरोप ने अपनी सैन्य उपस्थिति ग्रीनलैंड में बढ़ा दी है। इतिहास में पहली बार जर्मन सेना अपने देश से हजारों मील दूर एक ऐसे मिशन का हिस्सा बन रही है जो सीधे अमेरिकी हितों के खिलाफ है। इसे ऑपरेशन आर्कटिक एनड्योरेंस नाम दिया गया है।
जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन की सेनाएं ग्रीनलैंड में डेनमार्क की मदद के लिए तैनात हो रही हैं। यह NATO के भीतर एक अभूतपूर्व दरार है, जहां NATO के ही सदस्य देश एक दूसरे के सामने खड़े हैं।
रूस की नाराजगी और यूक्रेन का प्रभाव
रूस ने जर्मनी के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। जर्मनी में रूस के राजदूत सर्गेई नेचायेव ने कहा कि जर्मनी रूस के साथ पूर्ण पैमाने के सैन्य टकराव की तैयारी तेज कर रहा है।
जर्मनी के नजरिए से देखें तो रूस द्वारा यूक्रेन से सैनिक न हटाने ने रक्षा खर्च बढ़ाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति को मजबूत किया है। इस साल सशस्त्र बलों के पुनर्निर्माण पर 108 अरब यूरो खर्च किए जा रहे हैं। यह जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है और 2021 के बजट से दोगुने से भी अधिक है।
2030 तक रक्षा खर्च 3.5 प्रतिशत जीडीपी तक ले जाने की योजना है। ग्राफ के मुताबिक, रक्षा खर्च बढ़ाने के समर्थन में जनता की हिस्सेदारी एक साल में 58 प्रतिशत से 65 प्रतिशत हो गई।
2029 का डर
दिसंबर में हुए पॉलिटबैरोमीटर के सर्वे में 80 प्रतिशत जर्मन मानते हैं कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन शांति समझौते को लेकर गंभीर नहीं हैं। खुफिया एजेंसियों की चेतावनी के कारण यह धारणा भी बढ़ी है कि रूस भविष्य में NATO देशों तक संघर्ष बढ़ा सकता है।
ग्राफ कहते हैं कि 2029 को संभावित हमले की तारीख के रूप में देखा जा रहा है। पिछले चार वर्षों में हमने खतरे की गंभीरता को समझने में देरी की है। यूरोप का भविष्य दांव पर है।
अमेरिका पर भरोसा घटा, यूरोपीय NATO का विचार मजबूत
रूस के अलावा, जर्मन समाज में अमेरिका पर भरोसा भी घटा है। जून 2025 में ZDF के सर्वे में 73 प्रतिशत ने माना कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा की गारंटी जारी नहीं रखेगा। दिसंबर तक यह आंकड़ा 84 प्रतिशत पहुंच गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में यूरोप की आलोचना और दूर दराज के राजनीतिक दलों को कथित समर्थन ने चिंताएं बढ़ाई हैं। यूरोप में अमेरिकी सेनाओं के पूर्व कमांडर बेन हेज्स ने इसे यूरोप के लिए अपमानजनक संदेश बताया।
नतीजतन, 60 प्रतिशत जर्मन अब अमेरिकी परमाणु सुरक्षा पर भी भरोसा नहीं करते। 75 प्रतिशत इसे एंग्लो-फ्रेंच ढांचे से बदलने के पक्ष में हैं। ग्राफ के अनुसार NATO के समर्थक और EU समर्थक दोनों अब यूरोपीय NATO की धारणा पर एकजुट हो रहे हैं। बुंडेसवेहर के सर्वे बताते हैं कि यूरोपीय सेना के समर्थन में एक साल में 10 अंकों की छलांग लगी है और यह 57 प्रतिशत हो गया।
क्या जर्मनी अपना लक्ष्य हासिल कर पाएगा
Germany Army Expansion 2026: मर्ज से पहले चांसलर ओलाफ स्कोल्ज ने भी 2022 में ऐसे ही वादे किए थे, लेकिन नौकरशाही की देरी और सांस्कृतिक हिचकिचाहट के कारण रक्षा निवेश धीमा रहा। सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक सेना लंबे समय तक युवाओं के लिए आकर्षक करियर नहीं मानी जाती थी, खासकर इतिहास के बोझ के कारण।
हालांकि 2022 के बाद दृष्टिकोण बदला है। मर्ज के पद संभालते समय संसद पहले ही संवैधानिक घाटा सीमाएं निलंबित कर स्थायी रक्षा वृद्धि का रास्ता खोल चुकी थी। पिछले महीने लगभग 60 अरब डॉलर के रक्षा साजो-सामान की मंजूरी दी गई।
जर्मनी का यह कदम सिर्फ एक सैन्य विस्तार नहीं है, बल्कि यह पोस्ट-अमेरिकन यूरोप की तैयारी है। ग्रीनलैंड का मुद्दा सिर्फ बर्फ और जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह इस बात का इम्तिहान है कि क्या यूरोप अमेरिका के दबाव के बिना अपने फैसले ले सकता है। जर्मनी द्वारा यूरोप की सबसे मजबूत सेना बनाने का संकल्प यह बताता है कि बर्लिन अब वाशिंगटन का जूनियर पार्टनर बनकर रहने को तैयार नहीं है। यानी अब NATO का असली संकट बाहर रूस से नहीं, बल्कि अंदर अमेरिका-यूरोप विवाद से भी है।