UGC 2026: भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर बड़े बदलाव और उससे जुड़े विवाद के दौर से गुजर रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी द्वारा जारी किए गए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 ने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, छात्रों, शिक्षकों और समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। एक तरफ यूजीसी इसे भेदभाव खत्म करने की दिशा में जरूरी सुधार बता रहा है, तो दूसरी तरफ जनरल कैटेगरी यानी सवर्ण वर्ग के लोग इसे अपने खिलाफ बताते हुए नियम वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
यूजीसी के नए इक्विटी नियमों की असली तस्वीर
यूजीसी भारत सरकार की वह संस्था है जो देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को मान्यता देती है, उनके कामकाज पर नजर रखती है और शिक्षा की गुणवत्ता तय करती है। नए इक्विटी नियम 2026 के तहत यूजीसी ने यह दावा किया है कि उसका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, वर्ग या पहचान के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है।
इन नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज को समान अवसर केंद्र बनाना अनिवार्य होगा। यहां छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भेदभाव से जुड़ी शिकायत दर्ज कर सकेंगे। पहले यह व्यवस्था सिर्फ एससी और एसटी वर्ग तक सीमित थी, लेकिन अब ओबीसी वर्ग को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।
ओबीसी वर्ग को शामिल करने से बढ़ा विवाद
ओबीसी वर्ग को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार दिए जाने के बाद ही यह मुद्दा ज्यादा उग्र हो गया। 2012 के पुराने नियमों में ओबीसी वर्ग शामिल नहीं था। अब नए नियमों में उनके शामिल होने से जनरल कैटेगरी के लोगों को आशंका है कि इससे कैंपस में टकराव बढ़ेगा और पढ़ाई का माहौल प्रभावित होगा।
यूजीसी का तर्क है कि ओबीसी छात्रों और कर्मचारियों के खिलाफ भी भेदभाव की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं, इसलिए उन्हें बाहर रखना उचित नहीं था।
नई समितियां और सख्त समय-सीमा
नए नियमों के तहत हर संस्थान में समानता समिति बनाई जाएगी, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे। शिकायत दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर कार्रवाई शुरू करनी होगी और 60 दिनों में जांच पूरी करनी अनिवार्य होगी।
दोष साबित होने पर चेतावनी, जुर्माना, निलंबन या निष्कासन जैसी सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। साथ ही हेल्पलाइन नंबर भी शुरू किए जाएंगे, ताकि पीड़ित बिना डर के अपनी बात रख सकें।
जनरल कैटेगरी का डर और सवाल
जनरल कैटेगरी के छात्र और शिक्षक इन नियमों को लेकर खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि नए नियम आरोपों की जांच से पहले ही उन्हें दोषी मान लेते हैं। सबसे बड़ी चिंता झूठी शिकायतों को लेकर है।
उनका तर्क है कि भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट नहीं है, समानता समिति में जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व की गारंटी नहीं दी गई है और झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कोई सजा तय नहीं की गई है। इससे किसी का करियर, प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य बर्बाद हो सकता है।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर #RollbackUGC ट्रेंड कर रहा है और कई जगह प्रदर्शन भी हो रहे हैं।
समर्थन करने वालों की दलील
दूसरी ओर, नियमों का समर्थन करने वालों का कहना है कि अगर कोई जातिगत भेदभाव नहीं करता, तो उसे डरने की जरूरत क्यों है। उनके मुताबिक, ये नियम वर्षों से दबे हुए वर्गों को आवाज देने का मौका हैं।
वे यह भी कहते हैं कि रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों ने दिखा दिया कि संस्थानों में भेदभाव कितना गंभीर हो सकता है और उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और पृष्ठभूमि
इन नियमों के पीछे सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी अहम रही है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी के मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने यूजीसी को 2012 के नियमों को अपडेट करने और भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया था। जनवरी 2025 में आदेश आया और फरवरी में ड्राफ्ट जारी किया गया।
आंकड़े क्या कहते हैं
यूजीसी की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 2019-20 में भेदभाव की 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। पांच वर्षों में कुल 1160 शिकायतें सामने आईं। हालांकि देश में 4 करोड़ से ज्यादा छात्र और हजारों संस्थान हैं, इस लिहाज से यह आंकड़ा छोटा लगता है, लेकिन हर शिकायत एक इंसान की पीड़ा भी दर्शाती है।
इस पूरे विवाद से साफ है कि नियमों का उद्देश्य भले ही सही हो, लेकिन भरोसा बनाना उतना ही जरूरी है। अगर झूठी शिकायतों से बचाव और सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने जैसे प्रावधान जोड़े जाएं, तो शायद यह टकराव कम हो सके।