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दुर्गापुर में बकाया वेतन की मांग को लेकर कागज मिल में श्रमिकों का जबरदस्त प्रदर्शन

Durgapur Paper Mill Workers Protest: ढाई महीने के बकाया वेतन को लेकर कागज मिल में श्रमिकों का विरोध प्रदर्शन
Durgapur Paper Mill Workers Protest: ढाई महीने के बकाया वेतन को लेकर कागज मिल में श्रमिकों का विरोध प्रदर्शन (File Photo)
दुर्गापुर के जाठगड़िया पेपर मिल में गुरुवार को श्रमिकों ने ढाई महीने के बकाया वेतन और अचानक काम से हटाए जाने के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। मजदूरों ने कारखाना गेट बंद कर दिया। श्रमिक संगठनों ने समर्थन दिया। TMC नेता उत्तम मुखोपाध्याय ने कहा कि सरकार मजदूरों के साथ है। कारखाना प्रबंधन ने कोई टिप्पणी नहीं की।
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दुर्गापुर के काकसार इलाके में स्थित जाठगड़िया पेपर मिल में गुरुवार की सुबह एक बड़ा विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। कारखाने के मजदूरों ने अपने ढाई महीने के बकाया वेतन की मांग को लेकर कारखाने का गेट बंद कर दिया और जमकर हंगामा किया। श्रमिकों का गुस्सा इस हद तक था कि पूरे कारखाने के माहौल में तनाव फैल गया। मजदूरों ने कारखाना प्रबंधन को घेरकर अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाई और जब तक उनकी बात नहीं सुनी गई, वे शांत होने को तैयार नहीं थे।

सुबह से ही कई मजदूरों ने मिलकर मुख्य गेट को बंद कर दिया और नारेबाजी शुरू कर दी। उनका कहना था कि पिछले ढाई महीने से उन्हें उनकी मेहनत की कमाई नहीं मिली है। जिस पैसे से वे अपने घर का खर्च चलाते हैं, अपने बच्चों को पढ़ाते हैं, वह पैसा ही नहीं मिल रहा है। ऐसे में उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो गया है।

श्रमिकों की मुख्य मांगें और समस्याएं

मजदूरों का आरोप है कि कारखाने में ठेकेदार बदल दिया गया है। नए ठेकेदार ने बिना किसी पूर्व सूचना के कई पुराने मजदूरों को काम से हटा दिया है। जो मजदूर सालों से इस कारखाने में काम कर रहे थे, उन्हें अचानक बताया गया कि अब उनकी जरूरत नहीं है। इस तरह की अचानक कार्रवाई से श्रमिकों में भारी रोष है। उन्हें न तो उनका बकाया वेतन मिला है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि उन्हें काम से क्यों हटाया गया।

लंबे समय से वेतन न मिलने की वजह से मजदूरों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। कई मजदूरों ने बताया कि उन्हें अपने घर का राशन खरीदने, बच्चों की फीस देने और बिजली-पानी के बिल भरने में भी परेशानी हो रही है। कुछ मजदूरों को तो कर्ज लेना पड़ा है। इस हालत में कारखाना प्रबंधन की चुप्पी उन्हें और भी परेशान कर रही है।

श्रमिक संगठनों का समर्थन

जैसे-जैसे प्रदर्शन तेज होता गया, स्थिति गंभीर होती चली गई। इसके बाद स्थानीय श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि मौके पर पहुंचे। उन्होंने मजदूरों को आश्वासन दिया कि वे उनके साथ खड़े हैं और उनकी हर जायज मांग को पूरा करवाने के लिए कारखाना प्रबंधन से बातचीत करेंगे। श्रमिक संगठनों के इस रुख से मजदूरों को थोड़ी राहत मिली और माहौल कुछ हद तक शांत हुआ।

विरोध प्रदर्शन में शामिल एक मजदूर सत्यजीत चट्टोपाध्याय ने कहा कि अगर जल्द ही उनका बकाया वेतन नहीं दिया गया और उन्हें दोबारा काम पर नहीं रखा गया, तो आने वाले दिनों में वे और भी बड़े आंदोलन की तैयारी करेंगे। उन्होंने साफ कहा कि अब मजदूरों का धैर्य खत्म हो चुका है और अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला तो वे कारखाने को पूरी तरह से बंद करवा देंगे।

राजनीतिक हस्तक्षेप और सरकार का रुख

इस मामले में राजनीतिक पार्टियों ने भी दिलचस्पी दिखाई है। जिला तृणमूल कांग्रेस के सह-अध्यक्ष उत्तम मुखोपाध्याय ने मजदूरों के समर्थन में बयान दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में माँ, माटी, मानुष की सरकार है और यह सरकार हमेशा मजदूरों के साथ खड़ी रहती है। उन्होंने कहा कि आजकल हर चीज की कीमतें बढ़ रही हैं, ऐसे में अगर मजदूरों को ढाई महीने तक वेतन नहीं दिया जाएगा तो समस्या होना स्वाभाविक है।

उत्तम मुखोपाध्याय ने यह भी कहा कि वे इस बात की जांच कर रहे हैं कि आखिर मजदूरों को वेतन क्यों नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाया जाएगा और मजदूरों को उनका हक जरूर दिलाया जाएगा।

कारखाना प्रबंधन की चुप्पी

हालांकि इस पूरे मामले में कारखाना प्रबंधन ने अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। न तो उन्होंने वेतन में देरी की वजह बताई है और न ही ठेकेदार बदलने और मजदूरों को हटाने के बारे में कोई स्पष्टीकरण दिया है। कारखाना अधिकारियों की यह चुप्पी स्थिति को और भी संवेदनशील बना रही है।

मजदूरों का कहना है कि अगर प्रबंधन इसी तरह चुप रहा और उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करता रहा, तो वे मजबूर होकर और कड़े कदम उठाएंगे। वे चाहते हैं कि उनके साथ खुलकर बातचीत हो और उनकी परेशानियों का समाधान निकाला जाए।

आगे की संभावनाएं

इस घटना ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि छोटे और मझोले उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा कैसे की जाए। ठेकेदारी प्रथा में अक्सर देखा गया है कि जब ठेकेदार बदलता है तो पुराने मजदूरों को नुकसान होता है। उन्हें न तो उनका पूरा बकाया मिलता है और न ही नए ठेकेदार उन्हें रखना चाहता है।

श्रम कानूनों के जानकार मानते हैं कि ऐसे मामलों में श्रम विभाग और स्थानीय प्रशासन को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। मजदूरों की शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए और कारखाना मालिकों पर दबाव बनाना चाहिए कि वे समय पर वेतन दें और किसी को भी बिना वजह काम से न हटाएं।

फिलहाल दुर्गापुर के इस कागज मिल में स्थिति नाजुक बनी हुई है। मजदूर और प्रबंधन के बीच बातचीत की उम्मीद है, लेकिन अगर जल्द कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो यह विवाद और बढ़ सकता है। श्रमिक संगठनों ने भी चेतावनी दी है कि अगर मजदूरों के साथ न्याय नहीं हुआ तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

यह घटना न सिर्फ दुर्गापुर बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल में छोटे उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों की दुर्दशा को उजागर करती है। जब तक इन मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त कदम नहीं उठाए जाते, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।