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केजरीवाल के बाद मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत का किया बहिष्कार, जानिए क्या है पूरा मामला

केजरीवाल के बाद मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत का किया बहिष्कार
केजरीवाल के बाद मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत का किया बहिष्कार (File Photo)

Manish Sisodiya: अरविंद केजरीवाल के बाद अब मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया है। दोनों नेताओं ने न्याय की उम्मीद खत्म होने की बात कहकर ‘सत्याग्रह’ का रास्ता चुना।

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Manish Sisodiya: दिल्ली की राजनीति और न्यायिक गलियारों में इस समय एक नया विवाद तेजी से चर्चा में है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के बाद अब पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया है।

मनीष सिसोदिया ने अदालत में पेश होने से किया इंकार

आज मंगलवार को मनीष सिसोदिया ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर साफ कहा कि अब वे न तो खुद उनकी अदालत में पेश होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील अदालत में जाएगा। अपने पत्र में सिसोदिया ने भावनात्मक और तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लिखा कि उन्हें अब न्याय की उम्मीद नहीं है और उनके पास “सत्याग्रह” के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। उन्होंने यहां तक कहा कि “आपके बच्चों का भविष्य तुषार  मेहता (जो उनके खिलाफ मुकदमा लड़ रहे हैं) जी के हाथों में है,”।

अरविंद केजरीवाल ने एक दिन पहले लिखा था पत्र

इससे ठीक एक दिन पहले अरविंद केजरीवाल ने भी इसी तरह का कदम उठाते हुए जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत का बहिष्कार करने की घोषणा की थी। केजरीवाल ने अपने पत्र में कहा था कि उन्होंने यह फैसला अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया है। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का हवाला देते हुए कहा कि अब वे कानूनी लड़ाई के बजाय नैतिक प्रतिरोध का रास्ता अपनाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अदालत कोई फैसला सुनाती है, तो वे सुप्रीम कोर्ट में अपील का अधिकार सुरक्षित रखेंगे।

क्या है पूरा मामला ?

यह पूरा विवाद 20 अप्रैल के उस फैसले के बाद गहरा गया, जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने आबकारी नीति मामले की सुनवाई से न्यायाधीश को खुद को अलग करने की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा था कि किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता पर केवल आशंका या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत की गरिमा और संस्थागत शुचिता सर्वोपरि है।

न्यायमूर्ति शर्मा की टिप्पणी—“झूठ, चाहे अदालत में या सोशल मीडिया पर, हजार बार दोहराया जाए, सच नहीं बनता”—ने इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया।

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Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।