क्या था पूरा मामला?
दरअसल गोंडा जिले की रहने वाली रेखा देवी नाम की एक किन्नर ने कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। रेखा देवी की मांग थी कि उन्हें एक तय क्षेत्र दिया जाए, जहां सिर्फ वही ‘बधाई नेग’ मांग सकें। उनका कहना था कि वह कई वर्षों से एक खास इलाके में यह काम कर रही हैं, लेकिन अब दूसरे किन्नर समूह भी वहां पहुंच जाते हैं, जिससे विवाद और झगड़े होते हैं।
याचिका में उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि उनके पुराने क्षेत्र को परंपरागत अधिकार मानते हुए कानूनी सुरक्षा दी जाए, ताकि दूसरे समूह वहां न आएं।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने इस मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को बिना कानूनी आधार के टैक्स, शुल्क या धन वसूलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ‘नेग’ या ‘बधाई’ मांगना अगर स्वेच्छा से मिले सम्मान तक सीमित है तो अलग बात है, लेकिन इसे अधिकार बताकर किसी क्षेत्र में वसूली का दावा करना कानूनन मान्य नहीं है।
परंपरा बनाम कानून
अदालत ने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण अधिनियम 2019 में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो बधाई या नेग वसूली को कानूनी अधिकार बनाता हो। इसलिए केवल परंपरा के आधार पर इसे मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता।
इस निर्णय का मतलब यह नहीं कि ट्रांसजेंडर समुदाय के सम्मान या अधिकार कम किए गए हैं, बल्कि कोर्ट ने साफ किया कि हर नागरिक की तरह उनके अधिकार भी कानून के दायरे में ही तय होंगे।