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ए॰ आर॰ रहमान ने कहा: “धर्म के नाम पर खून बहाना स्वीकार्य नहीं है” – सूफीवाद में पा ली है एकता की राह

AR Rahman: धर्म‑हिंसा पर उनका साफ़ संदेश और सूफी एकता
AR Rahman: धर्म‑हिंसा पर उनका साफ़ संदेश और सूफी एकता (Photo: IG)

ए॰ आर॰ रहमान ने हालिया इंटरव्यू में कहा कि वह इस्लाम, हिंदू धर्म और ईसाई धर्म तीनों का अध्ययन कर चुके हैं, लेकिन धर्म के नाम पर किसी को चोट पहुँचाना या मारना उनके लिए पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने सूफीवाद में आस्था और मानवता की एकता का संदेश अपनाया है।

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धर्म‑हिंसा पर उनका साफ़ संदेश और सूफी एकता

ऑस्कर‑विजेता संगीतकार ए॰ आर॰ रहमान ने हाल‑फिलहाल एक गहरे और व्यक्तिगत इंटरव्यू में अपनी धार्मिक दृष्टि और आध्यात्मिक यात्रा को खुलकर साझा किया है। उन्होंने बताया कि उन्होंने इस्लाम, हिंदू धर्म और ईसाई धर्म–तीनों पर अध्ययन किया है, और साथ ही यह स्पष्ट किया कि उन्हें धर्म के नाम पर लोगों को चोट पहुँचाने या जान लेने की स्थिति बिल्कुल अस्वीकार्य है। उनकी यह उन्मुक्त अभिव्यक्ति न सिर्फ उनके गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण को दर्शाती है, बल्कि आज के समाज में धार्मिक सहिष्णुता और मानवता की अहमियत को भी रेखांकित करती है।


सूफीवाद की ओर झुकाव

रहमान ने अपनी सूफीवाद की ओर बढ़ती रुचि का खुलासा करते हुए कहा कि उनके लिए यह “मृत्यु से पहले मरने” जैसा अनुभव है। उनका मत है कि व्यक्ति को अपने अहं (ईगो) और नकारात्मक भावनाओं — जैसे वासना, लालच, जलन या अन्य लोगों को न्याय का दायरा देना — को मरना होगा। जब यह अहं खत्म हो जाता है, तभी इंसान ईश्वर की तरह पारदर्शी हो सकता है।

रहमान ने यह भी उल्लेख किया कि संगीत उनके लिए एक पूजास्थल के समान है — जब वह मंच पर प्रदर्शन करते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वे किसी तीर्थस्थल में हों।


सभी धर्मों का सम्मान और एकता

रहमान कहते हैं, “मैं सभी धर्मों का प्रशंसक हूँ।” उन्होंने बतलाया कि उन्होंने इस्लाम, हिंदू धर्म और ईसाइयत के गहरे अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि वास्तव में हर धर्म में आस्था की एक सामान्य धारा है जो लोगों को अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है।

उनका यह विश्वास है कि चाहे लोग अलग-अलग धर्मों का पालन करें, लेकिन यदि उनकी आस्था सच्ची और प्रामाणिक हो, तो वह मानवता की भलाई में योगदान देती है।


धर्म के नाम पर हिंसा: एक स्पष्ट विरोध

ए॰ आर॰ रहमान ने विशेष रूप से यह जोर दिया कि उनका एक बड़ा सवाल धर्म के नाम पर हिंसा के प्रचलन पर है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी धर्म की असली शिक्षाएँ किसी को मारने या चोट पहुँचाने की इजाजत नहीं देतीं।

उनकी यह राय दर्शाती है कि धार्मिक पहचान और आस्था का मतलब सशक्तिकरण हो सकता है, लेकिन यह कभी दूसरों के विरुद्ध हिंसा की छेड़छाड़ का औजार नहीं बनना चाहिए।


नाम‑परिवर्तन और आध्यात्मिक पहचान

ए॰ आर॰ रहमान का जन्म नाम दिलीप कुमार राजगोपाल था। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘रहमान’ रखा — एक निर्णय जिसमें एक हिंदू ज्योतिषी की भूमिका भी रही। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन उनके लिए बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि दिल की आन्तरिक प्रेरणा से हुआ।

रहमान ने बताया कि सूफी आध्यात्मिक गुरु और उनका पारस्परिक संवाद उनकी जीवन यात्रा में बहुत अहम था। उनके परिवार ने भी धीरे-धीरे इस नए रास्ते को अपनाया, और उनकी माँ ने भी उनका साथ दिया।


आस्था और मानवता का संदेश

रहमान का विचार है कि अगर इंसान आध्यात्मिक धनी है, तो भौतिक समृद्धि भी खुद-ब‑खुद आती है। वह कहते हैं कि सच्ची आस्था का माप यह नहीं कि कोई कितने धार्मिक अनुष्ठान करता है, बल्कि यह कि उसकी आस्था कितनी सच्ची, निष्कपट और मानवता‑केन्द्रीत है।

यह दर्शन आधुनिक समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां धार्मिक तनाव और हिंसा की घटनाएं अक्सर सुनने को मिलती हैं। रहमान का संदेश साफ‑सुथरा है: धर्मों में बंटकर नहीं, बल्कि आस्था में एक होकर इंसानियत को आगे बढ़ाना चाहिए


संगीत और आध्यात्मिकता का संगम

रहमान के लिए संगीत सिर्फ एक कला नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कई कठिन समय देखे हैं, लेकिन संगीत ने उन्हें संतुलन और आध्यात्मिक स्थिरता दी। उनका यह विश्वास है कि संगीत और आस्था मिलकर इंसान को भीतर से बदल सकते हैं।

गुलज़र ने भी एक बार कहा था कि रहमान इतने धार्मिक और आत्मीय हैं कि अगर वह हवाई अड्डे जा रहे हों और रास्ते में कोई दरगाह (मज़ार) हो, तो वह वहां रुककर नमाज़ अदा करते हैं। यह इनकी गहरे आध्यात्मिक और धार्मिक जुड़ाव की गवाही है।


सारांश और संदेश

ए॰ आर॰ रहमान का यह बयान न सिर्फ उनके धर्म‑दृष्टिकोण का परिचायक है, बल्कि यह एक व्यापक मानवतावादी संदेश देता है: धर्म का मकसद मानवता को जोड़ना है, न कि बांटना। उनका विश्वास है कि जब हम अपनी आस्था को पवित्र रखते हैं, लेकिन दूसरों का सम्मान भी करते हैं, तब ही समाज में सच्ची एकता और शांति संभव है।

उनका यह जीवन दर्शन हमें याद दिलाता है कि आध्यात्मिक समृद्धि और धार्मिक सहिष्णुता हमें एक बेहतर दुनिया की ओर ले जा सकते हैं — जहाँ हिंसा, विभाजन और कट्टरता की जगह प्रेम, समझ और एकता हो।

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Asfi Shadab

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